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ब्रिटिश बेस पर हमला करने वाला ड्रोन ईरान से लॉन्च नहीं हुआ, युद्ध में अब किसकी एंट्री?

साइप्रस में ब्रिटिश सैन्य अड्डे RAF अक्रोटिरी पर 'शाहेद' ड्रोन से हमला हुआ है। ब्रिटेन ने स्पष्ट किया है कि यह सीधे ईरान से लॉन्च नहीं हुआ। जानिए इस हमले के बाद अमेरिका और ब्रिटेन की कूटनीति तथा दुनिया पर इसके क्या प्रभाव हो सकते हैं।

Thu, 5 March 2026 12:05 PMAmit Kumar लाइव हिन्दुस्तान
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ब्रिटिश बेस पर हमला करने वाला ड्रोन ईरान से लॉन्च नहीं हुआ, युद्ध में अब किसकी एंट्री?

साइप्रस स्थित ब्रिटिश रॉयल एयर फोर्स (RAF) के बेस 'अक्रोटिरी' पर एक शाहेद-प्रकार के ड्रोन से हमला किया गया है। हालांकि, ब्रिटेन के रक्षा मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि यह ड्रोन सीधे ईरान से लॉन्च नहीं किया गया था। यह ईरानी तकनीक से बना ड्रोन हवाई अड्डे के रनवे से टकराया। 1986 के बाद साइप्रस में इस ब्रिटिश सैन्य सुविधा पर यह पहला हमला बताया जा रहा है। ब्रिटिश अधिकारियों के अनुसार, इस हमले में कोई घायल नहीं हुआ है और बेस को केवल मामूली नुकसान पहुंचा है। भले ही नुकसान कम हुआ हो, लेकिन इस ड्रोन हमले ने मध्य पूर्व के चल रहे संघर्ष को अब यूरोपीय धरती तक ला दिया है।

ब्रिटिश रक्षा मंत्रालय का आधिकारिक बयान

बुधवार को यूके के रक्षा मंत्रालय ने एक आधिकारिक बयान जारी करते हुए कहा- रक्षा मंत्रालय इस बात की पुष्टि कर सकता है कि 2 मार्च की आधी रात को RAF अक्रोटिरी को निशाना बनाने वाला शाहेद जैसा ड्रोन ईरान से लॉन्च नहीं किया गया था। पिछले 24 घंटों में, ब्रिटेन ने इस क्षेत्र में अपने और सहयोगी देशों के ठिकानों पर एयर डिफेंस सिस्टम (वायु रक्षा प्रणालियों) की फिर से आपूर्ति की है- जिसमें ब्रिटेन निर्मित वायु रक्षा मिसाइलें भी शामिल हैं। रक्षा मंत्रालय ने यह भी बताया कि रॉयल नेवी के वाइल्डकैट हेलीकॉप्टर आने वाले दिनों में साइप्रस पहुंच जाएंगे। ये हेलीकॉप्टर 'मार्टलेट' मिसाइलों से लैस हैं, जो हवा में ही किसी भी खतरे को मार गिराने में पूरी तरह सक्षम हैं।

हालांकि ब्रिटिश सरकार ने ये नहीं बताया अगर ड्रोन ईरान से लॉन्च नहीं किए गए तो कहां से हुए। साइप्रस सरकार और कई ब्रिटिश व अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ड्रोन संभवतः लेबनान से लॉन्च किया गया। इसमें हिजबुल्लाह का हाथ माना जा रहा है, जो ईरान समर्थित मिलिशिया ग्रुप है। ड्रोन कम ऊंचाई पर उड़कर रडार से बचने में सफल रहा। यह ईरानी प्रॉक्सी ग्रुप्स द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली सामान्य रणनीति है।

इस घटना के बाद राजनैतिक बयानबाजी और कूटनीतिक हलचल भी तेज हो गई है। साइप्रस के राष्ट्रपति निकोस क्रिस्टोडौलाइड्स ने स्पष्ट किया है कि उनका देश किसी भी युद्ध का हिस्सा नहीं है। उन्होंने कहा- मैं स्पष्ट करना चाहता हूं: हमारा देश किसी भी तरह से इसमें भाग नहीं ले रहा है और हमारा किसी भी सैन्य अभियान का हिस्सा बनने का कोई इरादा नहीं है।

दूसरी ओर, रविवार को ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने साफ संकेत दिया था कि ब्रिटेन, ईरान के साथ युद्ध में संयुक्त राज्य अमेरिका का समर्थन करने के लिए पूरी तरह तैयार है। एक टेलीविजन संबोधन में, प्रधानमंत्री स्टार्मर ने पुष्टि की कि ब्रिटिश संसद (वेस्टमिंस्टर) ने अमेरिका के एक अहम अनुरोध को मंजूरी दे दी है। इसके तहत, अमेरिकी सेना रक्षात्मक उद्देश्यों के लिए ब्रिटिश सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल कर सकेगी, ताकि ईरानी मिसाइलों को उनके मूल स्रोत पर ही नष्ट किया जा सके।

देश की आजादी के करीब 66 वर्षों बाद साइप्रस खुद को पश्चिम एशिया के एक और युद्ध में फंसा हुआ पाता है, मुख्य रूप से इसलिए कि यह दो बड़े और महत्वपूर्ण ब्रिटिश सैन्य ठिकानों की मेजबानी करता है, जो इसके ब्रिटिश औपनिवेशिक अतीत से जुड़े हैं। ड्रोन हमले ने साइप्रस को याद दिलाया कि संकट हमेशा करीब ही है। अधिकारियों ने बताया कि अक्रोटिरी स्थित रॉयल एयर फोर्स के अड्डे पर लगे रडार उपकरणों को चकमा देते हुए सोमवार आधी रात को एक शाहेद ड्रोन से हमला किया गया, जिसने सैन्य अड्डे के रनवे के पास स्थित एक विमान हैंगर को मामूली नुकसान पहुंचाया। ड्रोन को मार गिराने के लिए टाइफून लड़ाकू विमानों और दुनिया के छह सर्वश्रेष्ठ युद्धक विमानों एफ-35 को तैनात किया गया।

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