China was ready from Trump first term immediately retaliated why the mess can be costly for the US ट्रंप के पहले कार्यकाल से ही तैयार था चीन, तुरंत किया पलटवार; क्यों US को भी महंगा पड़ सकता है पंगा, International Hindi News - Hindustan
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ट्रंप के पहले कार्यकाल से ही तैयार था चीन, तुरंत किया पलटवार; क्यों US को भी महंगा पड़ सकता है पंगा

  • अमेरिका द्वारा लगाए गए टैरिफ के जवाब में, चीन ने रक्षा, स्वच्छ ऊर्जा और अन्य महत्वपूर्ण उद्योगों में इस्तेमाल किए जाने वाले पांच धातुओं के निर्यात पर सख्त नियंत्रण लागू कर दिया है।

Tue, 4 Feb 2025 03:20 PMAmit Kumar लाइव हिन्दुस्तान, बीजिंग
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ट्रंप के पहले कार्यकाल से ही तैयार था चीन, तुरंत किया पलटवार; क्यों US को भी महंगा पड़ सकता है पंगा

अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा चीनी वस्तुओं पर 10% अतिरिक्त शुल्क लगाने के तुरंत बाद, चीन ने भी जवाबी कदम उठाते हुए अमेरिकी उत्पादों पर टैरिफ लगा दिया और गूगल के खिलाफ जांच की घोषणा की। यह घटनाक्रम वैश्विक व्यापार पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है और दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं को चुनौती दे सकता है। खासतौर से चीन के लिए अब हालात पहले जैसे नहीं है। ऐसा कहा जा रहा है कि मौजूदा तनाव अमेरिका को भी महंगा पड़ सकता है।

चीन की जवाबी कार्रवाई

चीन ने अमेरिकी कोयला और लिक्विड नेचुरल गैस (LNG) पर 15% शुल्क लगाया, जबकि तेल और कृषि उपकरणों पर 10% टैरिफ लागू किया। इसके साथ ही, चीन ने अमेरिकी टेक्नोलॉजी दिग्गज गूगल के खिलाफ एंटी-ट्रस्ट (प्रतिस्पर्धा विरोधी) जांच शुरू कर दी है। इसके अलावा, कैल्विन क्लेन ब्रांड की मालिक पीवीएच कॉर्प (PVH Corp) और अमेरिकी जेनेटिक रिसर्च कंपनी इल्यूमिना (Illumina Inc.) को ब्लैकलिस्ट कर दिया गया है। चीन ने टंगस्टन से संबंधित सामग्रियों के निर्यात पर भी सख्त नियंत्रण लागू कर दिया है।

पहले के अनुभवों से चीन ने लिया सबक

यह पहली बार नहीं है जब चीन को अमेरिकी टैरिफ का सामना करना पड़ा है। ट्रंप प्रशासन के पहले कार्यकाल के दौरान भी दोनों देशों के बीच व्यापार युद्ध चरम पर था। उस दौरान चीन को आर्थिक रूप से कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, जिससे उसने अब रणनीतिक रूप से कई बदलाव किए हैं। चीन ने व्यापारिक विविधीकरण की नीति अपनाई है और अमेरिका पर निर्भरता कम करने के लिए दक्षिण-पूर्व एशिया (ASEAN), मध्य एशिया और अफ्रीका में व्यापार संबंध मजबूत किए हैं। इसके अलावा, कई चीनी कंपनियों ने अपने विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) संयंत्रों को वियतनाम और मलेशिया जैसे देशों में शिफ्ट कर दिया है ताकि अमेरिकी प्रतिबंधों का प्रभाव कम किया जा सके। ट्रंप ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान चीनी उत्पादों पर 60% शुल्क लगाने की बात कही थी, लेकिन फिलहाल लगाए गए 10% शुल्क को ऐसा माना जा रहा है जिसे चीन आराम से हैंडल कर सकता है। विश्लेषकों का मानना है कि चीन के पास अब भी अमेरिका के साथ बातचीत का अवसर है।

चीन का महत्वपूर्ण खनिज निर्यात पर है कंट्रोल

अमेरिका द्वारा लगाए गए टैरिफ के जवाब में, चीन ने रक्षा, स्वच्छ ऊर्जा और अन्य महत्वपूर्ण उद्योगों में इस्तेमाल किए जाने वाले पांच धातुओं के निर्यात पर सख्त नियंत्रण लागू कर दिया है। इन धातुओं में टंगस्टन, टेल्यूरियम, बिस्मथ, इंडियम और मोलिब्डेनम शामिल हैं, जिनका इस्तेमाल सौर पैनलों, परमाणु अनुसंधान और बख्तरबंद गोले (आर्मर-पियर्सिंग शेल्स) में किया जाता है। चीन का इन धातुओं के उत्पादन और परिष्करण (रिफाइनिंग) में वैश्विक स्तर पर वर्चस्व है। अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) के अनुसार, अमेरिका ने 2015 के बाद से टंगस्टन का खनन बंद कर दिया है और 1997 के बाद से परिष्कृत बिस्मथ का उत्पादन नहीं किया है। चीन के वाणिज्य मंत्रालय ने इन नए प्रतिबंधों को 'राष्ट्रीय सुरक्षा हितों की रक्षा' के लिए आवश्यक बताया है। इसका मतलब यह है कि चीन अपनी प्राकृतिक संसाधनों की शक्ति का उपयोग अमेरिका पर दबाव बनाने के लिए कर रहा है।

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क्या होगा इस व्यापार युद्ध का असर?

इस व्यापारिक टकराव का प्रभाव न केवल अमेरिका और चीन पर पड़ेगा, बल्कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला भी इससे प्रभावित होगी। अमेरिकी कंपनियों को टंगस्टन और अन्य महत्वपूर्ण धातुओं के लिए वैकल्पिक स्रोतों की तलाश करनी होगी, जिससे उत्पादन लागत बढ़ सकती है। वहीं, चीन के निर्यात प्रतिबंधों से अमेरिकी रक्षा और टेक्नोलॉजी उद्योगों को झटका लग सकता है। यह देखना दिलचस्प होगा कि दोनों देश इस व्यापार युद्ध को कैसे संभालते हैं। क्या यह एक दीर्घकालिक संघर्ष बनेगा, या फिर कूटनीतिक वार्ताओं से समाधान निकलेगा? वैश्विक बाजारों और निवेशकों की नजरें अब अमेरिका और चीन के अगले कदमों पर टिकी हुई हैं।

अमेरिकी ‘चुनौती स्वीकार’ करने के संकेत

अल जजीरा ने सिंगापुर स्थित हिनरिच फाउंडेशन में ट्रेड पॉलिसी की प्रमुख डेबराह एल्म्स के हवाले से लिखा है कि अमेरिका के टैरिफ फैसले के खिलाफ चीन की प्रतिक्रिया अपेक्षित थी और यह स्पष्ट करता है कि बीजिंग व्हाइट हाउस द्वारा जारी चुनौती का सामना करने के लिए तैयार है। एल्म्स ने कहा, “ऐसा कभी नहीं माना जा सकता था कि चीन विश्व व्यापार संगठन (WTO) में सिर्फ एक विवाद दर्ज कराकर मामले को छोड़ देगा।” उन्होंने यह बात ट्रंप के टैरिफ फैसले के बाद चीन की शुरुआती प्रतिक्रिया के संदर्भ में कही।

एल्म्स ने बताया कि अमेरिका की ओर से न केवल सभी उत्पादों पर अतिरिक्त 10 प्रतिशत टैरिफ लगाए गए हैं बल्कि ‘डी मिनिमस नियमों’ में भी बदलाव किए गए हैं। ये नियम छोटे बाजार छूटों के प्रबंधन से जुड़े होते हैं। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि चीन की प्रतिक्रिया केवल टैरिफ के बदले टैरिफ तक सीमित नहीं है। एल्म्स ने कहा, “ध्यान दें कि चीन ने केवल टैरिफ लगाने के बजाय एंटीट्रस्ट और एंटिटी लिस्ट विस्तार जैसे कदम उठाए हैं। यह इस बात का संकेत है कि चीन केवल टैरिफ का टैरिफ से जवाब नहीं देता।”

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