Bangladesh minority leader Neem Chandra Bhowmick demands action against atrocities before elections 2026 बांग्लादेश में हिंदुओं पर बढ़ते अत्याचार; चुनाव से पहले इस नेता ने यूनुस सरकार से की ये मांग, अब क्या होगा?, International Hindi News - Hindustan
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बांग्लादेश में हिंदुओं पर बढ़ते अत्याचार; चुनाव से पहले इस नेता ने यूनुस सरकार से की ये मांग, अब क्या होगा?

बांग्लादेश हिंदू बौद्ध ईसाई एकता परिषद के अध्यक्ष नीम चंद्र भौमिक ने न्यूज एजेंसी एएनआई से बात करते हुए कहा कि अल्पसंख्यक समुदाय आगामी चुनावों में भाग लेना चाहता है, लेकिन इसके लिए अनुकूल और सुरक्षित माहौल जरूरी है।

Thu, 29 Jan 2026 09:45 PMDevendra Kasyap लाइव हिन्दुस्तान
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बांग्लादेश में हिंदुओं पर बढ़ते अत्याचार; चुनाव से पहले इस नेता ने यूनुस सरकार से की ये मांग, अब क्या होगा?

बांग्लादेश में 12 फरवरी को होने वाले चुनाव से पहले अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ती जा रही है। सांप्रदायिक हिंसा और उत्पीड़न के आरोपों के बीच एक प्रमुख अल्पसंख्यक नेता ने सरकार से सख्त कार्रवाई की मांग की है। बांग्लादेश हिंदू बौद्ध ईसाई एकता परिषद के अध्यक्ष नीम चंद्र भौमिक ने न्यूज एजेंसी एएनआई से बात करते हुए कहा कि अल्पसंख्यक समुदाय आगामी चुनावों में भाग लेना चाहता है, लेकिन इसके लिए अनुकूल और सुरक्षित माहौल जरूरी है। उन्होंने कहा कि चुनाव से जुड़ी चुनौतियों का समाधान चुनाव आयोग, सरकारी प्रशासन और राजनीतिक दलों सहित सभी प्रमुख हितधारकों की भागीदारी से होना चाहिए, लेकिन फिलहाल ऐसा नहीं हो रहा है।

भौमिक ने कहा कि राजनीतिक दलों को केवल मुक्ति युद्ध में विश्वास जताने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसके मूल्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को व्यवहार में दिखाना चाहिए। उन्होंने अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और उनके खिलाफ हुए अत्याचारों पर कार्रवाई को अनिवार्य बताया तथा स्वतंत्र, निष्पक्ष और विश्वसनीय चुनाव की मांग दोहराई। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश की स्थापना मुक्ति युद्ध के मूल्यों ( समानता, मानवीय गरिमा और सामाजिक न्याय) पर आधारित है, जिसके आधार पर 1972 में एक धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक संविधान अपनाया गया था।

भौमिक ने देश में अल्पसंख्यकों पर हो रहे उत्पीड़न और अत्याचार के मामलों को उठाते हुए न्याय की मांग की और सरकार की उदासीनता पर गहरी चिंता जताई। उनका कहना था कि अब तक इन शिकायतों की जांच के लिए कोई आयोग तक गठित नहीं किया गया है। उन्होंने कहा कि 1971 से पहले देश में अल्पसंख्यकों की आबादी लगभग 20 प्रतिशत थी, जबकि अब सरकार इसे 10 प्रतिशत बताती है। भौमिक के अनुसार, यह गिरावट बड़े पैमाने पर भेदभाव, उत्पीड़न और अत्याचार के कारण हुए पलायन का नतीजा है, जिसे सरकार स्वीकार करने से बच रही है।

सांप्रदायिक हिंसा के आंकड़े पेश

आगामी 13वें राष्ट्रीय संसदीय चुनाव से पहले आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बांग्लादेश हिंदू बौद्ध ईसाई एकता परिषद ने जनवरी से दिसंबर 2025 के बीच हुई सांप्रदायिक हिंसा का आंशिक ब्यौरा पेश किया। परिषद के अनुसार, इस अवधि में सांप्रदायिक हिंसा की कुल 522 घटनाएं दर्ज की गईं। इनमें 61 हत्या की घटनाएं शामिल हैं, जिनमें 66 लोगों की जान गई। महिलाओं के खिलाफ हिंसा की 28 घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें बलात्कार और सामूहिक बलात्कार के मामले शामिल हैं।

वहीं, पूजा स्थलों पर हमले, मूर्ति तोड़फोड़, लूटपाट और आगजनी की 95 घटनाएं सामने आईं। इसके अलावा पूजा स्थलों की भूमि पर कब्जे की 21 घटनाएं, घरों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों पर हमलों की 102 घटनाएं, अपहरण और जबरन वसूली की 38 घटनाएं, जान से मारने की धमकी और यातना की 47 घटनाएं तथा कथित धार्मिक निंदा के आरोपों में 36 लोगों की गिरफ्तारी और यातना के मामले दर्ज किए गए।

सरकार पर सांप्रदायिक हिंसा को नकारने का आरोप

परिषद ने अपने बयान में अंतरिम सरकार की कड़ी आलोचना करते हुए आरोप लगाया कि वह सांप्रदायिकता की नई और सीमित परिभाषा गढ़ने की कोशिश कर रही है। बयान में सवाल उठाया गया कि क्या सरकार केवल मंदिरों या पूजा स्थलों में होने वाली हिंसा को ही सांप्रदायिक मानती है, जबकि समाज और राज्य में होने वाली अन्य घटनाओं को नहीं। बयान के अनुसार, दर्ज की गई 173 मौतों में से केवल एक हत्या को सरकार ने सांप्रदायिक हत्या माना है, जबकि 58 हिंदू महिलाओं के साथ हुए बलात्कार के मामलों को भी गैर-सांप्रदायिक करार दिया गया। परिषद ने इस तरह की परिभाषा को 'बेतुकी' बताते हुए कड़ी निंदा की।

चुनाव आयोग से निष्पक्ष माहौल की मांग

वहीं चुनावों चुनावों को देखते हुए परिषद ने चुनाव आयोग से मांग की है कि वह निष्पक्ष और सकारात्मक माहौल सुनिश्चित करे, ताकि धार्मिक और जातीय अल्पसंख्यक मतदाता बिना डर के मतदान केंद्रों तक पहुंच सकें। साथ ही चुनाव प्रचार में धर्म और सांप्रदायिकता के इस्तेमाल पर रोक लगाने, धार्मिक स्थलों के राजनीतिक उपयोग को प्रतिबंधित करने और धार्मिक घृणा फैलाने वाले भाषण, झूठी अफवाहों और दुष्प्रचार को दंडनीय अपराध घोषित करने की मांग भी की गई है।

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