स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बाईपास करने में क्यों फेल रही दुनिया, भारत के लिए यह रूट कितना जरूरी?
खाड़ी देशों के बीच गहरे अविश्वास ने सीमा पार पाइपलाइन परियोजनाओं को बाधित किया। उदाहरण के लिए, इराक-तुर्की और इराक-सऊदी अरब पाइपलाइनें राजनीतिक विवादों की भेंट चढ़ गईं।

Strait of Hormuz: दशकों से दुनिया के तेल बाजार में एक ही सवाल गूंज रहा है। अगर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद हो गया तो क्या होगा? 2026 के मौजूदा संकट ने इस सवाल का जवाब बेहद डरावने तरीके से दिया है। वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 20-30% हिस्सा इसी संकरे जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। इसके बावजूद दुनिया इस रूट का कोई ठोस विकल्प तैयार करने में विफल रही। आज जब युद्ध के कारण यह रास्ता बाधित है, तो इसका सीधा असर भारत की रसोई से लेकर वैश्विक शेयर बाजारों तक दिख रहा है।
1980 के दशक के टैंकर युद्ध के बाद से ही मिडिल ईस्ट के देशों ने होर्मुज को दरकिनार करने के लिए कई पाइपलाइन प्रोजेक्ट्स पर विचार किया। लेकिन इनमें से अधिकांश योजनाएं कागजों से बाहर नहीं निकल पाईं। विशेषज्ञों का मानना था कि जब तक कोई वास्तविक संकट न आए, अरबों डॉलर की पाइपलाइन बिछाना आर्थिक रूप से घाटे का सौदा है। देशों ने उस बुनियादी ढांचे पर निवेश करने से परहेज किया जिसकी जरूरत शायद कभी न पड़ती।
क्यों फेल हुई पाइपलाइन परियोजना?
खाड़ी देशों के बीच गहरे अविश्वास ने सीमा पार पाइपलाइन परियोजनाओं को बाधित किया। उदाहरण के लिए, इराक-तुर्की और इराक-सऊदी अरब पाइपलाइनें राजनीतिक विवादों की भेंट चढ़ गईं। कई देशों को लगता था कि अगर कभी होर्मुज बंद भी हुआ, तो अमेरिका अपनी सैन्य शक्ति के बल पर उसे चंद दिनों में खुलवा देगा। इसी भरोसे ने उन्हें वैकल्पिक रास्तों के प्रति लापरवाह बनाए रखा।
चीन ने पिछले दशक में अपनी ऊर्जा आपूर्ति के स्रोतों में विविधता लाते हुए होर्मुज पर निर्भरता को कम करने के लिए मध्य एशिया और रूस के साथ नए गलियारे विकसित किए। वहीं, रणनीतिक रूप से ईरान ने गोरेह-जास्क पाइपलाइन बनाई, जो उसे होर्मुज के बाहर से तेल निर्यात करने की सुविधा देती है। साथ ही उसने अन्य देशों के वैकल्पिक रास्तों (जैसे सऊदी की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन) को ड्रोन और मिसाइल हमलों के प्रति असुरक्षित साबित कर अपनी ताकत का अहसास कराया।
भारत के लिए यह रूट क्यों है लाइफलाइन?
भारत अपनी जरूरत का 85-90% कच्चा तेल आयात करता है। इसमें से आधा हिस्सा इसी स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से होकर आता है। 2026 के इस संकट ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर गहरा आघात किया है। भारत अपनी एलपीजी (LPG) खपत का 60% और एलएनजी (LNG) का 50% आयात करता है। सबसे डराने वाली बात यह है कि इस आयात का 90% हिस्सा होर्मुज के रास्ते ही आता है। कच्चे तेल के लिए तो भारत के पास रणनीतिक भंडार हैं, लेकिन रसोई गैस के लिए ऐसे बड़े बफर स्टॉक की कमी है।
क्या है आगे का रास्ता?
2026 का यह संकट एक कड़वा सबक है। अब दुनिया और विशेषकर भारत यह समझ रहे हैं कि समाधान केवल पाइपलाइन बिछाने में नहीं, बल्कि एक नए क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे में है। भारत के लिए अब अनिवार्य हो गया है कि वह अपनी ऊर्जा रणनीति को 'सेल्फ-रिलायंस' की ओर तेजी से मोड़े। सौर, पवन और परमाणु ऊर्जा के लक्ष्यों को बढ़ाना अब केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का सवाल बन गया है। जब तक दुनिया इस चोकपॉइंट पर निर्भर रहेगी, वैश्विक अर्थव्यवस्था की चाबी हमेशा उन ताकतों के हाथ में रहेगी जो इस संकरे रास्ते को हथियार बना सकते हैं।
लेटेस्ट Hindi News , बॉलीवुड न्यूज, बिजनेस न्यूज, टेक , ऑटो, करियर , और राशिफल, पढ़ने के लिए Live Hindustan App डाउनलोड करें।




साइन इन