ईरान के साथ सीजफायर के लिए ट्रंप ने पाकिस्तान को ही क्यों चुना? क्या कहता है इतिहास
इस समय परिस्थिति बदली हुई है। एक ऐसे वार्ताकार की जरूरत है जिसके पास सैन्य शक्ति हो, वाशिंगटन से सीधा संपर्क हो और तेहरान से इतनी नजदीकी हो कि वह विश्वसनीय लगे। पाकिस्तान इन सभी मानदंडों पर खरा उतरता है।
Iran War Updates: ईरान और अमेरिका के बीच जारी संघर्ष के बीच एक राहत की खबर आई कि दोनों देशों के बीच सीजफायर की कोशिशें शुरू हो सकती हैं। इसके लिए पाकिस्तान बिचौलिया की भूमिका निभा सकता है। यह कोई पहली बार नहीं है जब पाकिस्तान इस भूमिका में दिखेगा। इससे पहले भी उसने ईरान और अमेरिका के बीच समझौते कराए हैं। इसके अलावा भरत के पड़ोसी देश ने चीन और अमेरिका के बीच जारी शीत युद्ध के दौरान समझौता कराया था।
अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता करने का पाकिस्तान का एक इतिहास रहा है। 1981 से ही पाकिस्तान अमेरिका और ईरान के बीच ऐतिहासिक रूप से मध्यस्थता करता रहा है। पर्दे के पीछे दोनों देशों को एक पटरी पर लाने की कोशिश की गई थी। ऐसा इसलिए भी जरूरी था क्योंकि 1979 के बाद से वॉशिंगटन में ईरान का कोई दूतावास नहीं है। अमेरिका में मौजूद पाकिस्तानी दूतावास के भीतर ही ईरान का 'इंटरेस्ट्स सेक्शन' काम करता है। इसकी वजह से पाकिस्तान की भूमिका बढ़ जाती है।
पाक से करीबी रिश्ते
पाकिस्तान के ईरान और ट्रंप प्रशासन दोनों के साथ करीबी रिश्ते हैं। मुनीर पिछले साल जून और सितंबर में ट्रंप से मिले थे। सितंबर की मुलाकात के दौरान शरीफ भी उनके साथ मौजूद थे। इस बीच शरीफ ने सोमवार को ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के साथ फोन पर बातचीत में पश्चिम एशिया में तनाव कम करने के लिए मिलकर कोशिशें करने की फौरी जरूरत पर जोर दिया।
चीन-अमेरिका में कराया था समझौता
पाकिस्तान के हथियारों का ज्यादातर आयात चीन से होता है। चीन के हथियारों के निर्यात का भी ज्यादातर हिस्सा इसी देश को जाता है। दोनों देशों ने आम तौर पर एक ऐसी द्विपक्षीय नीति अपनाई है, जिसका मुख्य जोर सभी क्षेत्रों में अपने गठबंधन को मजबूत करने पर है। मुस्लिम देशों के साथ चीन के मुख्य सेतु के रूप में काम करते हुए पाकिस्तान ने चीन और अमेरिका के बीच संवाद की खाई को पाटने में भी एक अहम भूमिका निभाई है। 1972 में रिचर्ड निक्सन की चीन यात्रा के जरिए इसकी कोशिश की गई थी।
पहले ओमान कराता था समझौता
11 सितंबर की घटना के बाद परवेज मुशर्रफ के अचानक हुए बदलाव के बाद से पाकिस्तान ने अमेरिकी रणनीतिक सोच के केंद्र में इतनी तेजी और महत्वाकांक्षा से प्रवेश नहीं किया है। 2001 में वाशिंगटन मजबूरी में पाकिस्तान के पास गया था। इस बार पाकिस्तान वाशिंगटन के पास एक प्रस्ताव लेकर आया है। आम धारणा हमेशा से यही रही है कि अमेरिका-ईरान के बीच बातचीत का जिम्मा ओमान के हाथों में रहा है। 2015 के जेसीपीओए परमाणु समझौते के लिए गुप्त मध्यस्थता उसी ने की थी। कतर ने अपनी पूरी विदेश नीति को क्षेत्र के पसंदीदा मध्यस्थता मंच के रूप में स्थापित किया है।
पाकिस्तान में 4 करोड़ शिया मुसलमान
इस समय परिस्थिति बदली हुई है। एक ऐसे वार्ताकार की जरूरत है जिसके पास सैन्य शक्ति हो, वाशिंगटन से सीधा संपर्क हो और तेहरान से इतनी नजदीकी हो कि वह विश्वसनीय लगे। पाकिस्तान इन सभी मानदंडों पर खरा उतरता है। धार्मिक तौर पर देखें तो ईरान के बाद पाकिस्तान में दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी शिया मुस्लिम आबादी है। यहां लगभग 4 करोड़ लोग इस समुदाय से आते हैं।
ओमान या कतर के विपरीत, पाकिस्तान एक परमाणु-सशस्त्र राज्य है जो परमाणु आकांक्षी देश और परमाणु महाशक्ति के बीच मध्यस्थता कर रहा है। इस मामले में इसकी हिस्सेदारी उस तरह से है जो किसी अन्य खाड़ी व्यापारिक देश की नहीं हो सकती। मुनीर ने ट्रंप के साथ सीधा व्यक्तिगत संबंध विकसित किया है, जो मई 2025 में भारत-पाकिस्तान युद्धविराम के दौरान बना था।
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