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खालिस्तान को दिया बढ़ावा, अब खुद उसी आग में झुलसा कनाडा? हाथ से ना निकल जाए अमीर राज्य

भारत के मामले में कनाडा अक्सर पश्चिमी देशों का समर्थन मांगता था। अब उसे डर है कि अमेरिका कहीं अल्बर्टा के तेल भंडार के लालच में इस अलगाववादी आंदोलन को 'लेवरेज' (दबाव बनाने का जरिया) न बना ले।

Fri, 30 Jan 2026 02:21 PMAmit Kumar लाइव हिन्दुस्तान, ओटावा
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खालिस्तान को दिया बढ़ावा, अब खुद उसी आग में झुलसा कनाडा? हाथ से ना निकल जाए अमीर राज्य

कनाडा-अमेरिका तनाव के बीच यह कहना गलत नहीं होगा कि नियति का पहिया घूमकर वापस वहीं आ गया है। जिस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकारों की आड़ में कनाडा भारत के अलगाववादी तत्वों (खालिस्तान समर्थकों) को पनाह देता रहा है आज वही तर्क उसके अपने सबसे महत्वपूर्ण प्रांत अल्बर्टा के अलगाववादी दे रहे हैं। भारत अक्सर कहता रहा है कि अलगाववाद को हवा देना एक दोधारी तलवार है। दरअसल कनाडा का तेल समृद्ध प्रांत अल्बर्टा देश से अलग होने की मांग कर रहा है। इस आंदोलन का नेतृत्व 'अल्बर्टा प्रोस्पेरिटी प्रोजेक्ट' (APP) नामक समूह कर रहा है। अब इस आग में घी डालने का काम किया है अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सरकार ने।

विवाद की मुख्य वजह- बागियों के साथ गुप्त बैठकें और अरबों का कर्ज

सबसे चौंकाने वाला खुलासा यह हुआ है कि अल्बर्टा प्रोस्पेरिटी प्रोजेक्ट के नेताओं ने अमेरिकी अधिकारियों के साथ उच्च स्तरीय बैठकें की हैं। इसके प्रतिनिधियों ने पिछले कुछ महीनों में अमेरिकी विदेश विभाग के साथ कम से कम तीन बैठकें की हैं। फरवरी 2026 में एक और महत्वपूर्ण बैठक होने वाली है, जिसमें अमेरिकी वित्त विभाग के शामिल होने की खबर है। अल्बर्टा प्रोस्पेरिटी प्रोजेक्ट ने अमेरिका से 500 बिलियन डॉलर की ऋण सुविधा मांगी है ताकि आजादी के पहले दिन से ही अर्थव्यवस्था को संभाला जा सके।

कनाडा के लिए क्या है अल्बर्टा का महत्व?

अल्बर्टा कनाडा का सबसे अमीर प्रांत है और देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। कनाडा के कुल प्रमाणित तेल भंडार का 90% और वर्तमान उत्पादन का 80% हिस्सा इसी प्रांत से आता है। अलगाववादी समूह का तर्क है कि वे केंद्र सरकार की ऊर्जा नीतियों और भारी टैक्स से परेशान हैं। वे ब्रिटिश कोलंबिया और ओटावा की मंजूरी के बिना अमेरिका के माध्यम से नए पाइपलाइन रास्ते बनाने पर भी चर्चा कर रहे हैं।

क्या रही अब तक की कूटनीतिक प्रतिक्रिया?

इस खबर के बाहर आते ही कनाडा के भीतर गुस्से की लहर दौड़ गई है। प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने सार्वजनिक रूप से अमेरिका को चेतावनी देते हुए कहा है कि उन्हें उम्मीद है कि अमेरिकी प्रशासन कनाडा की संप्रभुता का सम्मान करेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे राष्ट्रपति ट्रंप के साथ अपनी हर बातचीत में इस बात को मजबूती से रखते हैं। हालांकि, उन्होंने इन बैठकों को सीधे तौर पर राजद्रोह कहने से परहेज किया, ताकि तनाव और न बढ़े।

ब्रिटिश कोलंबिया के प्रीमियर (मुख्यमंत्री) डेविड ईबी ने इसे राजद्रोह करार दिया है। ओंटारियो के सीएम डग फोर्ड ने इसे अनैतिक बताते हुए अल्बर्टा की वर्तमान प्रीमियर डेनियल स्मिथ से इस आंदोलन की निंदा करने को कहा है।

हालांकि ट्रंप प्रशासन ने इसे सामान्य मुलाकात बताया है, लेकिन अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट द्वारा अल्बर्टा को एक स्वाभाविक भागीदार कहना ओटावा के लिए चिंता का विषय बन गया है। अमेरिका में 'मेक अमेरिका ग्रेट अगेन' यानी ट्रंप समर्थक इस स्थिति का मजा ले रहे हैं। कुछ सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स तो मजाक में कनाडा के प्रांतों के अमेरिका में विलय की खुलकर बात कर रहे हैं।

कनाडा के प्रमुख अखबारों में क्या लिखा?

अखबारों ने इसे कनाडा की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक वेक-अप कॉल बताया है। द ग्लोब एंड मेल के संपादकीय में तर्क दिया गया है कि विदेशी ताकतों (विशेषकर अमेरिका के MAGA गुट) का समर्थन अलगाववाद की आग में घी डालने जैसा है। ओटावा को अल्बर्टा की वास्तविक आर्थिक शिकायतों को दूर करना होगा, वरना बाहरी हस्तक्षेप की गुंजाइश बनी रहेगी।

नेशनल पोस्ट अखबार का झुकाव अक्सर कंजर्वेटिव विचारों की ओर रहता है, लेकिन इसने भी विदेशी सहायता मांगने की निंदा की है। इसने $500 बिलियन की क्रेडिट लाइन की मांग को हास्यास्पद और अवास्तविक बताया गया है। अखबार के मुताबिक, अल्बर्टा का मुद्दा पूरी तरह से घरेलू है और इसमें वाशिंगटन को शामिल करना कनाडा के संघीय ढांचे के साथ खिलवाड़ है।

दूसरों के मामलों में डबल स्टैंडर्ड अपनाता रहा है कनाडा

कनाडा ने हमेशा भारत की संप्रभुता से जुड़े मुद्दों को सिख डायस्पोरा की चिंता बताकर नजरअंदाज किया। लेकिन जब बात अल्बर्टा की आई, तो ओटावा की भाषा रातों-रात बदल गई। भारत जब कनाडा में खालिस्तानी गतिविधियों पर चिंता जताता था, तो ओटावा इसे 'घरेलू राजनीति' कहता था। लेकिन अब जब अल्बर्टा के नेता अमेरिका जाकर मदद मांग रहे हैं, तो कनाडा के नेता इसे राजद्रोह और विदेशी हस्तक्षेप करार दे रहे हैं। खालिस्तानी उग्रवाद पर नरम रहने वाले कनाडाई राजनेता अब अल्बर्टा के अल्बर्टा प्रोस्पेरिटी प्रोजेक्ट को देश की एकता के लिए खतरा बता रहे हैं।

जिस तरह खालिस्तानी समर्थक कनाडा की धरती का इस्तेमाल भारत के खिलाफ करते हैं, वैसे ही अल्बर्टा के अलगाववादी अब अमेरिकी धरती का इस्तेमाल कनाडा के खिलाफ वित्तीय सहायता और मान्यता प्राप्त करने के लिए कर रहे हैं। अल्बर्टा का अलग होना कनाडा के लिए आर्थिक आत्महत्या जैसा होगा, क्योंकि कनाडा की तेल संपदा का केंद्र यही प्रांत है। कनाडा ने कनाडा में होने वाले तथाकथित खालिस्तान जनमत संग्रह को अवैध घोषित करने से इनकार कर दिया था। अब अल्बर्टा के अलगाववादी 2026 में खुद कनाडा के खिलाफ एक आधिकारिक जनमत संग्रह की तैयारी कर रहे हैं।

'बोया पेड़ बबूल का' जैसी स्थिति है?

विशेषज्ञों का मानना है कि कनाडा की मौजूदा सरकार ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अलगाववाद को एक 'सॉफ्ट' रुख दिया, जिससे देश के भीतर के असंतुष्ट गुटों को भी बल मिला। अगर कनाडा अल्बर्टा को वाशिंगटन जाने से रोकता है, तो वह उन तर्कों को खो देगा जो उसने भारत के खिलाफ इस्तेमाल किए थे। भारत के मामले में कनाडा अक्सर पश्चिमी देशों का समर्थन मांगता था। अब उसे डर है कि अमेरिका कहीं अल्बर्टा के तेल भंडार के लालच में इस अलगाववादी आंदोलन को 'लेवरेज' (दबाव बनाने का जरिया) न बना ले।

आगे क्या होगा?

अल्बर्टा के कानून के अनुसार, जनमत संग्रह कराने के लिए इस समूह को मई 2026 की शुरुआत तक 177,732 वैध हस्ताक्षरों की आवश्यकता है। वर्तमान में सर्वे बताते हैं कि लगभग 30% आबादी अलग होने के पक्ष में है। यह स्थिति कनाडा के लिए 1995 के क्यूबेक जनमत संग्रह के बाद सबसे बड़ा संवैधानिक संकट बन सकती है।

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