हमला हुआ तो 'तालिबान' की तरह लड़ेगा कनाडा, अमेरिका के खिलाफ क्या है 'गुरिल्ला वॉर' का प्लान?
भले ही युद्ध की संभावना कम हो, लेकिन यह रिपोर्ट बताती है कि जब महाशक्तियां आक्रामक होती हैं, तो पुराने दोस्तों को भी अपनी पिस्तौल साफ रखनी पड़ती है। जानिए आखिर क्या तैयारी कर रहा है कनाडा?

सोचिए, दुनिया के दो सबसे पुराने और करीबी दोस्त- अमेरिका और कनाडा एक-दूसरे के खिलाफ बंदूकें तान लें। सुनने में यह किसी हॉलीवुड फिल्म की कहानी लगती है, लेकिन कनाडा के रक्षा महकमे में आजकल इसी 'अकल्पनीय' स्थिति पर मंथन चल रहा है।
'द ग्लोब एंड मेल' की एक रिपोर्ट ने भू-राजनीति की दुनिया में हलचल मचा दी है। रिपोर्ट के मुताबिक, कनाडा की सेना इस बात का मॉडल तैयार कर रही है कि अगर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका उन पर आक्रमण करता है, तो जवाब कैसे दिया जाए। यह तैयारी तब शुरू हुई जब ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से कनाडा को अमेरिका का संभावित '51वां राज्य' बताया।
2 से 7 दिन में गिर सकता है कनाडा!
कनाडा के रक्षा अधिकारियों को किसी मुगालते में नहीं रहना है। रिपोर्ट में नाम न छापने की शर्त पर अधिकारियों ने बताया कि उन्हें अमेरिकी सेना की ताकत का पूरा अंदाजा है।
कनाडा के वॉर-गेम मॉडल का अनुमान बेहद डरावना है। उनका मानना है कि अगर अमेरिका दक्षिण (बॉर्डर) से हमला करता है, तो वह महज 2 से 7 दिनों के भीतर कनाडा की थल और नौसेना की स्थिति को ध्वस्त कर देगा। अमेरिकी सेना दुनिया की सबसे शक्तिशाली सेना है, जबकि कनाडा की सेना उसके सामने बेहद छोटी है।
'अफगानिस्तान मॉडल': कनाडा का प्लान-B क्या है?
जब सीधी लड़ाई में जीतना नामुमकिन हो, तो रणनीति बदलनी पड़ती है। कनाडाई सेना ने जिस जवाबी कार्रवाई की योजना बनाई है, वह उसी रणनीति पर आधारित है जो तालिबान ने अफगानिस्तान में अमेरिका और खुद कनाडाई सेना के खिलाफ अपनाई थी। इसे सैन्य भाषा में 'असममित युद्ध' (Asymmetrical Warfare) कहा जाता है।
इस 'सबसे खराब स्थिति' में कनाडा की रणनीति कुछ ऐसी होगी:
गुरिल्ला युद्ध: सेना छोटी-छोटी टुकड़ियों में बंट जाएगी। इसमें अनियमित लड़ाके और हथियारबंद नागरिक शामिल होंगे।
हिट-एंड-रन: घात लगाकर हमला करना और फिर गायब हो जाना।
IED का इस्तेमाल: इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइसेज (बम धमाकों) के जरिए अमेरिकी काफिलों को निशाना बनाना।
उत्तरी किलों की ओर पीछे हटना: कनाडाई सेना पीछे हटकर सुदूर उत्तरी इलाकों के 'किलों' में शरण लेगी, क्योंकि कनाडा का भूगोल इतना विशाल है कि पूरे देश पर कब्जा करना अमेरिका के लिए भी लोहे के चने चबाने जैसा होगा।
आखिर नौबत यहां तक क्यों आई?
अमेरिका और कनाडा के बीच 1812 के युद्ध के बाद से कभी कोई सशस्त्र संघर्ष नहीं हुआ है। लेकिन ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में रिश्ते तेजी से बिगड़े हैं।
ट्रंप का सोशल मीडिया पोस्ट: हाल ही में ट्रंप ने 'ट्रुथ सोशल' पर एक नक्शा पोस्ट किया जिसमें कनाडा और ग्रीनलैंड दोनों को अमेरिकी झंडे से ढका हुआ दिखाया गया था।
51वां राज्य: ट्रंप का यह बयान कि कनाडा अमेरिका का 51वां राज्य बन सकता है, ओटावा (कनाडा की राजधानी) में खतरे की घंटी बन गया।
आर्कटिक पर नजर: ट्रंप ग्रीनलैंड और आर्कटिक क्षेत्र में अमेरिका का वर्चस्व बढ़ाना चाहते हैं, जो कनाडा की संप्रभुता के लिए सीधा खतरा है।
हमला नहीं, असली खतरा 'दबाव' है
सेंटर फॉर इंटरनेशनल गवर्नेंस इनोवेशन के सीनियर फेलो वेस्ली वर्क का कहना है कि अमेरिकी सैन्य हमला अत्यंत असंभव है, लेकिन प्लानिंग जरूरी है। उन्होंने बताया कि यह योजना बिडेन प्रेसीडेंसी के दौरान मौजूद नहीं थी, इसे ट्रम्प की वापसी के बाद बनाया गया है।
असली डर सैन्य हमले का नहीं, बल्कि आर्थिक और राजनीतिक ब्लैकमेलिंग का है। अमेरिका अल्बर्टा और क्यूबेक जैसे राज्यों में अलगाववादी आंदोलनों को हवा दे सकता है। कनाडा के ऊर्जा संसाधनों, खनिजों और पानी पर जबरन कब्जा या खुली छूट की मांग कर सकता है। नॉर्थवेस्ट पैसेज (समुद्री रास्ते) पर संप्रभुता का विवाद फिर से खड़ा कर सकता है।
कनाडा का जवाब: हम कभी 51वां राज्य नहीं बनेंगे
कनाडा की विदेश मंत्री अनीता आनंद ने साफ शब्दों में कहा है- कनाडा कभी भी 51वां राज्य नहीं बनेगा। वहीं, प्रधानमंत्री मार्क कार्नी अब नाटो के साथ मिलकर अपनी स्थिति मजबूत कर रहे हैं। कनाडा खुद यूरोपीय देशों के साथ ग्रीनलैंड में अपने सैनिकों की एक छोटी टुकड़ी भेजने पर विचार कर रहा है और रक्षा बजट को जीडीपी के 5% तक ले जाने का लक्ष्य रखा है। भले ही युद्ध की संभावना कम हो, लेकिन यह रिपोर्ट बताती है कि जब महाशक्तियां आक्रामक होती हैं, तो पुराने दोस्तों को भी अपनी पिस्तौल साफ रखनी पड़ती है।
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