TET : लाखों टीचरों को झटका, शिक्षक भर्ती और प्रमोशन में टीईटी से छूट की योजना नहीं, केंद्र सरकार ने किया साफ
शिक्षा मंत्रालय ने यह स्पष्ट कर दिया है कि शिक्षक भर्ती और सेवारत शिक्षकों की प्रमोशन के लिए टीईटी अनिवार्य है। सरकार का यह ताजा रुख बगैर टीईटी नौकरी कर रहे देश के लाखों शिक्षकों के लिए तगड़ा झटका है जो राहत की उम्मीद कर रहे थे।

केंद्र सरकार के शिक्षा मंत्रालय ने यह स्पष्ट कर दिया है कि शिक्षकों की भर्ती और सेवारत शिक्षकों की प्रमोशन के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) अनिवार्य है। टीईटी की अनिवार्यता से छूट देने की सरकार की कोई योजना नहीं है। शिक्षा मंत्रालय में राज्य मंत्री जयंत चौधरी ने लोकसभा में एक प्रश्न के उत्तर में बताया कि सेवारत शिक्षक तब तक प्रमोशन पाने के योग्य नहीं होंगे, जब तक वे टीईटी पास नहीं कर लेते। उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार जिन शिक्षकों की नौकरी 5 वर्ष से अधिक बची है, उन्हें सितंबर 2025 (कोर्ट के फैसले की तिथि) से 2 साल के भीतर टीईटी पास करना ही होगा। जिनकी नौकरी 5 साल से कम बची है, वे बिना टीईटी के रिटायरमेंट तक पद पर बने रह सकते हैं, लेकिन उन्हें भी प्रमोशन का लाभ नहीं मिलेगा। संसद में सरकार ने दोहराया है कि आरटीई एक्ट 2009 की धारा 23 के तहत एनसीटीई ने कक्षा 1 से 8 तक के शिक्षक के रूप में नियुक्ति को लेकर पात्र होने के लिए न्यूनतम योग्यता तय की है। सरकार का यह ताजा रुख बगैर टीईटी नौकरी कर रहे देश के लाखों शिक्षकों के लिए तगड़ा झटका है जो राहत की उम्मीद कर रहे थे।
जयंत चौधरी ने कहा, 'आरटीई अधिनियम लागू होने से पहले भर्ती किए गए सेवारत शिक्षकों के संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए व्यवस्था दी है कि जिन शिक्षकों की सेवा 5 वर्ष से अधिक बची है, वे सेवा में बने रहने के लिए निर्णय की तारीख से दो वर्ष की अवधि के भीतर टीईटी पास कर सकते हैं। जिन शिक्षकों की सेवा निर्णय की तारीख तक पांच वर्ष से कम बची है, उन्हें टीईटी पास किए बिना सेवानिवृत्ति की आयु तक सेवा में बने रहने की अनुमति दी गई है, हालांकि ऐसे शिक्षक तब तक पदोन्नति के लिए पात्र नहीं होंगे जब तक वे टीईटी पास नहीं कर लेते। सर्वोच्च न्यायालय ने निर्देश दिया है कि आरटीई अधिनियम के तहत सांविधिक ढांचे के अनुसरण में शिक्षक के तौर पर नियुक्ति पाने की इच्छुक सभी लोगों के लिए साथ ही पदोन्नति के माध्यम से नियुक्ति की इच्छा रखने वाले सेवारत शिक्षकों के लिए भी योग्यता अनिवार्य है।'
किन सवालों पर आया जयंती चौधरी का जवाब
उत्तर प्रदेश की अंबेडकर नगर सीट से समाजवादी पार्टी (सपा) के सांसद लालजी वर्मा ने क्या पूछे थे सवाल
- क्या यह सच है कि राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एसीटीई) के दिशानिर्देशों के अनुसार वर्ष 2011 से पहले नियुक्त कई शिक्षक अभी भी देश में शिक्षक पात्रता परीक्षा से संबंधित अनिश्चितता और प्रशासनिक बाधाओं का सामना कर रहे हैं और यदि हां, तो इसका ब्योरा क्या है
- क्या सरकार इस बात से अवगत है कि वर्ष 2011 से पहले नियुक्त शिक्षकों की नियुक्ति उस समय लागू नियमों और प्रक्रियाओं के तहत की गई थी जब देश में टीईटी अनिवार्य नहीं था और यदि हां, तो इसका ब्यारो क्या है
क्या सरकार छूट देने पर विचार कर रही है?-- क्या सरकार का वर्ष 2011 से पहले विधिवत नियुक्त सभी शिक्षकों को टीईटी से पूरी तरह छूट देने के लिए एक स्पष्ट समान राष्ट्रीय नीति जारी करने का विचार है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि उनके साथ कोई अन्याय न हो और यदि हां, तो इसका ब्योरा दें
- क्या सरकार यह सुनिश्चित करने का प्रयास करेगी कि टीईटी के अभाव में वर्ष 2011 से पहले नियुक्त शिक्षकों की सेवाओं, पदोन्नति और अन्य अधिकारों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े तथा यदि हां, तो इसका ब्योरा दें, यदि नहीं, तो इसके क्या कारण हैं।
रिपोर्ट मांगे जाने से जगी थी उम्मीद
कुछ दिन पहले केन्द्र सरकार द्वारा राज्यों से पहली से 8वीं कक्षा के वर्ष 2011 से पहले नियुक्त शिक्षकों की रिपोर्ट मांगे जाने से 2011 से पूर्व नियुक्त देश के लाखों बगैर टीईटी वाले शिक्षकों में राहत की उम्मीद जगी थी। राज्यों को 16 जनवरी तक विस्तृत रिपोर्ट देनी थी। केंद्र ने सभी राज्यों के मुख्य सचिवों को पत्र लिखा था। लेकिन अब लोकसभा में सरकार के जवाब से बगैर टीईटी कार्यरत शिक्षकों के बीच मायूसी छा गई है।
क्या था सुप्रीम कोर्ट का फैसला
गौतलब है कि टीचरों को नौकरी में बने रहने या प्रमोशन पाने के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) को अनिवार्य करने संबंधी सुप्रीम कोर्ट के फैसले से देश भर के हजारों प्राइमरी शिक्षकों की नौकरी पर तलवार लटक गई है। यूपी, झारखंड, एमपी व राजस्थान समेत देश के विभिन्न राज्यों में ऐसे लाखों शिक्षक हैं जो बगैर टीईटी पास किए वर्षों से स्कूलों में पढ़ा रहे हैं। अब इन टीचरों को 2 साल में टीईटी पास करना ही होगा वरना या तो इन्हें इस्तीफा देना होगा या फिर इन्हें जबरन रिटायर कर दिया जाएगा। इस कड़े फैसले से सिर्फ उन्हें छूट मिलेगी जिनकी नौकरी 5 साल की बची है। लेकिन इन्हें भी अगर प्रमोशन चाहिए तो टीईटी पास करना ही पड़ेगा। सेवारत शिक्षकों के लिए टीईटी अनिवार्य किेए जाने के फैसले के खिलाफ तमिलनाडु व यूपी समेत कई राज्य पुनर्विचार याचिका दायर कर चुके हैं।
देशव्यापी आंदोलन
पिछले कई माह से लखनऊ से दिल्ली तक आंदोलन करते चले आ रहे इन शिक्षकों ने अपने करियर को सुरक्षित करने के लिए हर उस जिम्मेदार का दरवाजा खटखटाया जहां से कुछ राहत मिलने की उम्मीद थी। इस दौरान शिक्षकों ने कभी विधायकों को तो कभी सांसदों को इसके लिए अपना ज्ञापन सौंपा। प्रदेश के शिक्षा राज्यमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक के दरवाजे पर दस्तक दी। उन्हें बढ़ती आयु का हवाला देकर रोजी-रोटी न छीनने का अनुरोध किया। कई संगठनों ने दिल्ली के जन्तर-मंतर पर भारी संख्या में पहुंच कर अपनी एकजुटता का दमखम भी दिखाया लेकिन कहीं कोई प्रभाव दिखता नजर नहीं आया।




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