बंद होने वाली थी रॉयल एनफील्ड, 26 साल की उम्र में संभाली कमान; आज दुनिया मानती है सिद्धार्थ लाल का लोहा
सिद्धार्थ लाल ने महज 26 साल की उम्र में घाटे में चल रही रॉयल एनफील्ड की कमान संभालकर उसे दुनिया का सबसे पसंदीदा और कामयाब मोटरसाइकिल ब्रांड बना दिया।

करियर की दुनिया में कुछ कहानियां सिर्फ सफलता की नहीं होतीं, बल्कि हिम्मत, दूरदृष्टि और सही फैसलों की मिसाल बन जाती हैं। भारतीय ऑटोमोबाइल सेक्टर में रॉयल एनफील्ड और सिद्धार्थ लाल की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। आज जिस 'बुलेट' की आवाज सुनकर युवाओं का दिल धड़क उठता है और जो देश विदेश की सड़कों पर शान से दौड़ती दिखती है… उसे एक दौर में बंद करने की नौबत आ गई थी। जी हां, साल 2000 के आस पास यह मशहूर ब्रांड भारी घाटे में डूब चुका था। लेकिन फिर एंट्री हुई एक 26 साल के नौजवान की, जिसने न सिर्फ इस डूबती नैया को पार लगाया बल्कि इसे एक ग्लोबल आइकन बना दिया। आइए आयशर मोटर्स के मैनेजिंग डायरेक्टर सिद्धार्थ लाल के करियर पर एक नजर।
26 की उम्र में मिला कांटों का ताज
साल 2000 का वो दौर रॉयल एनफील्ड के लिए किसी बुरे सपने जैसा था। कंपनी हर महीने लाखों रुपये का घाटा झेल रही थी। बोर्ड मीटिंग्स में इसे बेचने या पूरी तरह बंद करने की बातें चल रही थीं। ठीक इसी मोड़ पर आयशर ग्रुप के मालिक के बेटे सिद्धार्थ लाल को इस संकटग्रस्त कंपनी की कमान सौंपी गई। उनकी उम्र महज 26 साल थी। हर कोई हैरान था कि इतना बड़ा और पेचीदा जिम्मा एक युवा कैसे संभालेगा। सिद्धार्थ ने दिल्ली के आरामदायक दफ्तर में बैठकर हुक्म चलाने के बजाय सीधे चेन्नई का रुख किया, जहां कंपनी का हेडक्वार्टर था। उन्होंने आते ही कुछ बेहद कड़े फैसले लिए। फिजूलखर्ची रोकी गई, मैन्युफैक्चरिंग की कमियों को सुधारा गया और सबसे जरूरी बात कि उन्होंने निराश हो चुके डीलरों में नया जोश भरने का काम किया।
केबिन छोड़ सड़कों पर उतरे सिद्धार्थ
सिद्धार्थ लाल सिर्फ फाइलों और आंकड़ों में उलझने वाले पारंपरिक कारोबारी नहीं थे। उन्हें जल्द ही समझ आ गया था कि अगर बाइक की कमियों को दूर करना है, तो खुद जमीन पर उतरना होगा। उन्होंने खुद रॉयल एनफील्ड उठाई और लंबी लंबी यात्राओं पर निकल पड़े। एक आम राइडर की तरह उन्होंने गाड़ी चलाई, उसकी खूबियों कमियों को महसूस किया और ग्राहकों से सीधे बात की। इस जमीनी सफर से उन्हें पता चला कि लोग बुलेट के लुक और उसकी धक धक वाली आवाज से प्यार तो करते हैं, लेकिन उसके इंजन से तेल टपकने, भारी गियर और आए दिन खराब होने की आदत से बेहद परेशान हैं। इसी जमीनी फीडबैक के दम पर कंपनी ने इंजन की पुरानी कमियों को दूर किया। इसी दौर में 'इलेक्ट्रा' और बाद में 'थंडरबर्ड' जैसे धांसू मॉडल बाजार में आए, जिन्होंने नई पीढ़ी के युवाओं को अपनी तरफ खींचना शुरू कर दिया।
गौरतलब है कि रॉयल एनफील्ड की सबसे बड़ी दिक्कत यह थी कि इसे सिर्फ उम्रदराज लोगों या फिर लंबी दूरी की यात्रा करने वाले चुनिंदा शौकीनों की सवारी माना जाता था। सिद्धार्थ लाल ने इस पुरानी सोच को बदलने का बीड़ा उठाया। उन्होंने बाइक को सिर्फ आने जाने का एक जरिया नहीं, बल्कि एक लाइफस्टाइल और रूतबे के तौर पर पेश किया। उन्होंने 'राइडर मेनिया' और 'हिमालयन ओडिसी' जैसे बड़े इवेंट्स की शुरुआत की।
देखते ही देखते देशभर में बुलेट लवर्स के ग्रुप बनने लगे। अब रॉयल एनफील्ड खरीदना सिर्फ एक मोटरसाइकिल खरीदना नहीं था, बल्कि एक बड़े और खास कम्यूनिटी का हिस्सा बनना बन गया था। इसी इमोशनल कनेक्ट ने कंपनी की सेल्स को रॉकेट की तरह उड़ा दिया और रॉयल एनफील्ड भारतीय बाइक साम्राज्य का एक अहम हिस्सा बन गई।
भारत से निकलकर दुनिया पर जमाया सिक्का
जब घरेलू बाजार में पैर पूरी तरह जम गए, तो सिद्धार्थ लाल ने दुनिया के नक्शे पर नजर डाली। उन्होंने देखा कि ग्लोबल मार्केट में 250सीसी से लेकर 750सीसी की मिड साइज मोटरसाइकिलों के मामले में एक बड़ा खालीपन है। या तो बाजार में बहुत हल्की बाइक्स थीं या फिर बेहद महंगी और भारी क्रूजर गाड़ियां। इस मौके को भांपते हुए उन्होंने रॉयल एनफील्ड को ग्लोबल ब्रांड बनाने का काम शुरू किया। अंतरराष्ट्रीय स्तर के डिजाइन और तकनीक तैयार करने के लिए ब्रिटेन के लीसेस्टरशायर में एक अत्याधुनिक टेक्निकल सेंटर खोला गया। आज नतीजा सबके सामने है। अमेरिका, यूरोप से लेकर लैटिन अमेरिका तक, भारतीय बुलेट विदेशी सड़कों की शान बढ़ा रही है।




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