फिर से परीक्षा करवाइए... LLB छात्रा को लेकर हाई कोर्ट पंजाब यूनिवर्सिटी पर क्यों हुआ सख्त
गलत प्रश्नपत्र मिलने से एलएलबी छात्रा को अनुपस्थित बताने पर पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट ने पंजाब यूनिवर्सिटी को जनवरी 2026 में स्पेशल परीक्षा कराने का आदेश दिया।

कभी कभी एक छोटी सी लापरवाही किसी छात्र की पूरी पढ़ाई पर भारी पड़ सकती है। लेकिन इस बार अदालत ने साफ कर दिया कि कागजी नियमों और दफ्तरों की सहूलियत से ज्यादा अहम किसी छात्र का भविष्य है। पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने ऐसा ही एक मजबूत संदेश देते हुए पंजाब यूनिवर्सिटी को आदेश दिया है कि वह एलएलबी की एक छात्रा के लिए जनवरी 2026 में स्पेशल परीक्षा कराए, क्योंकि परीक्षा के दिन उसे गलती से गलत प्रश्नपत्र थमा दिया गया था। इस मामले के मद्देनजर न्यायमूर्ति कुलदीप तिवारी ने सुनवाई के दौरान कहा, “किसी छात्र का अकादमिक भविष्य, यूनिवर्सिटी की प्रशासनिक असुविधा से कहीं ऊपर है।” अदालत का यह रुख उस छात्रा के लिए बड़ी राहत बनकर आया, जो अपनी किसी गलती के बिना पूरे एक साल का नुकसान झेलने वाली थी।
मामला क्या था
पंजाब यूनिवर्सिटी की यह छात्रा एलएलबी के सभी सेमेस्टर पास कर चुकी थी। सिर्फ एक पेपर लॉ ऑफ क्राइम्स II (ओल्ड) वह पहले प्रयास में पास नहीं कर पाई थी। उसने नियमों के मुताबिक मई 2025 में री एग्जाम दिया। यहीं पर बड़ी चूक हो गई। परीक्षा केंद्र पर मौजूद इनविजिलेटर ने उसे पुराने कोर्स का पेपर देने की बजाय भारतीय न्याय संहिता II (न्यू) का प्रश्नपत्र थमा दिया। छात्रा के पास उस वक्त कोई विकल्प नहीं था। उसने वही पेपर हल किया, क्योंकि परीक्षा बीच में छोड़ने या नया प्रश्नपत्र मांगने की कोई व्यवस्था मौके पर नहीं की गई।
नतीजा आया तो थी अनुपस्थित
असली परेशानी तब शुरू हुई जब अक्टूबर 2025 में रिजल्ट घोषित हुआ। यूनिवर्सिटी ने छात्रा को लॉ ऑफ क्राइम्स II (ओल्ड) में अनुपस्थित दिखा दिया, क्योंकि रिकॉर्ड में वही पेपर दर्ज था, जो उसने दिया ही नहीं था। इस देरी का एक और नुकसान हुआ। री एग्जाम का शेड्यूल पहले ही फाइनल हो चुका था, इसलिए छात्रा को दोबारा परीक्षा देने का मौका भी नहीं मिल पाया। मतलब साफ था कि यूनिवर्सिटी की गलती, लेकिन सजा छात्रा को मिली।
हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
हाईकोर्ट ने इस पूरे मामले में यूनिवर्सिटी की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। अदालत ने माना कि छात्रा पूरी तरह से यूनिवर्सिटी की लापरवाही की शिकार है। कोर्ट ने कहा कि अगर पुराने और नए कोर्स के छात्रों की संयुक्त परीक्षा कराई जा रही थी, तो इनविजिलेटर की जिम्मेदारी थी कि वह सही छात्र को सही प्रश्नपत्र दे। इसके अलावा, परीक्षा के दौरान अगर कोई गलती होती है, तो उसे वहीं सुधारने का कोई न कोई तरीका होना चाहिए था, जो यहां पूरी तरह नदारद रहा।
न्यायालय ने यह भी साफ किया कि यूनिवर्सिटी के नियम परीक्षा कैलेंडर को चलाने के लिए होते हैं, न कि अपनी ही गलती सुधारने से बचने के लिए खासकर तब जब किसी छात्र का पूरा अकादमिक करियर दांव पर हो।
छात्रा की तरफ से क्या दलील दी गई
छात्रा की ओर से पेश वकील तालीम हुसैन ने अदालत को बताया कि उनकी मुवक्किल ने कोई गलती नहीं की। उसे जो प्रश्नपत्र दिया गया उसी को हल करना उसकी मजबूरी थी। गलती की जानकारी तुरंत यूनिवर्सिटी को दी गई, लेकिन वहां से कोई सुधारात्मक कदम नहीं उठाया गया। उन्होंने यह भी बताया कि रिज़ल्ट इतनी देर से घोषित किया गया कि छात्रा री एग्ज़ाम के लिए आवेदन तक नहीं कर सकी। इस वजह से उसे पूरे एक साल का नुकसान झेलना पड़ रहा था।
क्या था यूनिवर्सिटी का पक्ष
दूसरी ओर, राज्य और यूनिवर्सिटी की तरफ से वकील अक्षय कुमार गोयल ने दलील दी कि यूनिवर्सिटी अपने कैलेंडर और नियमों से बंधी है। उनके मुताबिक, ऑड सेमेस्टर की परीक्षाएं नवंबर में और ईवन सेमेस्टर की परीक्षाएं मई में होती हैं, इसलिए जनवरी 2026 में स्पेशल परीक्षा कराना नियमों के खिलाफ है। यह भी कहा गया कि परीक्षा केंद्र पर तीन छात्र थे, जिनमें से दो ने सही पेपर हल किया जबकि छात्रा ने नया कोर्स वाला पेपर हल कर दिया। लेकिन अदालत ने इस तर्क को छात्रा के भविष्य से ऊपर रखने से इनकार कर दिया।
अदालत का अंतिम आदेश
सभी दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने साफ आदेश दिया कि पंजाब यूनिवर्सिटी जनवरी 2026 में लॉ ऑफ क्राइम्स II (ओल्ड) की स्पेशल परीक्षा कराएगी। अदालत ने माना कि यूनिवर्सिटी की गलती की वजह से छात्रा को एक पूरा शैक्षणिक वर्ष गंवाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।




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