NEET UG : MBBS व BDS एडमिशन के नियम दाखिला प्रक्रिया के बीच नहीं बदल सकते, सुप्रीम कोर्ट की पंजाब सरकार को फटकार
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि एमबीबीएस व बीडीएस दाखिला प्रक्रिया शुरू हो जाने के बाद कोर्सेज के एडमिशन नियमों को बदला नहीं जा सकता है। पंजाब सरकार ने स्पोर्ट्स कोटा दाखिले की नीति ऐन वक्त पर बदल दी थी।

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को पंजाब सरकार को शैक्षणिक सत्र 2024 में स्पोर्ट्स कोटे के तहत एमबीबीएस और बीडीएस कोर्सेज में दाखिले के लिए लचीली व अस्पष्ट प्रक्रिया अपनाने पर फटकार लगाई। अदालत ने कहा कि एक बार दाखिला प्रक्रिया शुरू हो जाने के बाद कोर्सेज के एडमिशन नियमों को बदला नहीं जा सकता है। जस्टिस संजय कुमार और आलोक अराधे की बेंच ने कहा कि जिस तरह भर्ती प्रक्रिया शुरू होने के बाद भर्ती के नियमों में बदलाव कानून में मना है, उसी तरह दाखिला प्रक्रिया शुरू होने से पहले उसके सभी पहलुओं को पूरी तरह से परिभाषित न करना भी गैरकानूनी है।
यह इसलिए है कि ताकि संबंधित अधिकारियों को बाद में अपने हितों के अनुसार नियम तय करने या भाई-भतीजावाद की अनुमति देने की गुंजाइश न रहे। पीठ ने कहा कि निष्पक्षता सुनिश्चित करने और मनमानी रोकने के लिए ऐसी प्रक्रिया में पारदर्शिता सबसे जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट दिवजोत सेखो और शुभकर्मन सिंह द्वारा सत्र 2024 में खेल कोटे के तहत एमबीबीएस और बीडीएस पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए पंजाब सरकार द्वारा अपनाए गए प्रवेश मानदंडों के खिलाफ दायर अपीलों की सुनवाई कर रहा था। पीठ ने निर्देश दिया कि सेखों और सिंह को सरकारी मेडिकल कॉलेज में सीटों पर दाखिला दिया जाए।
निर्णय तर्कसंगत हो मनमाना नहीं
अदालत ने कहा कि राज्य और उसकी संस्थाओं का कर्तव्य और जिम्मेदारी है कि वे संविधान के अनुच्छेद 14 के अनुसार निष्पक्ष और उचित तरीके से कार्य करें और राज्य द्वारा लिया गया कोई भी निर्णय तर्कसंगत होना चाहिए, मनमाना नहीं।
नीतिगत निर्णय मनमाने होंगे तो कोर्ट दखल करेगी
पीठ ने कहा कि हालांकि पंजाब राज्य अपने तर्क के समर्थन में कानूनी मिसालों का हवाला देना चाहेगा कि कोर्ट आमतौर पर नीतिगत मामलों में दखल नहीं दे सकता। पीठ ने आगे कहा कि यह भी सर्वविदित है कि जब कोई नीतिगत निर्णय मनमानी भरा हो या उसमें मनमानी की गुंजाइश हो, तो अदालत उसे रद्द करने में न्यायोचित होगी। राज्य के तर्क बेदम पीठ ने कहा कि यह सच है कि नीति निर्माताओं को नीति बनाने में कुछ हद तक छूट मिलनी चाहिए, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मनमानी या भाई-भतीजावाद की अनुमति दी जाए। इसलिए, हमें पंजाब राज्य के तर्कों में कोई दम नहीं दिखता।
क्या था मामला
लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक अपीलें पंजाब में 2024 सत्र के लिए 1 प्रतिशत खेल कोटा के तहत एमबीबीएस (MBBS) और बीडीएस (BDS) कोर्सेज में दाखिले से संबंधित थीं। बाबा फरीद यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंसेज द्वारा 09 अगस्त 2024 को जारी किए गए शुरुआती प्रॉस्पेक्टस में साफ कहा गया था कि कि केवल कक्षा 11वीं और 12वीं के दौरान प्राप्त खेल उपलब्धियों को ही मान्यता दी जाएगी। हालांकि आवेदन जमा करने की अंतिम तिथि पर 16 अगस्त 2024 को शाम 6:07 बजे विश्वविद्यालय ने एक ईमेल जारी कर अभ्यर्थियों से किसी भी कक्षा या वर्ष की खेल उपलब्धियां जमा करने को कहा। इसके बाद एक परिशिष्ट (ऐडेंडम) जारी किया गया और एक खेल मेरिट सूची तैयार की गई, जिसमें कक्षा 9वीं और 10वीं की उपलब्धियों को भी शामिल किया गया। इसी आधार पर कुदरत कश्यप और मंसिरत कौर को अपीलकर्ताओं दिवजोत सेखों और शुभकर्मन सिंह से ऊपर रैंक दिया गया।
न्यायालय ने पाया कि यह नीतिगत बदलाव एक रोलर स्केटिंग कोच रमेश कुमार कश्यप के अनुरोध पर हुआ था और उन्होंने अपने आग्रह में यह तथ्य उजागर नहीं किया था कि इस बदलाव से उनकी बेटी कुदरत कश्यप को सीधा सीधा फायदा होगा। न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत फाइलों से स्पष्ट हुआ कि उनके अभ्यावेदन ने संबंधित अधिकारियों को प्रभावित किया। न्यायालय ने माना कि इस प्रकार का खुलासा न करना ही नीति में किए गए संशोधन को अमान्य करने के लिए पर्याप्त है।
पीठ ने कुछ गंभीर असंगतियों की ओर भी ध्यान दिलाया। उसी 2024 सत्र के दौरान अन्य कई मेडिकल और संबद्ध पाठ्यक्रमों के लिए खेल उपलब्धियों का मूल्यांकन केवल कक्षा 11वीं और 12वीं के आधार पर ही किया गया था। यहां तक कि स्नातकोत्तर मेडिकल और डेंटल पाठ्यक्रमों के लिए भी प्रॉस्पेक्टस में केवल एमबीबीएस और बीडीएस के दौरान की उपलब्धियों को ही मान्य किया गया था।




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