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Childrens Day Poem in Hindi : 14 नवंबर बाल दिवस पर छोटी और आसान कविताएं

Childrens Day Poem in Hindi : बाल दिवस के दिन स्कूलों में भाषण, कविता पाठ, डांस, खेल, डिबेट जैसी कई प्रतियोगिताएं होती हैं। विजेता बच्चों को ईनाम दिया जाता है। यहां हम बता रहे हैं बच्चों पर लिखी गईं कुछ कविताएं जिन्हें आप बाल दिवस प्रतियोगिता में इस्तेमाल कर सकते हैं।

Wed, 12 Nov 2025 02:08 PMPankaj Vijay लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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Childrens Day Poem in Hindi : 14 नवंबर बाल दिवस पर छोटी और आसान कविताएं

Childrens Day Poem in Hindi : भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू (Jawaharlal Nehru) का जन्मदिवस 14 नवंबर (14th November) को पूरे देश में बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है। बच्चों के अधिकारों, उनके महत्व और उनके प्रति समाज की जिम्मेदारियों को याद दिलाने का यह एक खास दिन है। जवाहर लाल नेहरू को बच्चों के प्रति बेहद प्रेम और लगाव था। बच्चे उन्हें चाचा नेहरू कहकर पुकारते थे। बच्चों के लिए बेशुमार प्यार, लगाव और उनके लिए किए गए कार्यों को लेकर जवाहर लाल नेहरू का जन्मदिन 14 नवंबर हर वर्ष बाल दिवस के तौर पर मनाया जाता है। यानी यह दिन बच्चों व चाचा नेहरू को समर्पित है। 1964 में पंडित जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद संसद ने उनके जन्मदिन, 14 नवंबर को बाल दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया। यह दिन हमें यह संदेश देता है कि बच्चे समाज का भविष्य है और उनके विकास के लिए सही अवसर और संसाधन उपलब्ध कराना जरूरी है। बाल दिवस का उद्देश्य बच्चों के प्रति प्यार और सम्मान को बढ़ावा देना है, ताकि वे एक खुशहाल और सुरक्षित वातावरण में अपना बचपन जी सकें।

बाल दिवस के दिन स्कूलों में भाषण, कविता पाठ, डांस, खेल, डिबेट जैसी कई प्रतियोगिताएं होती हैं। विजेता बच्चों को ईनाम दिया जाता है। बाल दिवस के दिन बच्चों को तोहफे व इनाम दिए जाते हैं। यहां हम बता रहे हैं बच्चों पर लिखी गईं कुछ कविताएं जिन्हें आप बाल दिवस प्रतियोगिता में इस्तेमाल कर सकते हैं।

Childrens Day Poem in Hindi : 14 नवंबर बाल दिवस पर छोटी और आसान कविताएं

1) एक बचपन का जमाना था,

जिस में खुशियों का खजाना था..

चाहत चाँद को पाने की थी,

पर दिल तितली का दिवाना था..

खबर ना थी कुछ सुबहा की,

ना शाम का ठिकाना था..

थक कर आना स्कूल से,

पर खेलने भी जाना था..

माँ की कहानी थी,

परीयों का फसाना था..

बारीश में कागज की नाव थी,

हर मौसम सुहाना था..

हर खेल में साथी थे,

हर रिश्ता निभाना था..

गम की जुबान ना होती थी,

ना जख्मों का पैमाना था..

रोने की वजह ना थी,

ना हँसने का बहाना था..

क्युँ हो गऐे हम इतने बडे,

इससे अच्छा तो वो बचपन का जमाना था।

- कोमल प्रसाद साहू

2. गोल वस्तु पर कविता

गोल-गोल, गोल-गोल,

सूरज गोल, चन्दा गोल,

सिक्का गोल, चक्का गोल,

और क्या-क्या, होता गोल,

नहीं मालूम, तो घूमो गोल।

नहीं मालूम तो घूमो गोल।

गोल-गोल, गोल-गोल,

अब रूक जाओ, बैठो गोल।

गोल, गोल, गोल, गोल,

गहरा कुँआ, गोल-गोल,

रात का चंदा, गोल-गोल

खिड़की, दरवाजे . . . .?

नहीं मालूम तो धूमो गोल

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3.

कविता - सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

इब्न बतूता पहन के जूता,

निकल पड़े तूफान में।

थोड़ी हवा नाक में घुस गई

थोड़ी घुस गई कान में।

कभी नाक को कभी कान को।

मलते इब्न बतूता,

इसी बीच में निकल पड़ा उनके पैरों का जूता।

उड़ते-उड़ते उनका जूता,

जा पहुँचा जापान में।

इब्न बतूता खड़े रह गए,

मोची की दुकान में।

4.

कविता - रामधारी सिंह 'दिनकर'

हठ कर बैठा चांद एक दिन, माता से यह बोला,

सिलवा दो मां मुझे ऊन का मोटा एक झिंगोला।

सनसन चलती हवा रात भर, जाड़े से मरता हूं,

ठिठुर-ठिठुरकर किसी तरह यात्रा पूरी करता हूं।

आसमान का सफ़र और यह मौसम है जाड़े का,

न हो अगर तो ला दो कुर्ता ही कोई भाड़े का।

बच्चे की सुन बात कहा माता ने, ‘‘अरे सलोने!

कुशल करें भगवान, लगें मत तुझको जादू-टोने।

जाड़े की तो बात ठीक है, पर मैं तो डरती हूँ,

एक नाप में कभी नहीं तुझको देखा करती हूँ।

कभी एक अंगुल भर चौड़ा, कभी एक फुट मोटा,

बड़ा किसी दिन हो जाता है, और किसी दिन छोटा।

घटता-बढ़ता रोज़ किसी दिन ऐसा भी करता है,

नहीं किसी की भी आंखों को दिखलाई पड़ता है।

अब तू ही ये बता, नाप तेरा किस रोज़ लिवाएं,

सी दें एक झिंगोला जो हर रोज बदन में आए।

5) बार-बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी।

गया ले गया तू जीवन की सबसे मस्त खुशी मेरी॥

चिंता-रहित खेलना-खाना वह फिरना निर्भय स्वच्छंद।

कैसे भूला जा सकता है बचपन का अतुलित आनंद?

ऊँच-नीच का ज्ञान नहीं था छुआछूत किसने जानी?

बनी हुई थी वहाँ झोंपड़ी और चीथड़ों में रानी॥

किये दूध के कुल्ले मैंने चूस अँगूठा सुधा पिया।

किलकारी किल्लोल मचाकर सूना घर आबाद किया॥

रोना और मचल जाना भी क्या आनंद दिखाते थे।

बड़े-बड़े मोती-से आँसू जयमाला पहनाते थे॥

मैं रोई, माँ काम छोड़कर आईं, मुझको उठा लिया।

झाड़-पोंछ कर चूम-चूम कर गीले गालों को सुखा दिया॥

दादा ने चंदा दिखलाया नेत्र नीर-युत दमक उठे।

धुली हुई मुस्कान देख कर सबके चेहरे चमक उठे॥

वह सुख का साम्राज्य छोड़कर मैं मतवाली बड़ी हुई।

लुटी हुई, कुछ ठगी हुई-सी दौड़ द्वार पर खड़ी हुई॥

लाजभरी आँखें थीं मेरी मन में उमँग रँगीली थी।

तान रसीली थी कानों में चंचल छैल छबीली थी॥

दिल में एक चुभन-सी थी यह दुनिया अलबेली थी।

मन में एक पहेली थी मैं सब के बीच अकेली थी॥

मिला, खोजती थी जिसको हे बचपन! ठगा दिया तूने।

अरे! जवानी के फंदे में मुझको फँसा दिया तूने॥

सब गलियाँ उसकी भी देखीं उसकी खुशियाँ न्यारी हैं।

प्यारी, प्रीतम की रँग-रलियों की स्मृतियाँ भी प्यारी हैं॥

माना मैंने युवा-काल का जीवन खूब निराला है।

आकांक्षा, पुरुषार्थ, ज्ञान का उदय मोहनेवाला है॥

किंतु यहाँ झंझट है भारी युद्ध-क्षेत्र संसार बना।

चिंता के चक्कर में पड़कर जीवन भी है भार बना॥

आ जा बचपन! एक बार फिर दे दे अपनी निर्मल शांति।

व्याकुल व्यथा मिटानेवाली वह अपनी प्राकृत विश्रांति॥

वह भोली-सी मधुर सरलता वह प्यारा जीवन निष्पाप।

क्या आकर फिर मिटा सकेगा तू मेरे मन का संताप?

मैं बचपन को बुला रही थी बोल उठी बिटिया मेरी।

नंदन वन-सी फूल उठी यह छोटी-सी कुटिया मेरी॥

'माँ ओ' कहकर बुला रही थी मिट्टी खाकर आयी थी।

कुछ मुँह में कुछ लिये हाथ में मुझे खिलाने लायी थी॥

पुलक रहे थे अंग, दृगों में कौतूहल था छलक रहा।

मुँह पर थी आह्लाद-लालिमा विजय-गर्व था झलक रहा॥

मैंने पूछा 'यह क्या लायी?' बोल उठी वह 'माँ, काओ'।

हुआ प्रफुल्लित हृदय खुशी से मैंने कहा - 'तुम्हीं खाओ'॥

पाया मैंने बचपन फिर से बचपन बेटी बन आया।

उसकी मंजुल मूर्ति देखकर मुझ में नवजीवन आया॥

मैं भी उसके साथ खेलती खाती हूँ, तुतलाती हूँ।

मिलकर उसके साथ स्वयं मैं भी बच्ची बन जाती हूँ॥

जिसे खोजती थी बरसों से अब जाकर उसको पाया।

भाग गया था मुझे छोड़कर वह बचपन फिर से आया॥

- सुभद्रा कुमारी चौहान

कविता-6/ अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

चंदा मामा दौड़े आओ,

दूध कटोरा भर कर लाओ।

उसे प्यार से मुझे पिलाओ,

मुझ पर छिड़क चाँदनी जाओ।

मैं तैरा मृग-छौना लूँगा,

उसके साथ हँसूँ खेलूँगा।

उसकी उछल-कूद देखूँगा,

उसको चाटूँगा-चूमूँगा।

बचपन के पल

दिन आते रहे,

दिन जाते रहे,

बचपन के दोस्त

दिनोंदिन मिलते रहे,

नटखट कारनामें

यादों में बदलते रहे,

वक़्त के तकाज़े से

सभी जुदा होते रहे,

सालोंसाल गुज़रते रहे,

कुछ दोस्त मिलते रहे,

कुछ दोस्त गुमशुदा

गुमनाम होते रहे,

काश ये बचपन के

नायाब पल ठहर जाते !

बचपन के दोस्त

मुझे फिर मिल जाते।

कवि : श्री राजशेखर सी

करियर सेक्शन में लेटेस्ट एजुकेशन न्यूज़, सरकारी जॉब , एग्जाम , एडमिशन और Board Results 2026 ( UP Board Result 2026, MP Board Result 2026, CBSE 2026 Result) देखें और Live Hindustan App डाउनलोड करके सभी अपडेट सबसे पहले पाएं।