लेट लतीफी स्वीकार नहीं; बिहार के विश्वविद्यालयों में रिजल्ट को लेकर सख्त फरमान, समय पर परीक्षा कराने के लिए भी अल्टीमेटम
बिहार के सभी विश्वविद्यालयों में अब लेट लतीफी नहीं चलेगी, कुलाधिपति ने समय पर परीक्षा और रिजल्ट जारी करने के साथ ही शैक्षणिक सत्र को नियमित करने का सख्त आदेश दिया है।

अक्सर ऐसा देखा गया है कि विश्वविद्यावयों में सेशन की लेटलतीफी, समय पर परीक्षा का न होना और फिर महीनों तक रिजल्ट का इंतजार करना, यह सब बिहार के सिस्टम की एक आम पहचान बन गई थी। कई बार ऐसा होता है कि छात्र अपनी कड़ी मेहनत से सिविल सर्विसेज, रेलवे, बैंकिंग या एसएससी जैसी बड़ी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। लेकिन जब फॉर्म भरने का वक्त आता है, तो पता चलता है कि उनके पास ग्रेजुएशन की फाइनल मार्कशीट ही नहीं है। महज एक कागज के टुकड़े और यूनिवर्सिटी की सुस्ती की वजह से युवाओं के सपनों पर पानी फिर जाता है। लेकिन अब राज्य के विश्वविद्यालयों की इस लचर व्यवस्था को सुधारने के लिए ऊपर से सख्त डंडा चल गया है। लोकभवन से एक ऐसा कड़ा आदेश जारी हुआ है, जिसने तमाम विश्वविद्यालयों के कुलपतियों और प्रशासनिक अमले की नींद उड़ा कर रख दी है।
पटना से मिली जानकारी के मुताबिक, राज्य के विश्वविद्यालयों में अब एक बड़े शैक्षणिक और प्रशासनिक सुधार की पक्की बुनियाद रखी जा रही है। कुलाधिपति सह राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) सय्यद अता हसनैन ने इस गंभीर मामले में बेहद कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है। उन्होंने साफ शब्दों में सभी विश्वविद्यालयों को अल्टीमेटम दे दिया है कि हर हाल में परीक्षाएं तय समय पर ली जाएं और उनका रिजल्ट भी बिना किसी देरी के जारी किया जाए। बीते 30 मार्च को लोकभवन में कुलाधिपति की अध्यक्षता में एक बेहद अहम और उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक बुलाई गई थी। इस बैठक में जो कड़े फैसले लिए गए, उसकी विस्तृत कार्यवाही और दिशा-निर्देश बुधवार को राज्यपाल के सचिव गोपाल मीणा ने एक आधिकारिक पत्र के जरिए जारी कर दिए हैं।
नए फरमान के बाद होगा बदलाव
इस नए फरमान के बाद अब विश्वविद्यालयों को अपना पुराना रवैया पूरी तरह से बदलना होगा। सबसे बड़ा जोर समयबद्ध अकादमिक कैलेंडर को सख्ती से लागू करने पर दिया गया है। कुलाधिपति ने साफ कर दिया है कि परीक्षा और रिजल्ट के नाम पर छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वाली लेटलतीफी अब किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं की जाएगी। इसके साथ ही, पूरी व्यवस्था को पारदर्शी और तेज बनाने के लिए डिजिटल सिस्टम को सौ फीसदी लागू करने का निर्देश दिया गया है। डिजिटल व्यवस्था पूरी तरह लागू होने से छात्रों को अपने रिजल्ट या डिग्री के लिए यूनिवर्सिटी के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे। सब कुछ एक क्लिक पर ऑनलाइन उपलब्ध होगा, जिससे बाबुओं की मनमानी पर भी सीधा लगाम लगेगा।
बैठक में यह भी तय हुआ कि सभी विश्वविद्यालय अपने-अपने शैक्षणिक सत्र (एकेडमिक सेशन) को फौरन पटरी पर लाएं। जिन जगहों पर सेशन महीनों या सालों पीछे चल रहा है, उन्हें जल्द से जल्द एक सुधारात्मक कार्ययोजना (करेक्टिव एक्शन प्लान) बनाकर राजभवन को सौंपनी होगी। अब सिर्फ कागजी आदेश नहीं दिए गए हैं, बल्कि सीधे तौर पर जिम्मेदारी भी तय की जा रही है। परीक्षाओं का सही ढंग से आयोजन, कॉपियों की तुरंत जांच के बाद परिणाम का प्रकाशन और अंत में छात्रों को बिना भटकाए प्रमाणपत्र (डिग्री) सौंपने का काम एक तय समयसीमा के भीतर ही करना होगा। इसे हर हाल में अनिवार्य कर दिया गया है।
अच्छा काम करने वालों की थपथपाई पीठ
हालांकि, ऐसा नहीं है कि इस नई व्यवस्था में सिर्फ सख्ती ही बरती जा रही है। अच्छा काम करने वालों की पीठ भी थपथपाई जाएगी। जो विश्वविद्यालय और संस्थान इन पैमानों पर खरे उतरेंगे और बेहतर प्रदर्शन करेंगे, उन्हें सरकार की तरफ से खास प्रोत्साहन दिया जाएगा। वहीं, जिन विश्वविद्यालयों का प्रदर्शन कमजोर रहेगा या जो इन आदेशों की अनदेखी करेंगे, उनकी जवाबदेही तय करते हुए उन पर कड़ी कार्रवाई भी की जाएगी।
इस पूरी कवायद का सबसे बड़ा और सीधा फायदा छात्रों को मिलेगा। अक्सर देखा जाता था कि इंटर पास करने के बाद छात्रों को ग्रेजुएशन में दाखिले के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता था क्योंकि बोर्ड और यूनिवर्सिटी के कैलेंडर मैच नहीं करते थे। इस अड़चन को दूर करने के लिए बिहार विद्यालय परीक्षा समिति ने भी एक बेहद समझदारी भरा कदम उठाया है। समिति ने अपना अकादमिक कैलेंडर पहले से ही उपलब्ध कराने का फैसला किया है। इसका फायदा यह होगा कि विश्वविद्यालय अपना परीक्षा और दाखिला कार्यक्रम बिहार बोर्ड के कैलेंडर के हिसाब से तय कर सकेंगे, जिससे छात्रों का कोई भी कीमती साल बर्बाद नहीं होगा।
पढ़ाई और परीक्षा के अलावा, विश्वविद्यालयों को समाज की असल हकीकत से जोड़ने की भी एक बेहतरीन पहल की गई है। 'उन्नत भारत अभियान' के तहत अब हर विश्वविद्यालय को अपने इलाके के कम से कम पांच गांवों को गोद लेना होगा। विश्वविद्यालय सिर्फ किताबें रटने की जगह नहीं हैं, बल्कि ये समाज के विकास का केंद्र भी होने चाहिए। इन गोद लिए गए गांवों में शिक्षा का प्रसार, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं, डिजिटल साक्षरता और युवाओं के लिए कौशल विकास (स्किल डेवलपमेंट) से जुड़ी तमाम गतिविधियां चलाई जाएंगी। जब छात्र और प्रोफेसर गांव जाएंगे, वहां की जरूरतें समझेंगे और ग्रामीणों को तकनीकी रूप से साक्षर बनाएंगे, तो एक नए भारत की तस्वीर हकीकत में जमीन पर उतरेगी। कुल मिलाकर, लोकभवन का यह फैसला उच्च शिक्षा के गिरते स्तर को उठाने और लाखों छात्रों के भविष्य को सुरक्षित करने की दिशा में एक संजीवनी की तरह काम करेगा।




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