बीकॉम डिग्री अब नहीं रही फिट? क्यों नौकरी के लिए तरस रहे हैं लाखों ग्रेजुएट्स, रिपोर्ट आई सामने
भारत में बीकॉम छात्रों की पहली पसंद होने के बावजूद 45% से ज्यादा ग्रेजुएट्स नौकरी के काबिल नहीं हैं, जिससे कोर्स के सिलेबस और रोजगार पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

हर साल हमारे देश में लाखों छात्र जब 12वीं पास करते हैं तो उनके दिमाग में बैचलर ऑफ कॉमर्स यानी बीकॉम करने काफी ख्याल आता है। इसे हमेशा से एक ऐसा सुरक्षित रास्ता माना गया है, जो आगे चलकर करियर के कई दरवाजे खुले रखता है। लेकिन क्या सच में आज के दौर में भी ऐसा ही है? असल में तेजी से बदलते जॉब मार्केट में यह तस्वीर अब काफी डरावनी हो चुकी है। इंडिया स्किल्स रिपोर्ट 2025 के आंकड़े एक कड़वी सच्चाई बयां करते हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक, मुश्किल से 55 फीसदी बीकॉम ग्रेजुएट्स ही ऐसे हैं जिन्हें तुरंत नौकरी देने लायक माना जा सकता है। इसका सीधा मतलब है कि बाकी 45 प्रतिशत युवाओं के पास डिग्री का कागज तो है, लेकिन हुनर पूरी तरह से नदारद है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या हमारा बीकॉम का पुराना सिलेबस आज की कॉरपोरेट दुनिया की जरूरतों को पूरा करने में हांफ रहा है?
इंदौर की प्रेस्टीज यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर, प्रोफेसर केयूर पुरानी इस पूरे मसले पर बड़ी बेबाकी से अपनी बात रखते हैं। उनका कहना है कि बीकॉम में दाखिला लेना आज के वक्त में एक लो-रिस्क फैसला लगता है, लेकिन कोर्स खत्म होने के बाद बाहर निकलते वक्त यह एक हाई-रिस्क नतीजा बन जाता है। लोग इसे एक सस्ता और सुरक्षित विकल्प मानकर चुन लेते हैं पर तीन साल बाद जब वो मार्केट में कदम रखते हैं तो उनके पास ऐसा कुछ अलग नहीं होता जो उन्हें भीड़ से जुदा कर सके। प्रोफेसर पुरानी कहते हैं कि असली दिक्कत सिर्फ छात्रों की काबलियत में नहीं है, बल्कि उस अंडरग्रेजुएट एजुकेशन सिस्टम के ढांचे में है, जिसमें रोजगार पैदा करने वाले गुणों को पिरोया ही नहीं गया है।
क्या कॉरपोरेट की रफ्तार से पिछड़ रहा है बीकॉम का सिलेबस?
अगर हम शिक्षा जगत और इंडस्ट्री के जानकारों की मानें, तो पारंपरिक बीकॉम कोर्स आज भी वहीं अटका हुआ है, जहां वो दशकों पहले था। आरवी यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर प्रोफेसर राम कुमार काकानी स्पष्ट करते हैं कि हमारा पुराना सिलेबस कंपनियों की आज की उम्मीदों से कोसों दूर है। सारा फोकस सिर्फ और सिर्फ किताबी ज्ञान और थ्योरी पर है, जबकि प्रैक्टिकल दुनिया की जानकारी न के बराबर है। आज का बाजार फिनटेक, ई-कॉमर्स और बीएफएसआई (बैंकिंग, वित्तीय सेवाएं और बीमा) जैसे सेक्टर्स के दम पर दौड़ रहा है, लेकिन हमारे सिलेबस में इन नई चीजों का कोई अता-पता नहीं है। इसके अलावा, इंटरनेशनल अकाउंटिंग स्टैंडर्ड्स (IFRS) और नए कंप्लायंस फ्रेमवर्क की पढ़ाई भी गहराई से नहीं कराई जा रही है।
जेल एजुकेशन के सीईओ और को-फाउंडर प्रथम बारोट भी इसी बात से इत्तेफाक रखते हैं। वो समझाते हैं कि बेशक बीकॉम से कॉमर्स, अकाउंटिंग और फाइनेंस की अच्छी बुनियादी समझ मिल जाती है, लेकिन इसने खुद को उस रफ्तार से नहीं बदला जिस रफ्तार से दुनिया बदल गई। आज के दौर में कंपनियों को ऐसे युवा चाहिए जो डेटा को आसानी से समझ सकें, फाइनेंशियल मॉडलिंग कर सकें, डिजिटल टूल्स का इस्तेमाल जानते हों और असल जिंदगी की दिक्कतों का हल निकाल सकें। ये वो तमाम चीजें हैं जो हमारी क्लासरूम की पारंपरिक पढ़ाई से पूरी तरह गायब हैं।
डिग्री की लोकप्रियता ही बन रही है युवाओं के जी का जंजाल
आपको जानकर शायद थोड़ी हैरत हो, लेकिन बीकॉम का इतना ज्यादा मशहूर होना ही इसके छात्रों के लिए एक बड़ी मुसीबत बन गया है। प्रोफेसर पुरानी बताते हैं कि इसे एक 'डिफॉल्ट डिग्री' मान लिया गया है। इस भेड़चाल की वजह से मार्केट में एक जैसी डिग्री वालों की बाढ़ आ गई है। प्रथम बारोट आगे जोड़ते हैं कि मार्केट में सप्लाई बहुत ज्यादा है और टैलेंट में फर्क कुछ भी नहीं। हजारों बच्चे एक जैसी किताबी नॉलेज लेकर इंटरव्यू देने पहुंच जाते हैं। उनके पास प्रैक्टिकल एक्सपीरियंस होता नहीं है, ऐसे में नौकरी देने वालों के लिए यह तय करना बेहद मुश्किल हो जाता है कि किसे चुनें और किसे बाहर का रास्ता दिखाएं।
आज हायरिंग का तरीका पूरी तरह से स्किल्स-फर्स्ट हो गया है। एचआर (HR) उन बच्चों को तरजीह देते हैं जिन्होंने इंटर्नशिप की हो, जिन्हें हाथों-हाथ काम करना आता हो, जो एडवांस एक्सेल (Excel) और डेटा एनालिटिक्स के प्लेटफॉर्म्स पर मजबूत पकड़ रखते हों। दुर्भाग्य से ज्यादातर बीकॉम छात्रों के पास ये हथियार नहीं होते। नतीजा यह है कि सिर्फ बीकॉम की डिग्री अब किसी काम की नहीं रही। प्रोफेसर काकानी साफ कहते हैं कि एक अच्छी नौकरी पाने के लिए अब सीए (CA), सीएस (CS), सीएमए (CMA), एसीसीए (ACCA) या डेटा एनालिटिक्स के सर्टिफिकेशन की बैसाखी चाहिए ही चाहिए। कॉलेजों की गिरती क्वालिटी, कंपनियों से दूरी और नए सॉफ्टवेयर से अनजान प्रोफेसर ये सब मिलकर इस खाई को और चौड़ा कर रहे हैं।
आखिर क्या है इस बीमारी का पक्का इलाज?
एक्सपर्ट्स मानते हैं कि अब सिलेबस में थोड़े-बहुत कॉस्मेटिक बदलाव से काम नहीं चलने वाला। सिस्टम की पूरी तरह से ओवरहॉलिंग यानी बुनियादी मरम्मत की जरूरत है। प्रोफेसर पुरानी इस बात पर जोर देते हैं कि हमें रट्टा मारने वाली पढ़ाई (थ्योरी-लेड टीचिंग) को छोड़कर सीधे तौर पर काबलियत बढ़ाने (कैपेबिलिटी बिल्डिंग) पर फोकस करना होगा। पढ़ाई में एनालिटिक्स, डिजिटल फ्लुएंसी और अलग-अलग विषयों के मेल को शामिल करना आज के वक्त की सबसे बड़ी मांग है। वो बीएससी फाइनेंस और बीएससी क्वांटिटेटिव इकोनॉमिक्स जैसे नए कोर्सेज का उदाहरण देते हैं, जो आज की इंडस्ट्री के ज्यादा करीब हैं।
किताबों की जगह अब पढ़ाई को डायनेमिक बनाना होगा। असली दुनिया की केस स्टडीज, सिमुलेशन और लाइव प्रोजेक्ट्स के जरिए पढ़ाना होगा। कॉलेजों में इंटर्नशिप को हर हाल में अनिवार्य करना चाहिए। इसके अलावा, ग्लोबल सर्टिफिकेशन (जैसे CPA या ACCA) के साथ कॉलेज की पढ़ाई को जोड़ना रोजगार के नजरिए से एक शानदार कदम हो सकता है। आज के डिजिटल दौर में एडवांस्ड एक्सेल, ईआरपी (ERP) सिस्टम, पावर बीआई (Power BI) और नए अकाउंटिंग सॉफ्टवेयर को सिर्फ सिखाना नहीं, बल्कि क्रेडिट-बेस्ड सिस्टम का हिस्सा बनाना बेहद जरूरी है।
भारत का हायर एजुकेशन सिस्टम नई शिक्षा नीति (NEP) के तहत करवट ले रहा है और बीकॉम जैसी पुरानी डिग्रियों पर खुद को नए सांचे में ढालने का भारी दबाव है। लब्बोलुआब यह है कि बीकॉम की डिग्री अभी पूरी तरह से खत्म नहीं हुई है, लेकिन अगर इसमें जल्द ही असल दुनिया के स्किल्स, इंडस्ट्री का एक्सपोजर और डिजिटल टूल्स की नॉलेज नहीं जोड़ी गई, तो यह सुरक्षित मानी जाने वाली डिग्री आज के गलाकाट जॉब मार्केट में युवाओं के लिए सबसे बड़ा खतरा साबित होगी।




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