सरसों का तेल: स्वाद और सेहत का संतुलन और शुद्धता कैसे पहचानें?
बाजार में आजकल ‘कोल्ड-प्रेस्ड’, ‘वुड-प्रेस्ड’ और ‘एक्स्ट्रा वर्जिन’ जैसे शब्दों का काफी इस्तेमाल हो रहा है। इस पर विवेक पुरी का कहना है कि ये सभी मूल रूप से उसी प्रक्रिया की ओर संकेत करते हैं जिसमें कम तापमान पर तेल निकाला जाता है ताकि उसके प्राकृतिक गुण सुरक्षित रहें।

भारतीय रसोई में सरसों का तेल सिर्फ एक खाद्य तेल नहीं, बल्कि परंपरा, स्वाद और सेहत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। लेकिन आज के दौर में जब बाजार में तरह-तरह के तेल, ब्रांड और दावे सामने आ रहे हैं, तब उपभोक्ताओं के मन में कई सवाल भी उठते हैं—सरसों के तेल की शुद्धता कैसे पहचानें? कच्ची घानी, कोल्ड-प्रेस्ड या वुड-प्रेस्ड में क्या फर्क है? और क्या सचमुच यह सेहत के लिए इतना फायदेमंद है?
इन्हीं सवालों के जबाब को तलाशने के लिये हमने विस्तृत बातचीत की पी मार्क सरसों का तेल बनाने वाली कंपनी, पुरी ऑयल मिल्स लिमिटेड के मैनेजिंग डायरेक्टर विवेक पुरी से, जिन्होंने सरसों के तेल के इतिहास, वैज्ञानिक शोध, गुणवत्ता मानकों और उपभोक्ता जागरूकता पर कई महत्वपूर्ण बातें साझा कीं। बातचीत में विवेक पुरी ने खास तौर पर कहा कि सरसों के तेल का उपयोग देश में सदियों से होता आ रहा है और इसके प्रति लोगों का भरोसा पीढ़ी दर पीढ़ी मजबूत होता गया है। उनकी कंपनी भी पिछले 90 वर्षों से शुद्ध सरसों का तेल उपभोक्ताओं तक पहुंचा रही है।
सरसों का तेल: भारतीय उपमहाद्वीप की देन
विवेक पुरी के अनुसार सरसों का तेल प्रकृति की एक खास देन है, जो विशेष रूप से भारतीय उपमहाद्वीप की जलवायु और खान-पान के लिए अनुकूल है। उन्होंने बताया कि सरसों के तेल का पोषण प्रोफाइल बेहद प्रभावशाली है—इसमें ओमेगा-3 फैटी एसिड प्रचुर मात्रा में होता है और इसका फैटी एसिड संतुलन विश्व स्वास्थ्य संगठनों द्वारा सुझाए गए मानकों के काफी करीब माना जाता है।
उन्होंने यह भी बताया कि सरसों के तेल की प्राकृतिक पंजेंसी (तीखापन और खुशबू) केवल स्वाद ही नहीं देती, बल्कि इसके पीछे वैज्ञानिक कारण भी हैं। शोधों में पाया गया है कि इसमें मौजूद कुछ प्राकृतिक तत्व एंटीऑक्सीडेंट और प्रिजर्वेटिव गुण भी रखते हैं, जिसके कारण अचार जैसे खाद्य पदार्थों में इसका उपयोग लंबे समय से होता रहा है।
कच्ची घानी, कोल्ड-प्रेस्ड और वुड-प्रेस्ड: क्या है अंतर?
बाजार में आजकल “कोल्ड-प्रेस्ड”, “वुड-प्रेस्ड” और “एक्स्ट्रा वर्जिन” जैसे शब्दों का काफी इस्तेमाल हो रहा है। इस पर विवेक पुरी का कहना है कि ये सभी मूल रूप से उसी प्रक्रिया की ओर संकेत करते हैं जिसमें कम तापमान पर तेल निकाला जाता है ताकि उसके प्राकृतिक गुण सुरक्षित रहें।
भारतीय परंपरा में इसी प्रक्रिया को “कच्ची घानी” कहा जाता है, जो पुराने समय से कोल्हू या घानी में धीरे-धीरे तेल निकालने की विधि रही है।
शुद्धता की पहचान: एगमार्क पर ध्यान दें
औऱ अगर पहचान करनी हो कि कौन सा सरसों का तेल हमारे लिये बेस्ट है तो इस सवाल के जबाब में विवेक पुरी ने उपभोक्ताओं से सरसों का तेल खरीदते समय एगमार्क ग्रेड-वन जैसे गुणवत्ता प्रमाणन पर जरूर ध्यान देने की बात पर जोर दिया। यह प्रमाणन गुणवत्ता के कड़े मानकों के आधार पर दिया जाता है और उपभोक्ता को भरोसेमंद उत्पाद चुनने में मदद करता है।
इसपर आगे पुरी कहते हैं कि जो एगमार्क ग्रेड-वन है अब इसका पालन दुर्भाग्यवश कम हो गया है। निर्माता यूज़ नहीं करते। बड़ी कंपनियां तो बिल्कुल यूज़ नहीं करती। लेकिन मैं पुराने विचारों का होने के कारण पुरी ऑयल में 90 साल से एगमार्क ग्रेड-वन के तय मानकों का पालन करता आ रहा हूं। यह मिनिस्ट्री ऑफ फूड एंड कंज्यूमर अफेयर्स की सर्टिफिकेशन ऑन क्वालिटी है। “मैं अपने उपभोक्ता से हमेशा कहता हूं कि आप एगमार्क ग्रेड-वन जरुर चेक किया करें। क्योंकि उसके जो मानक हैं वो एफएसएससीआई से भी कुछ चीजों में बेहतर हैं। काफी कंपनियों ने छोड़ दिया है। और यह भी दुर्भाग्य है कि मिनिस्ट्री ऑफ़ फूड कंज्यूमर अफेयर्स भी इसे हाईलाइट नहीं करती।“
कितना तेल रोज इस्तेमाल करें?
खाद्य तेलों के सेवन पर उन्होंने बताया कि सामान्यतः प्रतिदिन 25-30 ग्राम तक तेल का सेवन उचित माना जाता है, हालांकि व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार डॉक्टर या न्यूट्रिशनिस्ट की सलाह लेना बेहतर होता है। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि लोग समय-समय पर अलग-अलग तेलों का सीमित मात्रा में उपयोग कर सकते हैं, लेकिन अपनी रसोई में एक मुख्य तेल जरूर होना चाहिए।
कीमतों में अंतर क्यों?
बाजार में सरसों के तेल की कीमतों में बड़ा अंतर देखने को मिलता है। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं—सरसों की फसल, अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थिति, सरकारी नीतियां, पैकेजिंग और उत्पादन प्रक्रिया। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि बेहद सस्ते तेल से सावधान रहना चाहिए, क्योंकि उसमें मिलावट या निम्न गुणवत्ता के बीज का उपयोग भी संभव है।
सरसों के तेल को राष्ट्रीय पहचान देने की मांग
बातचीत के दौरान विवेक पुरी ने एक दिलचस्प सुझाव भी रखा—उनके अनुसार जिस तरह मलेशिया और इंडोनेशिया ने पाम ऑयल को वैश्विक पहचान दी है, उसी तरह भारत को भी सरसों के तेल को एक राष्ट्रीय पहचान देने की दिशा में कदम बढ़ाना चाहिए। उनका मानना है कि यह न केवल किसानों बल्कि देश की खाद्य-सुरक्षा और आत्मनिर्भरता के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकता है। उन्होने मस्टर्ड डेवलपमेंट बोर्ड बनाये जाने की भी बात की।
उपभोक्ताओं के लिए संदेश
बातचीत के अंत में उन्होंने कहा कि आज के समय में उपभोक्ताओं के पास तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजन्स (AI) जानकारी की ताकत है, जिससे वे सही और जागरूक निर्णय ले सकते हैं। स्वास्थ्य से जुड़े उत्पादों के चयन में विशेष सावधानी जरूरी है, क्योंकि अच्छा स्वास्थ्य रोज के सही चुनावों से बनता है, एक दिन में नहीं। उपभोक्ताओं को चाहिए कि वे लेबल, FSSAI मानक और एगमार्क जैसी प्रमाणिकताओं को ध्यान से देखें। पिछले 90 वर्षों से ग्राहकों का विश्वास ही हमारी सबसे बड़ी पूंजी रहा है। इसी विश्वास के साथ पी मार्क सरसों तेल आगे बढ़ते हुए वैश्विक स्तर पर पहचान बनाने का लक्ष्य रखता है।
संलग्न वीडियो में आप स्वयं पूरी बातचीत देख और सुन सकते हैं, जिसमें सरसों के तेल के पोषण, वैज्ञानिक शोध, उत्पादन प्रक्रिया, कीमतों और उपभोक्ता जागरूकता से जुड़े कई रोचक पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की गई है।




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