युद्ध का असर: कच्चा तेल आसमान और ऑयल मार्केटिंग कंपनियों के शेयर जमीन पर
OMC Shares: आज कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल के पार चला गया है। तेल की इस तेजी का सीधा असर सरकारी ऑयल मार्केटिंग कंपनियों के शेयरों पर पड़ा, जिनमें सोमवार को करीब 9% तक की गिरावट दर्ज की गई।

ईरान-इजराइल युद्ध के चलते मध्य पूर्व में बढ़ता तनाव का बड़ा असर आज यानी सोमवार को कच्चे तेल की कीमतों और भारत की ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMC) के शेयरों पर देखने को मिल रहा है। कच्चे तेल के रेट में जबरदस्त उछाल से यह पिछले चार साल के अपने हाई लेवल पर पहुंच गया है। आज कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल के पार चला गया है। तेल की इस तेजी का सीधा असर सरकारी ऑयल मार्केटिंग कंपनियों के शेयरों पर पड़ा, जिनमें सोमवार को करीब 9% तक की गिरावट दर्ज की गई।
इस महीने की शुरुआत से अब तक हिंदुस्तान पेट्रोलियम, इंडियन ऑयल और भारत पेट्रोलियम के शेयरों में 14-15% की गिरावट आ चुकी है। इन कंपनियों पर कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का दबाव इसलिए बना है क्योंकि इससे इनकी कमाई पर सीधा असर पड़ता है। इन तीनों में सबसे ज्यादा गिरावट एचपीसीएल के शेयर में आई, जो 8.7% लुढ़क गया, जबकि बीपीसीएल में 7.99% और आईओसी में 7.2% की गिरावट दर्ज की गई।
ग्लोबल ब्रोकरेज फर्म ने घटाई रेटिंग
इस बीच, ग्लोबल ब्रोकरेज फर्म यूबीएस ने सरकारी तेल कंपनियों को लेकर अपनी रेटिंग घटा दी है। यूबीएस ने इंडियन ऑयल और भारत पेट्रोलियम को घटाकर 'न्यूट्रल' और हिंदुस्तान पेट्रोलियम को 'बाय' से घटाकर 'सेल' कर दिया है। ब्रोकरेज का मानना है कि कच्चे तेल में तेजी और रिफाइनिंग मार्जिन का मौजूदा हालात 2022 के तेल बाजार ऑयल मार्केट में आए डिस्टर्बेंस की याद दिलाते हैं।
यूबीएस का कहना है कि सरकारी तेल कंपनियों के इंटीग्रेटेड मार्जिन पर कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का नकारात्मक असर पड़ता है। ऐसा इसलिए क्योंकि खुदरा ईंधन कीमतों या टैक्स में बदलाव की गुंजाइश सीमित है। साथ ही, रुपये में गिरावट (डॉलर के मुकाबले रुपया 92 के स्तर पर) से भी इन कंपनियों पर दबाव और बढ़ जाता है।
कहां पहुंचा कच्चा तेल
कच्चे तेल की कीमतों में यह उछाल इस हफ्ते भी जारी रहा। ब्रेंट क्रूड का भाव एक समय 26% से ज्यादा चढ़कर 117 डॉलर प्रति बैरल के पार चला गया। यह तेजी पिछले हफ्ते हुई 28% की बढ़त के बाद आई है, जिसकी वजह सप्लाई में आ रही रुकावट है। अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम होने के आसार नहीं दिख रहे हैं और टैंकर अभी भी होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। निवेशक लंबे समय तक ऊर्जा की ऊंची कीमतों का सामना करने की तैयारी कर रहे हैं। बता दें होर्मुज स्ट्रेट एक ऐसा अहम रास्ता है, जहां से दुनिया की करीब 20% तेल सप्लाई गुजरती है।
याद आया 970 के दशक का तेल संकट
कोटक सिक्योरिटीज के विशेषज्ञ अनिंद्य बनर्जी के मुताबिक, यह सिर्फ तेल की कीमतों का झटका नहीं है, बल्कि तेल की मात्रा से जुड़ा झटका भी है। महज सात कारोबारी सत्रों में कच्चे तेल की कीमतों में 65% की बढ़ोतरी बेहद असामान्य है। ऐसी स्थिति पिछली बार 1970 के दशक के तेल संकट के दौरान देखने को मिली थी। आगे की स्थिति को लेकर उनका कहना है कि दो संभावनाएं हैं।
अगर होर्मुज में फिर से परिचालन के लिए खुल जाता है और सप्लाई सामान्य हो जाती है, तो कीमतों में तेज गिरावट आ सकती है, लेकिन अगर यह रुकावट हफ्तों तक बनी रहती है, तो कीमतें और बढ़ सकती हैं, जिससे महंगाई बढ़ेगी, वित्तीय हालात मुश्किल होंगे और वैश्विक अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंच सकता है।
1 डॉलर बढ़ा तो मुनाफा 55 पैसे प्रति लीटर घटेगा
एक विश्लेषण के मुताबिक, कच्चे तेल की कीमत में हर 1 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी से कंपनियों का मुनाफा करीब 55 पैसे प्रति लीटर घट जाता है और इससे उनकी कुल कमाई में 7-9% की गिरावट आती है। इनमें सबसे ज्यादा असर एचपीसीएल पर पड़ने की आशंका है क्योंकि उसका कारोबार सबसे ज्यादा मार्केटिंग पर निर्भर है। ब्रोकरेज फर्म जेएम फाइनेंशियल ने तीनों सरकारी तेल कंपनियों के शेयरों को लेकर 'रीड्यूस' रेटिंग दी है।




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