ITAT का बड़ा फैसला: बिल्डर से मिला डिस्काउंट टैक्सेबल नहीं, ₹9.8 करोड़ की राहत
ITAT का बड़ा फैसला: यह मामला गुरुग्राम के एक लग्जरी फ्लैट से जुड़ा है। यहां एक खरीदार ने करीब 23.13 करोड़ रुपये में फ्लैट खरीदा, जबकि उसकी लिस्टेड कीमत लगभग 32.95 करोड़ रुपये थी। बिल्डर से मिला 9.8 करोड़ का डिस्काउंट टैक्सेबल नहीं। जानिए प्रॉपर्टी खरीदारों के लिए क्या है पूरा असर।

प्रॉपर्टी खरीदने वालों और हाई-वैल्यू रियल एस्टेट डील करने वालों के लिए बड़ी राहत की खबर है। दिल्ली की आयकर अपीलीय अधिकरण (ITAT) ने एक अहम फैसले में कहा है कि बिल्डर द्वारा दिया गया डिस्काउंट या रिबेट हर बार टैक्स के दायरे में नहीं आता। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब टैक्स विभाग बड़े लेनदेन पर कड़ी नजर रख रहा है।
23 करोड़ के फ्लैट पर मिला 9.8 करोड़ का डिस्काउंट
फाइनेंशियल टाइम्स की खबर के मुताबिक यह मामला गुरुग्राम के एक लग्जरी फ्लैट से जुड़ा है। यहां एक खरीदार ने करीब 23.13 करोड़ रुपये में फ्लैट खरीदा, जबकि उसकी लिस्टेड कीमत लगभग 32.95 करोड़ रुपये थी।
करीब 9.8 करोड़ रुपये का अंतर बिल्डर द्वारा डिस्काउंट के रूप में दिया गया था। यह छूट समय पर भुगतान, तय शर्तों और अन्य कमर्शियल शर्तों से जुड़ी थी।
आयकर विभाग ने डिस्काउंट पर लगा दिया टैक्स
आयकर विभाग ने इस बड़े डिस्काउंट को “Income from Other Sources” मानते हुए टैक्स लगाने की कोशिश की। विभाग का मानना था कि इतना बड़ा डिस्काउंट असामान्य है और इसमें किसी तरह का अरेंजमेंट हो सकता है। साथ ही, विभाग ने खरीदार को सेक्शन 54F के तहत मिलने वाली टैक्स छूट भी देने से इनकार कर दिया।
ITAT ने दिया साफ फैसला
इसके बाद खरीदारन ने ITAT में अपील की। इस पर सुवाई करते हुए ट्रिब्यूनल ने टैक्स विभाग की दलील को खारिज करते हुए कहा कि यह डिस्काउंट पहले से तय कॉन्ट्रैक्ट का हिस्सा था। यह एक कमर्शियल व्यवस्था थी, न कि अतिरिक्त आय। इसमें कोई “वास्तविक आय” उत्पन्न नहीं हुई। इसलिए इस पर टैक्स नहीं लगाया जा सकता।
स्टांप ड्यूटी वैल्यू से ऊपर थी कीमत, इसलिए टैक्स नहीं
ITAT ने यह भी स्पष्ट किया कि अगर प्रॉपर्टी की खरीद कीमत स्टांप ड्यूटी वैल्यू से ज्यादा है, तो ऐसी स्थिति में टैक्स का मामला नहीं बनता। इस केस में स्टांप ड्यूटी वैल्यू करीब 14.68 करोड़ रुपये थी, जबकि असल खरीद कीमत 23 करोड़ रुपये से ज्यादा थी।
सेक्शन 54F पर भी मिली राहत
ट्रिब्यूनल ने खरीदार को सेक्शन 54F के तहत टैक्स छूट भी दे दी। फैसले में कहा गया कि रजिस्ट्रेशन जरूरी नहीं, पजेशन और पेमेंट अहम है। पत्नी को प्रॉपर्टी गिफ्ट करना टैक्स बचाने का तरीका नहीं माना जाएगा। को-ओनरशिप से छूट खत्म नहीं होती।
क्यों अहम है यह फैसला?
टैक्स एक्सपर्ट्स के अनुसार, यह फैसला उन लोगों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है जो बड़े प्रॉपर्टी डील करते हैं। इससे साफ संदेश मिलता है कि हर वित्तीय लाभ को आय नहीं माना जा सकता। अगर वह किसी कमर्शियल एग्रीमेंट का हिस्सा है, तो उस पर टैक्स नहीं लगेगा।
निवेशकों और होमबायर्स के लिए क्या मतलब?
यह फैसला बताता है कि बिल्डर से मिला डिस्काउंट हमेशा टैक्सेबल नहीं होता। सही दस्तावेज होने पर टैक्स से बचाव संभव है। रियल एस्टेट डील में पारदर्शिता बेहद जरूरी है।
कुल मिलाकर, ITAT का यह फैसला प्रॉपर्टी खरीदारों के लिए बड़ी राहत लेकर आया है। इससे यह स्पष्ट हो गया है कि हर बड़ा डिस्काउंट टैक्स के दायरे में नहीं आता, बल्कि उसकी प्रकृति और समझौते की शर्तें ज्यादा महत्वपूर्ण होती हैं। हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि ITAT के फैसले को आगे उच्च अदालतों में चुनौती दी जा सकती है, इसलिए भविष्य में स्थिति बदल भी सकती है।




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