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किसानों के लिए बुरी खबर: ईरान-इजरायल युद्ध लंबा चला तो पैदा हो सकता है खाद का संकट

पश्चिम एशिया में संघर्ष के चलते भारत के लिए सिर्फ पेट्रोलियम पदार्थों का ही संकट पैदा नहीं होगा बल्कि उर्वरकों की सप्लाई भी प्रभावित हो सकती है। यह खबर किसानों के लिए अच्छी नहीं है। पेट्रोलियम की भांति ही उर्वरकों के मामले में भी भारत खाड़ी देशों पर निर्भर है।

Wed, 4 March 2026 05:53 AMDrigraj Madheshia हिन्दुस्तान टीम
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किसानों के लिए बुरी खबर: ईरान-इजरायल युद्ध लंबा चला तो पैदा हो सकता है खाद का संकट

पश्चिम एशिया में संघर्ष के चलते भारत के लिए सिर्फ पेट्रोलियम पदार्थों का ही संकट पैदा नहीं होगा बल्कि उर्वरकों की सप्लाई भी प्रभावित हो सकती है। यह खबर किसानों के लिए अच्छी नहीं है। पेट्रोलियम की भांति ही उर्वरकों के मामले में भी भारत खाड़ी देशों पर निर्भर है। इसके अलावा सोना, खजूर जैसे महत्वपूर्ण उत्पादों की कमी का सामना भारत को करना पड़ सकता है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत का खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) के छह देशों के साथ वित्त वर्ष 2024-25 में कुल द्विपक्षीय व्यापार भारतीय मुद्रा में लगभग 15.56 लाख करोड़ रहा है। ऐसे में खाड़ी देश भारत के बड़े व्यापारिक साझेदार हैं, लेकिन मौजूदा तनाव के बीच भारत के लिए तमाम स्तर पर चुनौतियां खड़ी हो सकती है।

जानकार मानते हैं कि अगर अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध लंबा चलता है और खाड़ी देश भी युद्ध की चपेट में रहते हैं तो उससे भारत को आयात-निर्यात दोनों मोर्चों पर बड़ा नुकसान होगा। अकेले पेट्रोलियम उत्पाद नहीं बल्कि अन्य उत्पादों की कीमतों पर भी तेजी से असर पड़ेगा। इसमें व्यापार से जुड़े कई क्षेत्र ऐसे हैं, जो सबसे पहले प्रभावित होंगे।

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आयात के माेर्चों पर प्रभावित होने वाले क्षेत्र

उर्वरक

भारत में यूरिया और फॉस्फेट जैसे उर्वरकों के कच्चे माल का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से मंगाता है। विशेष रूप से यूरिया और डीएपी के लिए खाड़ी देशों पर निर्भर है। भारत कुल आयात का करीब 46 फीसदी अकेले ओमान से मंगाता है। ऐसे में हॉमुर्ज स्ट्रेट बंद होने से उर्वरक की सबसे ज्यादा किल्लत हो सकती है, जिसका असर आने वाले समय में कीमतों पर पड़ेगा और आने वाले समय में कृषि क्षेत्र भी प्रभावित हो सकता है।

सोना

भारत में संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों से सोने का आयात होता है। शिपिंग लागत बढ़ने से सोना महंगा हो सकता है। दूसरा तनाव लंबा चलने के कारण अधिकांश लोग सोने में सुरक्षित निवेश करेंगे। ऐसे में सोने की कीमतें तेजी से बढ़ेंगी, जिसकी वजह से खाड़ी देशों से होने वाली सोने की खरीद भी महंगी होगी।

खजूर और अन्य खाद्य उत्पाद

खाड़ी देशों से आने वाले खजूर और कुछ प्रोसेस्ड फूड की सप्लाई प्रभावित हो सकती है। भारत अपनी कुल खजूर का करीब 80-90 फीसदी खजूर खाड़ी देशों से आयात करता है। भारत सबसे अधिक मात्रा में साधारण खजूर यूएई से आयात किया जाता है। जबकि ओमान से भी सूखी और ताजी खजूर की बड़ी खेप भारत आती है। इसके साथ ही, कुछ प्रोसेस्ड फूड भी आयात किए जाते हैं। अब तनाव लंबा तलने और हॉमुर्ज स्ट्रेट बंद होने से भारत में खजूर व अन्य प्रोसेस्ड फूड की आपूर्ति बाधित हो सकती है, जिससे कीमतों में उछाल आ सकता है।

निर्यात के मार्चों पर प्रभावित होने वाले क्षेत्र

चावल और खाद्यान्न

सऊदी अरब, इराक, यूएई और ओमान भारत के प्रमुख खाद्यान्न खरीदार हैं। समुद्री मार्ग बंद होने से निर्यात शिपमेंट में देरी हो सकती है। नए मार्गों से आपूर्ति शुरू किए जाने की स्थिति में रूट लंबा होगा और माल ढुलाई की लागत बढ़ेगी, जिससे भारतीय खाद्यान्न की खाड़ी देशों में पहुंच महंगी होगी। भारत से होने वाले कुल बासमती निर्यात का लगभग 50 फीसदी हिस्सा अकेले खाड़ी देशों और ईरान को जाता है। वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने लगभग 60 लाख टन बासमती चावल का निर्यात किया, जिसकी कीमत लगभग 50,312 करोड़ रुपये थी।

मांस और समुद्री उत्पाद

खाड़ी देशों में भारतीय मांस और समुद्री उत्पादों की बड़ी मांग है। भारत से खाड़ी देशों को मुख्य रूप से जमी हुई मछली और झींगा भेजा जाता है। अब तनाव बढ़ने पर लॉजिस्टिक बाधाओं से निर्यात घट सकता है।

फार्मास्यूटिकल्स

भारत दवाइयों का बड़ा सप्लायर है। खासकर जेनेरिक दवाओं की हिस्सेदारी काफी बड़ी है लेकिन आपूर्ति बाधित होने पर निर्यात राजस्व प्रभावित होगा। कई कंपनियों के लिए सामान पहुंचाने में दिक्कत होगी।

इंजीनियरिंग और ऑटो पार्ट्स

मशीनरी, ऑटो कंपोनेंट और निर्माण सामग्री की खेप में देरी हो सकती है। इससे भारतीय कंपनियां खासकर एमएसएमई को नुकसान होगा। जनवरी में ही खाड़ी देशों को होने वाले मशीनरी निर्यात में 16 फ़ीसदी की तेजी दर्ज की गई थी।

कपड़ा और परिधान

खाडी देशों का बाजार रेडीमेड गारमेंट और टेक्सटाइल निर्यात के लिए महत्वपूर्ण है। भारत का खाड़ी देशों (जीसीसी) को कुल परिधान निर्यात बाजार लगभग 1.79 बिलियन डॉलर का है। अब शिपिंग लागत बढ़ने से प्रतिस्पर्धा घट सकती है। इस लिहाज से निर्यात के मोर्चे पर काफी नुकसान होने की आशंका है।

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