hindustan opinion column 26 May 2026 इबोला महामारी फैलने के मायने, Blog Hindi News - Hindustan
More

इबोला महामारी फैलने के मायने

कुछ अफ्रीकी देशों ने चिंता बढ़ा दी है। यदि दुनिया इबोला जैसे महारोगों को रोकना चाहती है, तो उसे स्वास्थ्य वित्त व्यवस्था को स्थायी, विविध और न्यायपूर्ण बनाना होगा।

Mon, 25 May 2026 10:53 PMHindustan लाइव हिन्दुस्तान
share
इबोला महामारी फैलने के मायने

चंद्रकांत लहारिया, वरिष्ठ चिकित्सक और महामारी विशेषज्ञ

कांगो नदी दुनिया की विशाल और गहरी नदियों में गिनी जाती है। इसके एक किनारे पर कांगो गणराज्य की राजधानी ब्राजाविल बसी है, तो दूसरी तरफ कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य की राजधानी किंशासा। दुनिया में यह अनोखा दृश्य कहीं और नहीं मिलता, जहां दो राष्ट्रीय राजधानियां एक-दूसरे के ठीक सामने स्थित हों। किंशासा की ऊंची इमारतें पहली नजर में किसी आधुनिक वैश्विक महानगर का आभास देती हैं, लेकिन यह दुनिया के सबसे गरीब, संघर्षरत और अस्थिर देशों में से एक की राजधानी भी है। इसी देश और इसके पड़ोसी युगांडा में एक बार फिर इबोला महामारी उभरी है, जिसके कारण विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अंतरराष्ट्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल घोषित किया है।

इबोला के वैश्विक महामारी बनने की अभी आशंका नहीं है। यह गंभीर बीमारी तो है, लेकिन यह एक से दूसरे इंसान में तभी फैलती है, जब पहले वाले व्यक्ति में इसके लक्षण मौजूद हों। इसीलिए भारत या अन्य अप्रभावित देशों को तत्काल कोई बड़ा खतरा नहीं है, किंतु बड़ा सवाल यह है कि महामारी से निपटने की तैयारी, वैश्विक सहयोग व स्वास्थ्य सुरक्षा पर लगातार चर्चा के बावजूद इबोला रोग बार-बार क्यों लौट आता है?

इसका उत्तर सिर्फ चिकित्सा विज्ञान में नहीं, बल्कि राजनीति, अर्थव्यवस्था और वैश्विक असमानताओं में भी छिपा है। कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य प्राकृतिक संसाधनों, खनिजों व दुर्लभ धातुओं से अत्यंत समृद्ध देश है। दुनिया की आधुनिक तकनीकी व इलेक्ट्रॉनिक अर्थव्यवस्था जिन खनिजों पर निर्भर है, उनमें से कई का स्रोत यही क्षेत्र है। मगर इस संपदा की कीमत स्थानीय समाज और पर्यावरण चुका रहे हैं। खनन, जंगलों की कटाई और प्राकृतिक आवासों के लगातार बढ़ते अतिक्रमण ने मनुष्यों व जंगली जीवों के बीच की दूरी को कम कर दिया है। नतीजतन, मनुष्य ऐसे रोगजनकों के संपर्क में आ रहे हैं, जो पहले केवल वन्य-जीवों तक सीमित थे। वैज्ञानिक लंबे समय से चेतावनी देते रहे हैं कि पर्यावरण विनाश और संसाधनों का अनियंत्रित दोहन नई महामारियों के उभरने के बड़े कारण बन सकते हैं। इबोला उसी व्यापक संकट का हिस्सा है।

अफ्रीका के कई देश पिछले दशकों में नए संक्रमणों और उभरती बीमारियों के केंद्र रहे हैं। इबोला इनमें से सबसे भयावह बीमारियों में से एक है। यह ऐसी बीमारी बन चुकी है, जिसके कारण सबसे अधिक बार वैश्विक स्वास्थ्य आपातकाल घोषित करना पड़ा है। हालांकि, सवाल यह भी है कि यदि दुनिया हर बार इसके कारण स्वास्थ्य आपातकाल घोषित करती है, तो फिर इसका स्थायी समाधान क्यों नहीं निकालती?

कारण यह है कि संकट आने पर वैश्विक स्वास्थ्य संस्थाएं तेजी से सक्रिय हो जाती हैं, लेकिन संकट को स्थायी रूप से रोकने के लिए वे आवश्यक निवेश नहीं करतीं। जिन देशों में बार-बार इबोला महारोग फैलता है, वहां स्वास्थ्य व्यवस्थाएं पहले से लचर हैं। प्रयोगशालाएं सीमित हैं। स्वास्थ्यकर्मियों की भारी कमी है। ग्रामीण क्षेत्रों तक स्वास्थ्य सेवाएं नहीं पहुंच पा रहीं। और, कई क्षेत्रों में जातीय संघर्ष व राजनीतिक अस्थिरता बनी रहती है। ऐसे में, जब इबोला महामारी फैलती है, तब दुनिया अचानक चिंतित हो उठती है। अंतरराष्ट्रीय टीमें पहुंचती हैं, फंड जारी किए जाते हैं, पर जैसे ही संक्रमण कम होता है, दुनिया का ध्यान हटने लगता है। कुछ वर्षों बाद यही चक्र फिर से चलता है- स्वास्थ्य आपातकाल, अस्थायी सक्रियता और फिर विस्मृति।

यह केवल इबोला की कहानी नहीं है। यह वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था की उस प्रवृत्ति को दर्शाता है, जिसमें गरीब देशों को प्रभावित करने वाली बीमारियों को तब तक गंभीरता से नहीं लिया जाता, जब तक कि वे अमीर देशों की सीमाओं में नहीं पहुंच जातीं। ‘मंकी पॉक्स’ इसका हालिया उदाहरण है। वर्षों तक यह बीमारी अफ्रीकी देशों में सीमित रूप से फैलती रही, पर जैसे ही 2022 में इसके मामले यूरोप और उत्तर अमेरिका में दिखने लगे, अंतरराष्ट्रीय चिंता अचानक बढ़ गई। प्रश्न यह नहीं है कि मंकी पॉक्स को गंभीरता से क्यों लिया गया? प्रश्न यह है कि दुनिया तब तक क्यों प्रतीक्षा करती रही, जब तक बीमारी अमीर देशों तक नहीं पहुंच गई?

इबोला रोग वैश्विक स्वास्थ्य शासन की संस्थागत सीमाओं को भी उजागर करता है। इसके लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की अक्सर निंदा की जाती है, पर असल समस्या कहीं गहरी है। दुनिया यह अपेक्षा तो करती है कि डब्ल्यूएचओ वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा का नेतृत्व करे, पर उसे पर्याप्त संसाधन और शक्ति देने की पहल नहीं करती। डब्ल्यूएचओ का बड़ा हिस्सा दुनिया के अमीर देशों की स्वैच्छिक फंडिंग पर निर्भर है। उन देशों की प्राथमिकताएं समय और नई सरकारों के साथ बदलती रहती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन चेतावनी दे सकता है, समन्वय कर सकता है, तकनीकी मदद दे सकता है, पर देशों को दीर्घकालिक निवेश के लिए बाध्य नहीं कर सकता।

यह बहस तब और अहम हो जाती है, जब महामारी संधि, रोगजनक साझा करने व भविष्य की तैयारी पर चर्चा हो रही हो। कई निम्न और मध्यम आय वाले देश अब पूछने लगे हैं कि यदि वे रोगजनकों और जैविक नमूनों की मार झेलते हैं, तो क्या उन्हें वैक्सीन, तकनीक और उत्पादन क्षमता तक समान पहुंच मिल सकेगी? कोविड-19 ने बताया था कि संकट के समय वैश्विक समानता के दावे कितने कमजोर पड़ जाते हैं।

इसी बीच, वैश्विक स्वास्थ्य वित्त-पोषण में बढ़ती अनिश्चितता ने व्यवस्थागत संवेदनशीलता को और उजागर किया है। अमेरिका सहित कई देशों द्वारा अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रमों में आर्थिक कटौती ने साफ किया है कि वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा कुछ चुनिंदा देशों और फाउंडेशनों पर निर्भर है। लिहाजा, जब किसी एक देश की घरेलू राजनीति बदलती है, तो उसका असर दुनिया भर की स्वास्थ्य व्यवस्थाओं पर दिखने लगता है। यदि दुनिया वास्तव में इबोला जैसे रोगों को रोकना चाहती है, तो उसे स्वास्थ्य वित्त व्यवस्था को अधिक स्थायी, विविध और न्यायपूर्ण बनाना होगा। अफ्रीकी देशों में सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचे, प्रयोगशालाओं और वैक्सीन निर्माण-क्षमता में दीर्घकालिक निवेश करना होगा। महामारी से निपटने की तैयारी केवल आपातकाल आने के बाद राहत भेजने तक सीमित नहीं रह सकती। ‘ग्लोबल साउथ’, ब्रिक्स के देशों और अफ्रीकी संघ को अधिक आर्थिक व नीतिगत भागीदारी करनी होगी।

अहम बात यह है कि निम्न आय वाले देशों को प्रभावित करने वाली बीमारियों को तब भी प्राथमिकता दी जाए, जब वे अमीर देशों तक नहीं पहुंची हों। इबोला का बार-बार लौटना एक वायरस की वापसी भर नहीं है। यह इस तथ्य का प्रमाण है कि वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था आज भी भेदभावपूर्ण बनी हुई है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

लेटेस्ट   Hindi News ,    बॉलीवुड न्यूज,   बिजनेस न्यूज,   टेक ,   ऑटो,   करियर , और   राशिफल, पढ़ने के लिए Live Hindustan App डाउनलोड करें।