hindustan opinion column 18 April 2026 महिला आरक्षण का इंतजार बढ़ गया, Blog Hindi News - Hindustan
More

महिला आरक्षण का इंतजार बढ़ गया

महिला प्रतिनिधित्व बढ़ाने वाले संशोधन विधेयकों का यही हश्र होना था। संसद का यह विशेष सत्र संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, परिसीमन विधेयक और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक की मंजूरी के लिए बुलाया गया था, लेकिन विपक्ष को मना पाने में सत्ता पक्ष नाकाम रहा…

Fri, 17 April 2026 10:23 PMHindustan लाइव हिन्दुस्तान
share
महिला आरक्षण का इंतजार बढ़ गया

आरती आर जेरथ,वरिष्ठ पत्रकार

महिला प्रतिनिधित्व बढ़ाने वाले संशोधन विधेयकों का यही हश्र होना था। संसद का यह विशेष सत्र संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, परिसीमन विधेयक और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक की मंजूरी के लिए बुलाया गया था, लेकिन विपक्ष को मना पाने में सत्ता पक्ष नाकाम रहा। नतीजतन इन संशोधनों पर बात नहीं बन सकी।

इसका एहसास तभी हो गया था, जब गुरुवार देर रात कानून मंत्रालय ने महिला आरक्षण अधिनियम 2023 को लागू करने की अधिसूचना जारी की। लोकसभा व विधानसभाओं में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण को स्वीकार करने वाला यह अधिनियम 2023 में पारित किया गया था और इसी में संशोधन को लेकर हमारे सांसद बहस में उलझे हुए थे। इन संशोधनों के पारित न होने पर अधिनियम खुद-ब-खुद निरस्त हो जाता। बिल के पारित होने की संभावना शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ट्वीट से दूर हो गई। उन्होंने सभी नेताओं से अंतरात्मा की आवाज सुनने की अपील की थी।

इस घटनाक्रम के कुछ संकेत बिल्कुल साफ हैं। यह बताता है कि संसद चलाने के लिए सर्वसम्मति बनाना कितना अहम होता है। यह सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच गहरे होते मतभेद ही हैं कि हर मुद्दे पर दोनों एक-दूसरे से टकराते नजर आते हैं। इन संशोधनों को लेकर यदि सरकार की तरफ से विपक्ष को साथ लाने की पहल पूर्व में की गई होती या सर्वदलीय बैठकों का आयोजन किया गया होता, तो शायद कल तस्वीर दूसरी निकलकर सामने आती! एक साल में औसतन 55 से 70 दिनों तक अब संसद का संचालन होता है। अगर ये दिन भी टकराव में बीतते रहे, तो जनहित के काम कब हो सकेंगे? इस सर्वसम्मति की जरूरत तब और बढ़ जाती है, जब सत्ता पक्ष की ओर से संवेदनशील मुद्दों पर विधेयक लाए जाते हैं। मौजूदा संशोधन विधेयक वास्तव में इसी रणनीतिक चूक की भेंट चढ़े हैं।

दूसरा संकेत, विपक्ष इसमें अपने लिए नई संजीवनी ढूंढ़ सकता है। ‘अनुच्छेद 370’ और ‘एक साथ तीन तलाक’ को खत्म करने के समय विपक्षी दलों में बिखराव साफ-साफ दिखा था, इसलिए वे उस समय सरकार को रोक नहीं सके थे। किंतु इस बार ऐसा नहीं हुआ। जाहिर है, एकजुट होकर यदि वे सरकार के खिलाफ लड़े, तो उनको सफलता मिल सकती है। विपक्ष चाहे, तो अपनी अगली रणनीतियों के लिए इससे जरूरी सबक सीख सकता है।

बहरहाल, संसद में सत्ता पक्ष की तरफ से यह जरूर कहा गया कि महिलाओं को आरक्षण देने में कोई राजनीति नहीं होनी चाहिए, मगर दुर्भाग्य से इसमें सियासत खूब की गई। यह महिलाओं को धोखा देना ही था कि नारी वंदन के नाम पर परिसीमन को आगे बढ़ाया गया। परिसीमन कितना संवेदनशील मुद्दा है, इसे यूं भी समझ सकते हैं कि इंदिरा गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेताओं ने भी इसमें हाथ लगाना उचित नहीं समझा था। सन् 1976 के बाद से किसी ने इस मुद्दे को नहीं छेड़ा था। फिर अभी ऐसा क्यों किया गया, वह भी इतनी जल्दबाजी में? जनगणना संपन्न होने का इंतजार तो किया ही जा सकता था।

इन संशोधनों पर सहमति बन जाने से सत्ता पक्ष को कितना लाभ मिल पाता, इसकी सटीक गणना तो नहीं की जा सकती, लेकिन यहां 1977 के लोकसभा चुनाव को याद करना स्वाभाविक है। उस समय पूरा दक्षिण भारत जीत लेने के बावजूद कांग्रेस अपनी सरकार नहीं बना सकी थी, क्योंकि उत्तर भारत का नतीजा जनता पार्टी के खाते में गया था। इस बार भी संभवत: विपक्ष को यही आशंका थी। उसका आरोप है कि सीटों में बढ़ोतरी से उत्तरी हिस्से को दक्षिण की तुलना में कहीं अधिक फायदा मिलता। बेशक, अनुपात के अनुसार ही लोकसभा की सीटों में वृद्धि होने के दावे किए गए थे, पर माना यही जा रहा था कि परिसीमन के बाद उत्तर भारत में 200 से अधिक सीटें बढ़ेंगी, जबकि दक्षिण में महज 65 का इजाफा होगा। चूंकि, भारतीय जनता पार्टी का उत्तर भारत पर असर निर्विवाद है, इसलिए विपक्ष को यह साल 2029 के आम चुनाव को प्रभावित करने की कवायद अधिक लगी।

इस विशेष सत्र का समय भी सवालों के घेरे में रहा। अभी जिन पांच सूबों में चुनाव चल रहे हैं, उनमें से पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु भाजपा के लिए काफी अहमियत रखते हैं। कहा जा रहा है कि ‌लोकसभा और राज्यसभा मिलाकर चूंकि तृणमूल कांग्रेस के पास 42 सांसद हैं, तो द्रमुक के पास करीब 30, इसलिए ऐन मतदान-प्रक्रिया के बीच संसद का यह विशेष सत्र बुलाया गया, ताकि दोनों पार्टियों के सांसदों के भाग लेने की गुंजाइश कम हो जाए और संशोधनों को पारित कराने के जरूरी आंकड़े जुटा लिए जाएं।

हालांकि, इन सबमें कुछ अच्छी बातें भी रहीं, जिनको बदलती भारतीय राजनीति का संकेत मानना चाहिए। गौरतलब है कि 1996 में पहली बार महिला आरक्षण बिल संसद में लाया गया था, लेकिन तब यह पास नहीं हो सका था। उस समय विरोध करने वाले दलों में भाजपा भी शामिल थी। इस पार्टी पर ‘पुरुषों के प्रभुत्व’ होने के भी आरोप लगते रहे हैं। किंतु आज यही पार्टी नारी-हितैषी दिख रही है। 2014 में सत्ता में आने के बाद से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्राथमिकता में महिलाएं रही हैं। उनके हितों को तवज्जो देने के लिए उन्होंने कई काम भी किए हैं- फिर चाहे हर घर शौचालय का लक्ष्य बनाया गया हो या उज्ज्वला योजना के तहत गरीब महिलाओं को एलपीजी गैस देना, और अब नारी शक्ति वंदन अधिनियम। ये तमाम संकेत भाजपा को महिलाओं को लेकर खासा गंभीर बना रहे हैं।

इसका अर्थ यही है कि अब महिला आरक्षण को लेकर दिए जाने वाले नारों को सच बनाना ही चाहिए। इसके लिए सर्वप्रथम परिसीमन को रोकना उचित होगा। कायदे से इसे सभी पार्टियों की रायशुमारी के बाद ही आगे बढ़ाना चाहिए, विशेषकर दक्षिण भारत की चिंताओं को समझते हुए। इतना ही नहीं, अगर तमाम दल महिला आरक्षण को लेकर वाकई ईमानदार हैं, तो उन्हें इसे 2029 के चुनाव में लागू कराने के प्रयास करने चाहिए। इसके लिए सत्ता पक्ष और विपक्ष मिलकर काम करें, तो बेहतर होगा।

यहां प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व की परीक्षा भी है। वह मौजूदा दौर के सबसे करिश्माई राजनेता हैं। नारियों को शक्ति देने को लेकर वह गंभीर दिखते रहे हैं। लिहाजा उन्हें कहीं अधिक संजीदगी से कदम बढ़ाना चाहिए। यह महिलाओं के हित में उनकी बड़ी सेवा होगी।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

लेटेस्ट   Hindi News ,    बॉलीवुड न्यूज,   बिजनेस न्यूज,   टेक ,   ऑटो,   करियर , और   राशिफल, पढ़ने के लिए Live Hindustan App डाउनलोड करें।