Hindustan aajkal column by Shashi Shekhar 08 March 2026 नीतीश कुमार का नया अवतार, Editorial Hindi News - Hindustan
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नीतीश कुमार का नया अवतार

सियासत और समय का अनोखा रिश्ता है। इस बार एक सियासी शख्सियत पर समय भारी पड़ रहा था। ऐसे में, नीतीश कुमार का राज्यसभा जाने का निर्णय उनकी सियासी परिपक्वता का परिचायक है। उन्होंने शीर्ष पर रहते हुए पटरी बदलने का फैसला खुद किया है…

Sat, 7 March 2026 08:29 PMShashi Shekhar लाइव हिन्दुस्तान
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नीतीश कुमार का नया अवतार

वह सन् 2000 का मार्च महीना था। नीतीश कुमार अपनी सात दिन पुरानी सरकार के सिलसिले में विधानसभा से मुखातिब थे। उन्हें बहुमत साबित करने के लिए कम से कम 12 विधायकों की आवश्यकता थी। आज की रीति-नीति से तो 20 निर्दलीय और 23 कांग्रेसियों की मौजूदगी के चलते यह कोई मुश्किल काम न था, लेकिन वे दिन अलग थे।

विधानसभा में लालू यादव की अगुवाई वाले राष्ट्रीय जनता दल के सर्वाधिक 124 सदस्य थे, जबकि नीतीश की समता पार्टी को महज 34 सीटें मिली थीं। उन्हें भाजपा और अन्य सहयोगियों सहित कुलजमा 151 सदस्यों का साथ हासिल था। इसी ‘आधार’ पर राज्यपाल ने उन्हें सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया था। उनके सत्तारोहण के समय से ही खबरें उड़ रही थीं कि लालू के करीबी सांसद शहाबुद्दीन के लोगों ने कांग्रेस के 23 विधायकों की ‘बाड़ाबंदी’ कर रखी है। अखबार इस आशय की सुर्खियों से सराबोर थे, लेकिन हुकूमत हाथ में होने के बावजूद नीतीश कुमार लाचार थे। लालू यादव ने अपने पहले सत्ता-दशक में ही बिहार की प्रशासनिक व्यवस्था में अनोखी और अनसुनी परंपराएं रोप दी थीं। सिर्फ सात दिन की सत्ता में उनसे मुक्ति पाना असंभव था।

सदन के अंदर और बाहर का माहौल चीख-चीखकर कह रहा था कि नए मुख्यमंत्री को दर-बदर होना होगा।

ऐसा ही हुआ और नीतीश कुमार को अपने भावुक भाषण के साथ पहली पारी को विराम देना पड़ा। उनके लाचारी भरे शब्द थे- ‘बिहार की जनता देख रही है कि किस तरह लोकतंत्र को बंधक बनाया गया है। विधायकों को डरा-धमकाकर और होटलों में बंद करके जो बहुमत जुटाया जाता है, वह टिकाऊ नहीं होता। क्या हम इसी तरह की राजनीति बिहार को देना चाहते हैं, जहां जन-प्रतिनिधियों को अपनी मर्जी से चलने की आजादी न हो?’

इस नाटकीय घटनाक्रम के बाद राबड़ी देवी फिर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर जा विराजी थीं। वजह? लालू यादव किसी ‘बाहरी’ को कुर्सी सौंपने का जोखिम नहीं उठा सकते थे। पार्टी टूट सकती थी। आज वही खेल दूसरे चेहरों के साथ दोहराया जा रहा है। 1 अणे मार्ग से रुखसती के फैसले के साथ नीतीश कुमार को भी वही करना पड़ रहा है, जो उनके विपक्षी किया करते थे। लालू ने घर-गृहस्थी सम्हालने वाली राबड़ी को सत्ता सौंपी थी, तो नीतीश को राजनीति से दूर रहने वाले अपने पुत्र निशांत कुमार को राजनीति में लाना पड़ रहा है। आप इसे समाजवादी सिद्धांतों की शोकांतिका कह सकते हैं, लेकिन पार्टी को एकजुट रखने का इसके अलावा कोई और उपाय नहीं है।

सवाल उठता है कि क्या निशांत कुमार अपने पिता की रिक्ति को भर पाएंगे? इसके लिए उन्हें कड़ी मशक्कत और समझदारी का परिचय देना होगा। उनके प्रमुखतम प्रतिद्वंद्वी तेजस्वी यादव भगीरथ प्रयासों के बावजूद आज तक लालू यादव के खाली पदचिह्नों को भर नहीं सके हैं। इसके साथ दूसरा प्रश्न फिजां में तैर रहा है, बिहार के सचिवालय पर अब किसका आधिपत्य होगा? क्या भाजपा खुद सत्ता सम्हालने का प्रयास करेगी?

तय है, भगवा दल अगर अब मौका चूकता है, तो उसे लंबे समय तक पछताना पड़ेगा। ऐसा मानने की सबसे बड़ी वजह यह है कि लगातार ज्यादा सीटें जीतने के बावजूद उसकी अधिकतम छलांग उप-मुख्यमंत्री पद तक सीमित रही है। पार्टी की दूसरी सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि सुशील मोदी की सफल, लंबी और सुनियोजित पारी के चलते प्रादेशिक स्तर पर कोई अन्य चेहरा अपना स्थान नहीं बना सका। पिछले विधानसभा चुनाव के तत्काल बाद नितिन नवीन को राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर अभिषिक्त कर भाजपा ने इस रिक्ति को भरने की पहले कोशिश की थी। अब प्रादेशिक स्तर पर यही कवायद दोहरायी जानी है।

इस मौके पर पटना में गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी भी अनायास नहीं थी। वैसे तो प्रत्यक्ष तौर पर वह राष्ट्रीय अध्यक्ष का नामांकन पत्र दाखिल कराने के लिए बिहार की राजधानी पहुंचे थे, लेकिन पार्टी के दूसरे सबसे शक्तिशाली नेता की मौजूदगी तमाम कयासों को जन्म तो देती ही है। बिहार में एक बड़ा तबका मानता है कि नीतीश कुमार का तीसरा और चौथा कार्यकाल पहले सा शानदार नहीं रहा। उनके स्वास्थ्य को लेकर भी तमाम खबरें उड़ रही थीं। बेदाग छवि और लोकप्रियता के बावजूद ‘परिवर्तन’ का माहौल बनाया जा रहा था। सियासत और समय का अनोखा रिश्ता है। इस बार एक सियासी शख्सियत पर समय भारी पड़ रहा था। ऐसे में, नीतीश कुमार का राज्यसभा जाने का निर्णय उनकी सियासी परिपक्वता का परिचायक है। उन्होंने शीर्ष पर रहते हुए पटरी बदलने का फैसला खुद जाहिर किया है।

हालांकि, 1 अणे मार्ग में भाजपा या जनता दल (यू) का कोई भी सदस्य विराजे, उसे नीतीश कुमार की बराबरी पाने में वक्त लगेगा। नीतीश ने बड़े जतन से बिहार को ‘जंगलराज’ से निकाला था। मैंने खुद बहैसियत पत्रकार इस प्रदेश की खस्ताहाल सड़कें, सरकारी संस्थानों का पतन और पुलिस थानों की दुर्दशा देखी है। मैंने उनसे एक बार पूछा था कि आपने यह सब कैसे ठीक किया है? नीतीश कुमार का जवाब था कि इसके लिए समस्या को जड़ से समझना जरूरी होता है। मैं जब दोबारा सत्ता में आया, तब पुलिस थानों में वाहन थे, तो डीजल का पैसा नहीं था। शिकायतकर्ताओं को रिपोर्ट लिखाने के लिए अपने साथ कागज तक लाना होता था।

कुछ पल ठहरकर नीतीश कुमार ने आगे कहा था कि जब पुलिस छापे मारने के लिए डग्गामार वाहनों का इस्तेमाल करे और शिकायतकर्ता अपना कागज स्वयं लेकर आए, तो भला आप क्या उम्मीद कर सकते हैं? इसी तरह, गिट्टियां, गड्ढे, और हिचकोले बिहार की सड़कों की पहचान बन गए थे। लड़कियों को डर के मारे अन्य गांवों में पढ़ने नहीं भेजा जाता था और शाम ढलने के बाद सड़कों पर जनाना चेहरा नजर नहीं आता था।

नीतीश कुमार ने इन सबको बदला। उनकी साइकिल योजना ने बालिकाओं को जैसे पंख लगा दिए। आज बिहार के कुल पुलिस बल में करीब 35 फीसदी महिलाएं हैं। सरकारी दफ्तरों और स्कूलों में भी गजब का परिवर्तन देखने को मिलता है। हरेक को घर, हर घर नल जल और बिजली जैसी योजनाएं उन्होंने शुरू कीं। कुछ सिरे तक पहुंचीं, तो कुछ मनोवांछित परिणाम न दे सकीं, लेकिन वे बिहार को कुशासन के दलदल से बाहर निकालने की कोशिश अवश्य कर रहे थे। इसी दौरान वह कुछ फैसले आवश्यकता से अधिक कठोर कर गए। शराबबंदी इनमें से एक है। इसने उनके महिलाओं के समर्थन को पुख्ता अवश्य किया, लेकिन अवैध और नकली शराब के लिए भी दरवाजे खोल दिए। हजारों लोग जेल में ठूंसे गए, तो खजाने पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।

नए मुख्यमंत्री के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती यही होगी। उन्हें दो दशक से अधिक हुकूमत करने वाले कद्दावर व्यक्ति के साए से बाहर निकालने के साथ, चुनाव के दौरान जनी गईं जन आकांक्षाओं के ज्वार से भी जूझना होगा।

@shekharkahin

@shashishekhar.journalist

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