हमारे कार्यस्थल अब भी सुरक्षित नहीं
विश्व कार्यस्थल सुरक्षा और स्वास्थ्य दिवस प्रत्येक वर्ष 28 अप्रैल को मनाया जाता है। यह दिन दुनिया भर में काम करने वाले करोड़ों लोगों के जीवन से सीधे जुड़ा है। यह केवल एक औपचारिक अवसर नहीं है, बल्कि मानव जीवन की सुरक्षा…

विश्व कार्यस्थल सुरक्षा और स्वास्थ्य दिवस प्रत्येक वर्ष 28 अप्रैल को मनाया जाता है। यह दिन दुनिया भर में काम करने वाले करोड़ों लोगों के जीवन से सीधे जुड़ा है। यह केवल एक औपचारिक अवसर नहीं है, बल्कि मानव जीवन की सुरक्षा, गरिमा और अधिकारों की रक्षा का एक गंभीर स्मरण भी है। इस दिन का उद्देश्य कार्यस्थलों पर होने वाली दुर्घटनाओं, बीमारियों व जोखिमों के प्रति जागरूकता बढ़ाना और सरकारों, संस्थाओं व समाज को यह याद दिलाना है कि आर्थिक विकास का वास्तविक आधार सुरक्षित और स्वस्थ श्रमिक ही होते हैं।
दुनिया भर में आज भी बड़ी संख्या में लोग असुरक्षित परिस्थितियों में काम करने के लिए मजबूर हैं। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार, हर वर्ष लगभग 27.8 लाख लोग कार्यस्थल से जुड़ी दुर्घटनाओं और बीमारियों के कारण अपनी जान गंवा देते हैं। यह बताता है कि कार्यस्थलों की सुरक्षा केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि एक अनिवार्यता है। विकासशील देशों में स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण है। भारत जैसे देशों में बड़ी संख्या में लोग असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं, जहां न तो उचित सुरक्षा उपकरण उपलब्ध होते हैं, न ही स्वास्थ्य संबंधी सुविधाएं। खेतों में काम करने वाले मजदूर, निर्माण-स्थलों पर काम करने वाले श्रमिक, छोटे कारखानों के कर्मचारी और घरेलू कामगार अक्सर जोखिम भरे वातावरण में काम करते हैं। कई बार उन्हें यह भी पता नहीं होता कि वे किन खतरों के बीच काम कर रहे हैं। यह अज्ञानता दुर्घटनाओं की आशंकाएं बढ़ा देती हैं।
कार्यस्थल पर सुरक्षा का अर्थ केवल शारीरिक सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें मानसिक और सामाजिक स्वास्थ्य भी शामिल है। आधुनिक समय में काम का दबाव, लंबे समय तक काम करना, अस्थिर रोजगार और आर्थिक असुरक्षा जैसे कारक मानसिक तनाव को बढ़ा रहे हैं। तकनीकी प्रगति ने जहां एक ओर काम को आसान बनाया है, वहीं जोखिम भी उत्पन्न किए हैं। इसलिए सुरक्षा उपायों को समय के साथ अद्यतन करना जरूरी है। सरकारों की भूमिका इस दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। मजबूत कानून, प्रभावी निगरानी और सख्त कार्यान्वयन के बिना कार्यस्थलों पर सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जा सकती। भारत में भी श्रम कानूनों के माध्यम से सुरक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े कई प्रावधान किए गए हैं, लेकिन इनका सही क्रियान्वयन अब भी एक चुनौती बना हुआ है। कई छोटे उद्योगों में नियमों का पालन नहीं किया जाता और निरीक्षण की प्रक्रिया भी पर्याप्त नहीं है। इस स्थिति को सुधारने के लिए सरकार, उद्योग जगत और समाज के बीच सहयोग आवश्यक है।
महेंद्र तिवारी, टिप्पणीकार
पहले से बेहतर हुई श्रमिकों की सुरक्षा
कामगारों की कार्यस्थल पर सुरक्षा निस्संदेह एक बड़ा मसला है। हर श्रमिकों की सुरक्षा अनिवार्य है और इसे हर हाल में सुनिश्चित किया जाना चाहिए। यह सही है कि अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की रिपोर्ट बताती है कि कार्यस्थलों पर मौत को लेकर तमाम सरकारों को गंभीर होना चाहिए, किंतु यह भी सच है कि भारत में श्रमिकों के हित में कई काम किए गए हैं। भारत में कार्यस्थलों पर सुरक्षा बढ़ाने को लेकर व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यदशा संहिता, 2020 के अधीन 13 श्रम कानूनों को एकीकृत किया गया है। यह कानून निर्माण, खनन और विनिर्माण क्षेत्रों में व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण, अनिवार्य सुरक्षा समितियों और नियमित निरीक्षण के माध्यम से सुरक्षा व समान कार्य के माहौल को सुनिश्चित किए जाने पर जोर देता है।
हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि कामगारों में बड़ी आबादी महिलाओं की होती है और उनके हितों की सुरक्षा के लिए हमारे देश में विशेष प्रयास किए गए हैं। हमारे देश में यह समझा गया है कि सुरक्षित कार्यस्थल केवल एक कानूनी आवश्यकता नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करता है कि महिलाएं समानता, गरिमा और आर्थिक सशक्तीकरण के अपने मौलिक अधिकारों का प्रयोग कर सकें। कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 के तहत प्रदत्त उनके मौलिक अधिकारों का गंभीर उल्लंघन है। कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 का मकसद महिलाओं के लिए एक सुरक्षित कार्य वातावरण बनाना है। यह अधिनियम सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों, संगठित और असंगठित क्षेत्रों में काम करने वाली सभी महिलाओं पर लागू होता है, चाहे उनकी आयु या रोजगार की स्थिति कुछ भी हो। इसमें घरेलू कामगार भी शामिल हैं। नियोक्ताओं को 10 या अधिक कर्मचारियों वाले कार्यस्थलों में आंतरिक समितियां गठित करनी होंगी। 29 अगस्त, 2024 से शुरू ‘शी-बॉक्स’ पोर्टल स्त्रियों को ऑनलाइन शिकायत दर्ज करने के लिए एक एकल-खिड़की मंच उपलब्ध करता है।
साफ है, अपने देश में कामगारों को न सिर्फ कानूनी सुरक्षा मिली हुई है, बल्कि सुरक्षा के दूसरे उपाय भी किए गए हैं। उनके लिए बीमा और मुआवजे की भी व्यवस्था की गई है। इतना ही नहीं, हर साल 4 से 10 मार्च के बीच राष्ट्रीय सुरक्षा सप्ताह मनाया जाता है, ताकि सुरक्षा संस्कृति को बढ़ावा दिया जा सके। हां, कुछ काम अब भी शेष हैं। हालांकि, उम्मीद यही है कि जल्द ही उनको भी पूरा कर लिया जाएगा।
हृतेश मिश्र, टिप्पणीकार
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