विपक्षी दलों ने अपना ही नुकसान किया
लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के आरक्षण से जुड़े नारी शक्ति वंदन (संशोधन) विधेयक का संसद में पारित न होना बताता है कि कांग्रेस सहित तमाम विपक्षी दलों की महिलाओं के प्रति कैसी मानसिकता है…

लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के आरक्षण से जुड़े नारी शक्ति वंदन (संशोधन) विधेयक का संसद में पारित न होना बताता है कि कांग्रेस सहित तमाम विपक्षी दलों की महिलाओं के प्रति कैसी मानसिकता है। एक बार फिर राजनीतिक दलों के स्वार्थ और उनकी राजनीति ने आधी आबादी को उनके अधिकारों से वंचित कर दिया। विपक्ष की वास्तविक मंशा यही रही कि एनडीए सरकार को इसका श्रेय और राजनीतिक लाभ न मिले। विपक्षी दल प्रायः सभी मुद्दों पर ऐसा ही करते हैं और सरकार से उलझते रहते हैं। नतीजतन, किसी मुद्दे पर आम सहमति नहीं बन पाती है। सरकार की नीतियों और क्रियाकलापों पर विपक्ष विश्वास ही नहीं करता है। आज तक कांग्रेस सहित सभी विपक्षी दलों ने एकाध मामलों को छोड़कर सरकार के किसी भी विधेयक का समर्थन नहीं किया है।
संवेदनशील और जनहित संबंधी विधेयकों पर विपक्ष का अड़ंगा निश्चित रूप से देश के विकास में बाधा उत्पन्न करता है। संसद सत्रों के बहुमूल्य समय में भी रुकावट उत्पन्न की जाती है और उसका अधिकांश समय हंगामों की भेंट चढ़ जाता है। ऐसा पहली बार ही देखा गया कि किसी विधेयक के पारित नहीं होने पर सदन के भीतर और बाहर उत्साह मनाया गया। इससे यह तो स्पष्ट हो ही गया कि महिलाओं को अधिकार देने के मामले में ये दल कितने तंग हैं। वर्षों से महिला आरक्षण का मामला लटका हुआ था। 2023 में इस पर सहमति बनी, पर अभी संशोधन की जो बात सत्ता पक्ष की तरफ से कही गई थी, उसका अपना महत्व था। विपक्षी दलों ने कोटे में कोटा और नई जनगणना को आधार बनाकर इसका विरोध किया। जनगणना अभी प्रारंभ ही हुई है और इसके अंतिम आंकड़े आने में बहुत समय लगेगा। तब तक के लिए इसे लटकाने का मतलब नहीं था। आखिर 2011 की जनगणना के आंकड़ों से क्या दिक्कत थी?
समस्या यह है कि सभी दल फौरी तौर पर महिला आरक्षण का पक्ष लेते हैं, लेकिन वास्तविक धरातल पर उनकी सोच एकदम विपरीत दिखाई देती है। परिसीमन से भी किसी राज्य, विशेषकर दक्षिण के राज्यों को राजनीतिक दृष्टि से किसी प्रकार की हानि नहीं हो रही थी। गृह मंत्री ने खुद सदन में इसको लेकर आश्वासन दिया था। देश में कई ऐसे लोकसभा क्षेत्र हैं, जहां की आबादी 20 लाख से अधिक है, वहां हर व्यक्ति तक सांसद कतई नहीं पहुंच सकता। ऐसे में, विपक्ष द्वारा परिसीमन को उत्तर और दक्षिण के विवाद से जोड़ना उचित प्रतीत नहीं होता है। इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं बनाया जाना चाहिए, यह देशहित में ठीक नहीं है।
रामबाबू सोनी, टिप्पणीकार
बिल पास कराना सत्ता पक्ष की जिम्मेदारी
महिला आरक्षण से जुड़े ताजा घटनाक्रम को सिर्फ ‘जीत’ या ‘हार’ के राजनीतिक चश्मे से देखना वास्तविकता को छोटा करना होगा। सच्चाई यह है कि यह मुद्दा भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता की परीक्षा बन चुका है। महिलाओं को विधायिका में 33 प्रतिशत प्रतिनिधित्व देने का विचार नया नहीं है। करीब तीन दशकों से यह मुद्दा चर्चा में है, लेकिन हर बार किसी न किसी कारण से टलता रहा। विडंबना ही है कि सभी राजनीतिक दल सार्वजनिक मंचों पर महिला सशक्तीकरण की बातें करते हैं, लेकिन जब ठोस निर्णय लेने का समय आता है, तो सहमति बिखर जाती है। हालिया घटनाक्रम ने एक बार फिर यह साबित किया कि महिलाओं का उचित आरक्षण अब भी प्राथमिकता नहीं, बल्कि राजनीतिक रणनीति का हिस्सा भर है। और यह बात सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों के लिए सही है।
विपक्ष की ओर से इसे लोकतंत्र और संविधान की ‘जीत’ बताया गया, जैसा कि प्रियंका गांधी ने भी कहा, लेकिन यदि गहराई से देखें, तो यह दावा अधूरा लगता है। लोकतंत्र की असली जीत तब होती, जब देश की आधी आबादी की सत्ता में उचित भागीदारी सुनिश्चित होती। इस दृष्टि से यह परिणाम महिलाओं की आकांक्षाओं के साथ न्याय नहीं करता। दूसरी ओर, सत्ता पक्ष भी अपनी जिम्मेदारियों से बच नहीं सकता। राजनीतिक यथार्थ यही है कि महिला मतदाता अब एक निर्णायक वर्ग है। पिछले कुछ वर्षों में महिलाओं को लक्षित करके चलाई गई योजनाओं- जैसे उज्ज्वला, जन-धन, प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण आदि ने उन्हें राजनीतिक रूप से अधिक जागरूक और सक्रिय बनाया है। ऐसे में, संशोधन का मुद्दा भले टल गया हो, लेकिन महिला मतदाताओं का महत्व कम नहीं हुआ है।
यह भी एक महत्वपूर्ण पहलू है कि यदि यह विधेयक पास हो जाता, तो उसका श्रेय सत्ता पक्ष को मिलता। वहीं, इसके टलने से विपक्ष इसे अपने राजनीतिक नैरेटिव के रूप में इस्तेमाल कर सकता है। इस तरह, दोनों पक्ष अपने-अपने तरीके से इसे पेश कर रहे हैं, लेकिन इस राजनीतिक खेल में असली नुकसान महिलाओं का ही हो रहा है, जिनकी भागीदारी एक बार फिर भविष्य के हवाले कर दी गई है। निस्संदेह, आने वाले चुनावों में यह मुद्दा बनेगा। खासकर, ग्रामीण और निम्न आय वर्ग की महिलाएं, जो अब तक योजनाओं के आधार पर वोट देती रही हैं, यह सवाल पूछ सकती हैं कि जब उचित प्रतिनिधित्व की बात आई, तो उन्हें क्यों पीछे रखा गया? यह असंतोष धीरे-धीरे राजनीतिक समीकरणों को बदल सकता है। सत्ता पक्ष को इस संशोधन पर सहमति बनानी चाहिए थी।
विभूति बुपक्या, टिप्पणीकार
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