रिश्तों के शहर में जब अपने मुंह फेर लें..., पति-बेटे के रहते सरकारी फाइल में सिमट गई पूनम
मौत के बाद पूनम की लाश चार दिनों तक सरकारी अस्पताल में अंतिम संस्कार का इंतजार करती रही। पति छोड़ गया था और ससुराल वाले नहीं पहुंचे। बेटे मात्र 10 साल का है।

रिश्तों के शहर में जब अपने ही मुंह फेर लें, तब कभी-कभी इंसानियत किसी अजनबी के हाथों से उजागर होती है। चार दिनों तक सदर अस्पताल के पोस्टमार्टम हाउस की ठंडी दीवारों के बीच पड़ी एक महिला की देह सिर्फ एक मृत्यु का विवरण नहीं थी, बल्कि वह समाज, रिश्तों और व्यवस्था की संवेदनहीनता का मूक दस्तावेज बन चुकी थी। अंततः रविवार को अस्पताल प्रबंधन ने उस ज्ञात महिला को अज्ञात मानते हुए अंतिम संस्कार कर दिया।
विडंबना यह रही कि जिस मां ने एक बेटे को जन्म दिया, उसी बेटे को उसकी चिता तक आग देने का अधिकार भी न मिल सका। उक्त मृतका को रविवार को जब शव का अंतिम संस्कार किया गया, तो मुखाग्नि बेटे या पति ने नहीं, बल्कि पोस्टमार्टम वाली महिला कर्मचारी मंजू ने दी। जिस मां के आंचल में कभी दस वर्षीय पंकज ने आंखें खोली थीं, उसी मां की चिता को वह मुखाग्नि तक नहीं दे सका। बदहवास वह इस बात से अनजन है कि उसकी मां उसे छोड़कर इस दुनियां से जा चुकी है। ससुराल पक्ष के इनकार और पति की गैरहाजिरी ने पूनम को मौत के बाद भी बेसहारा छोड़ दिया। ऐसे में महिला पोस्टमार्टम कर्मी मंजू आगे आईं और बिना किसी रिश्ते के, बिना किसी पहचान के सिर्फ इंसानियत के नाते मुखाग्नि दी।
पूनम, जो जीवन में पत्नी, बहू और मां थी, अंतिम यात्रा में एक सरकारी फाइल और अस्पताल के कागजों के बीच सिमट गई। मगर उसकी चिता को आग देने वाला हाथ बता गया कि संवेदना अब भी जिंदा है। एक अजनबी महिला ने वह फर्ज निभाया, जिसे खून के रिश्ते निभाने से कतराते रहे। यह कहानी सिर्फ एक मौत की नहीं, बल्कि उस करुणा की है, जो व्यवस्था की बेरुखी और रिश्तों की बेरहमी के बीच भी जलती रही।
दरअसल नगर थाना क्षेत्र के बारह पत्थर मोहल्ले में मंगलवार की सुबह किराये के मकान से संदिग्ध हालत में मिले शव की पहचान अंगारघाट थाना क्षेत्र के अंगार गांव निवासी शैलेश पासवान की पत्नी पूनम कुमारी के रूप में हुई थी। पुलिस ने उसी दिन शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए सदर अस्पताल भेज दिया और ससुराल पक्ष को सूचना भी दी। लेकिन इसके बाद जो हुआ, वह रिश्तों की बेरुखी की सबसे कड़वी तस्वीर बन गया।
चार दिन बीत गए। न पति आया, न ससुराल का कोई सदस्य। बताया जाता है कि पति पहले ही पत्नी को छोड़ चुका था और अपनी एक अलग दुनिया बसा चुका है। इधर उसके ससुराल वालों ने भी शव लेने से साफ इनकार कर दिया। नियमों, प्रक्रियाओं और फोन कॉल्स के बीच पूनम का शव पोस्टमार्टम हाउस में यूं ही पड़ा रहा मानो वह अब किसी की नहीं रही हो। इसी बीच एक दस वर्षीय मासूम पंकज अपनी मां के जाने के बाद अचानक अनाथ हो गया। वही बच्चा, जिसकी आंखों ने उस सुबह मां को खामोश देखा था, आज भी किसी अपने के आने का इंतजार करता रहा।
उसकी आंखों में सवाल था मां तो चली गई, अब मेरा कौन है। फिलहाल वह मकान मालिक के पास है और पुलिस उसे चाइल्ड लाइन को सौंपने की प्रक्रिया में जुटी हुई है। नगर थानाध्यक्ष अजीत कुमार के अनुसार परिजनों से लगातार संपर्क की कोशिश की गई, लेकिन कोई भी आगे नहीं आया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट और कानूनी औपचारिकताओं के बीच, 72 घंटे बीत जाने के बाद प्रशासन ने अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी खुद उठाई।




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