लोकसभा चुनाव के बाद पूरे देश में नहीं, तो अभी बिहार क्यों? वोटर लिस्ट रिवीजन पर तेजस्वी यादव का सवाल
यदि मतदाता सूची में सुधार करना था, तो यह लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद और पूरे देश में समान रूप से किया जा सकता था। सिर्फ बिहार को क्यों निशाना बनाया गया?

बिहार विधानसभा चुनावों से महज दो-तीन महीने पहले मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन की भारत निर्वाचन आयोग की कवायद न केवल संदेहास्पद, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की नींव पर सीधा हमला है। साल 2024 के लोकसभा चुनाव इसी मतदाता सूची के आधार पर कराए गए। अब अगर वह सूची गलत थी, तो क्या उसी सूची के आधार पर बनी सरकार की वैधता पर सवाल नहीं उठता? यदि वास्तव में मतदाता सूची में कोई सुधार करना था, तो यह लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद और पूरे देश में समान रूप से किया जा सकता था। सिर्फ बिहार को क्यों ‘टारगेट’ किया गया?
जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 मतदाता सूची में नामों को शामिल करने और हटाने के लिए स्पष्ट प्रक्रिया निर्धारित करता है। यह सांप्रदायिक या अटकलबाजी के आधार पर ‘विशेष’ संशोधनों को अधिकृत नहीं करता है। इस अभ्यास के पीछे कोई वैज्ञानिक या तार्किक आधार नहीं दिया गया है। इसके बजाय, ‘अवैध मतदाताओं’ और ‘सीमा पार से घुसपैठ’ के अस्पष्ट व निराधार दावे किए गए हैं। अगर इन दावों में रत्ती भर का भी सच है, तो क्या चुनाव आयोग ने गृह मंत्रालय की इस मामले में अक्षमता और असफलता पर कोई सवाल उठाया है?
बिहार वोटर लिस्ट रिवीजन: कोई कन्फ्यूजन है तो 16 सवालों पर आयोग का जवाब पढ़ लें, बच जाएगा नाम
महाराष्ट्र में 2024 और दिल्ली में 2025 के विधानसभा चुनाव से पहले दक्षिणपंथी टिप्पणीकारों और शिक्षाविदों ने ‘अवैध मतदाताओं’ के बारे में निराधार चिंता जताते हुए संदिग्ध ‘अध्ययन’ किए। कोई आधिकारिक डाटा इन दावों का समर्थन नहीं करता। ‘अवैध प्रवासियों’ या ‘फर्जी मतदाताओं’ के नाम पर भय फैलाना कभी वैचारिक स्थिति हुआ करती थी- अब यह संस्थागत रूप से वंचित करने का एक साधन बन गया है। इस ‘फ्रेमिंग’ का उपयोग मतदाता सूचियों के आक्रामक व अपारदर्शी संशोधनों को सही ठहराने के लिए किया जाता है, जो असंगत रूप से मुस्लिम, दलित व गरीब प्रवासी समुदायों के मतदाताओं को अपना शिकार बनाते हैं।
डॉग व्हिसल राजनीति (विशिष्ट समूहों को लक्षित करने की रणनीति) से आधिकारिक कार्रवाई में बदलाव- खासकर चुनाव आयोग जैसी सांविधानिक संस्था द्वारा- हमारे जनतंत्र में एक खतरनाक मोड़ है। पैटर्न स्पष्ट है : मतदाता सूचियों में हेर-फेर करके व्यवस्थित रूप से दलितों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों व गरीबों को बाहर रखना। अर्थशास्त्री अबुसालेह शरीफ द्वारा कर्नाटक में किए गए मतदाता सूची ऑडिट में पता चला कि लगभग 20 प्रतिशत वयस्क मुस्लिम मतदाता सूची से गायब थे। यह व्यवस्थागत बहिष्कार है।
वोटर लिस्ट से नाम कटा तो मुफ्त राशन और पेंशन नहीं मिलेगी, रिवीजन पर भड़के तेजस्वी यादव
ऐसा लगता है, राज्य मतदाता आधार को आकार देने के लिए नौकरशाही के औजारों का इस्तेमाल कर रहा है। लोकतंत्र न सिर्फ पिछड़ रहा है, बल्कि धीरे-धीरे खत्म भी हो रहा है। सत्ता के इस दुरुपयोग को बिना चुनौती के आगे बढ़ने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। चुनाव आयोग का आदेश है कि बिहार की संपूर्ण मतदाता सूची रद्द करते हुए प्रत्येक नागरिक को नए सिरे से आवेदन देना होगा। बिहार में आठ करोड़ योग्य मतदाताओं में से 59 प्रतिशत 40 वर्ष या उससे कम आयु के हैं। इसका अर्थ है, लगभग चार करोड़, 76 लाख लोगों को 31 दिनों में अपनी नागरिकता सिद्ध करनी होगी।
इन लोगों को तीन समूहों में बांटा जा सकता है- 19 लाख लोगों को अपनी नागरिकता के दस्तावेज देने होंगे, चार करोड़ से कुछ अधिक लोगों को अपने माता-पिता की नागरिकता के दस्तावेज और 50 लाख से अधिक युवाओं को अपने माता-पिता के नागरिकता संबंधी प्रमाणपत्र प्रस्तुत करने होंगे। चुनाव आयोग द्वारा मान्य 11 दस्तावेजों की वास्तविक स्थिति चौंकाने वाली है। स्वयं भारत सरकार के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे (एनएफएचएस)-3 के अनुसार, 2001 से 2005 में जन्मे बच्चों में से केवल 2.8 प्रतिशत के पास जन्म प्रमाणपत्र था। एनएफएचएस-2 के मुताबिक, आज 40-60 वर्ष के पुरुषों में से केवल 10-13 फीसदी ने हाईस्कूल की पढ़ाई पूरी की है।
बिहार के 20 प्रतिशत प्रवासी वोटर भी निशाने पर; चुनाव आयोग से मिलकर राजद, कांग्रेस और लेफ्ट का दावा
वहीं मानव विकास सर्वे के अनुसार, अनुसूचित जातियों के लगभग 20 प्रतिशत और अन्य पिछड़े वर्ग के करीब 25 फीसदी लोगों के पास ही जाति प्रमाणपत्र था। स्पष्ट है, अधिकांश लोगों के पास ऐसा कोई दस्तावेज नहीं है, जिससे उनकी जन्मतिथि और जन्म-स्थान सिद्ध हो सके। आधार कार्ड और मनरेगा कार्ड जैसे आम दस्तावेजों को वैध नहीं माना जा रहा है। एक तरफ, आधार कार्ड को वोटर लिस्ट से जोड़ने की कवायद हो रही है, वहीं इस पुनरीक्षण में आधार कार्ड को मान्य दस्तावेज नहीं माना जा रहा।
ये तमाम शर्तें असम में बदनाम राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) के सर्वेक्षण से अजीब समानता रखती हैं। असम जैसे डिटेंशन सेंटर, दिल्ली में घरों पर बुलडोजर और महाराष्ट्र से प्रवासी मजदूरों को बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के देश की सीमा के पार अनजान देश में धकेल देने जैसे घिनौने कृत्यों को अब बिहार में भी अंजाम देने के मनसूबे बनाए जा रहे हैं। 22 वर्षों बाद ऐसे अभूतपूर्व निर्णय के पीछे का राजनीतिक मकसद साफ दिखाई दे रहा है।
मिस्टर इंडिया न बनें... एक महीने में कैसे होगा वोटर वेरिफिकेशन? तेजस्वी ने पूछे चुनाव आयोग से सवाल
सबसे गंभीर बात। पिछली बार विशेष गहन पुनरीक्षण में लगभग दो साल का समय लगा था, अब मात्र एक महीने में इसे पूरा करने का दावा किया जा रहा है। यह न केवल अव्यावहारिक है, बल्कि इस पूरी प्रक्रिया की गंभीरता पर सवाल खड़े करता है। मानसून के दौरान यह कवायद और भी कठिन है, क्योंकि बिहार का 73 फीसदी क्षेत्रफल बाढ़ प्रभावित है। ऐसी स्थिति में सरकारी कर्मचारी और लोग बाढ़ से जान-माल की रक्षा में व्यस्त होंगे, न कि दस्तावेजों के सत्यापन में। भारत सरकार के अनुसार, बिहार के 2 करोड़, 90 लाख पंजीकृत मजदूर राज्य से बाहर कार्यरत हैं। इन प्रवासी मजदूरों के लिए दस्तावेज प्रस्तुत करना और भी कठिन होगा।
इसलिए विशेष पुनरीक्षण प्रक्रिया को लेकर हमारी मुख्य मांगें हैं- सभी फॉर्मों व दस्तावेजीकरण आवश्यकताओं की वैधता की समीक्षा की जाए। उन निवार्चन क्षेत्रों में स्वतंत्र ऑडिट कराए जाएं, जहां बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम काटे या जोड़े गए हैं। साथ ही जोड़े या हटाए गए मतदाताओं के ब्योरे भी जारी किए जाएं। किसी चुनाव की वैधता वोट डाले जाने से पहले ही शुरू हो जाती है। यदि लोकतंत्र के रूप में भारत की प्रतिष्ठा को बचाए रखना है, तो भाजपा के रुख का बचाव करने के बजाय चुनाव आयोग को अपनी इस कवायद का औचित्य साबित करना होगा।




साइन इन