घोर कलयुग : सोनू ने राज खोला नहीं तो गांव तो खामोशी से नरसंहार को दबा दिया था
-विश्वास नहीं होता है ऐसा भी होता है अंधविश्वास पूर्णिया, धीरज। विश्वास नहीं होता है ऐसा होता है अंधविश्वास। वाकई घोर कलयुग है। तभी तो अंधविश्वास की

विश्वास नहीं होता है ऐसा होता है अंधविश्वास। वाकई घोर कलयुग है। तभी तो अंधविश्वास की आग में सीता समेत परिवार के पांच लोग जिंदा जला दिए गए। अगर एकमात्र चश्मदीद सोनू ने राज खोला नहीं तो गांव तो खामोशी से इस नरसंहार को दबा ही दिया था। जब गांव के ही लोगों ने एक साथ मिलकर परिवार वालों पर धावा बोला तो सोनू रात के अंधेरे में टेटगामा से भाग कर अपने ननिहाल बीरपुर गेगमपुर गांव पहुंचा। पीड़ित परिवार का जीवित सदस्य 16 वर्षीय सोनू कुमार इस घटना का चश्मदीद है। उसने पुलिस को बताया कि रविवार की रात करीब 40-50 ग्रामीणों की भीड़ ने उसके घर पर हमला बोला।
पहले परिवार के सभी सदस्यों को लाठी-डंडों से बेरहमी से पीटा गया। फिर सभी को एक जगह खड़ा कर पेट्रोल छिड़क कर आग के हवाले कर दिया गया। सोनू ने जान बचाने के लिए पास की झाड़ियों में छिपकर यह वीभत्स मंजर अपनी आंखों से देखा। घटना के बाद वह ननिहाल पहुंचा। सुबह पुलिस को सूचना दी गयी। इधर, गांव वालों ने रात में परिवार के पांच लोगों को आगे के हवाले कर उसके शव को ठिकाना भी लगा दिया। सोनू नहीं बचता को इस वाकया की जानकारी भी नहीं मिल पाती। रात में घटना के बाद से ही लोग अपने घर छोड़कर भागने लगे। बताया जा रहा है कि गांव में अधिकांश पुरुष फरार हो चुके हैं। कुछ महिलाएं भी अपने बच्चों को लेकर गांव छोड़कर निकल गई हैं। कुछ-कुछ घरों में बुजुर्ग महिला व पुरुष सिर्फ घर की रखवाली के लिए रह गयी हैं। सोमवार को घटना के बाद से टेटगामा गांव देश भर में चर्चा में आ गया। पूर्णिया शहर से बमुश्किल 12 किलोमीटर की दूरी पर इस गांव में जो घटना हुई वह दिल दहला देने वाली है। घटना के बाद से टेटगामा गांव पुलिस छावनी में तब्दील हो चुका है। डीआईजी प्रमोद प्रमंडल, जिलाधिकारी अंशुल कुमार, एसपी स्वीटी सहरावत के अलावा क्षेत्र के विधायक विजय खेमका भी गांव पहुंचे। ------ -पिछड़ा है सीमांचल, ओझा गुनी के भरोसे होता है इलाज : -सीमांचल का इलाका पिछड़ा माना जाता है। स्वास्थ्य सुविधा अपग्रेड होने के बावजूद अभी भी ग्रामीण परिवेश के लोग झाड़-फूंक और ओझा-गुनी के भरोसे अपनी बीमारियों का इलाज करवाते हैं। जब इलाज से राहत नहीं मिलती तो ‘डायन का आरोप लगाकर निर्दोषों को निशाना बना दिया जाता है। रजीगंज पंचायत के वार्ड 10 टेटगामा गांव आदिवासी बाहुबल है। आदिवासी परिवार 50 से 60 परिवार रहते हैं। यहां जनसंख्या लगभग तीन सौ के करीब है। इस गांव के सभी लोग मजदूरी कर जीवन यापन करते है। गांव में दो दिन पहले एक बच्चे की मौत हो गयी थी। इसके बाद भड़के अंधविश्वासी लोगों ने एक परिवार को खत्म कर दिया। -डायन प्रताड़ना कानून और सामाजिक सोच पर सवाल: -बिहार में डायन प्रताड़ना निवारण अधिनियम 1999 लागू है, जिसके तहत किसी महिला को डायन कहकर प्रताड़ित करना, अपमानित करना या उसकी हत्या करना गंभीर अपराध है। बावजूद इसके, राज्य के आदिवासी और पिछड़े इलाकों में आज भी इस कुप्रथा की जड़ें गहरी हैं। पूर्णिया की यह घटना सिर्फ अपराध नहीं, एक सामाजिक त्रासदी है। यह सवाल उठाती है कि 21वीं सदी में भी हम अंधविश्वास के खिलाफ कितने असहाय हैं। जब तक समाज में शिक्षा, वैज्ञानिक सोच और प्रशासनिक जिम्मेदारी की मजबूत नींव नहीं होगी, तब तक निर्दोष यूं ही अंधविश्वास की भेंट चढ़ते रहेंगे।
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