प्रशांत किशोर के लिए चिराग छोड़ सब खराब, क्या जन सुराज और पासवान का बनेगा पकवान?
प्रशांत किशोर के लिए चिराग पासवान को छोड़ सारे नेता खराब हैं। पीके कहते हैं कि चिराग ‘नया लड़का’ है जो ‘जात-पात’ की बात नहीं करता। बाकी मोदी हों या नीतीश, लालू-तेजस्वी हों या सम्राट, वो सबकी खराबी गिनाते हैं। एनडीए कैंप में इससे बेचैनी है।

लोक जनशक्ति पार्टी- रामविलास (एलजेपी-आर) के सुप्रीमो और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान इस समय बिहार की राजनीति के हॉट केक हैं। नीतीश कुमार के बाद कौन सवाल का जवाब बनने की कोशिश में जुटे चिराग को लेकर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) कैंप में बेचैनी है। जन सुराज पार्टी के नेता प्रशांत किशोर चिराग की तारीफ कर बेचैनी और बढ़ा रहे हैं। प्रशांत नरेंद्र मोदी, नीतीश कुमार, लालू यादव और तेजस्वी यादव की खराबी गिनाते हैं, लेकिन चिराग को ‘नया लड़का’ बताते हैं जो ‘जात-पात’ की बात नहीं करता। राजनीतिक विश्लेषक परेशान हैं कि चिराग ‘बिहार आने से रोकने’ से भड़के तो क्या प्रशांत और पासवान मिलकर ‘पकवान’ बना सकते हैं।
चिराग और प्रशांत एक-दूसरे को मित्र बताते हैं और कुछ भी बुरा बोलने से बचते हैं। प्रशांत ने तो यहां तक कहा है कि बिहार की राजनीति में चिराग का आना बिहार के लिए अच्छी बात है। बिहार को अगले 20-25 साल की राजनीति के लिए युवा नेतृत्व की जरूरत है। प्रशांत किसी से गठबंधन नहीं करने और 243 सीट लड़ने की बात कर रहे हैं। लेकिन लाइव हिन्दुस्तान ने पीके से इंटरव्यू में चिराग से गठबंधन पर पूछा था तो उन्होंने कहा था कि जब तक चिराग भाजपा के साथ हैं, राजनीतिक सरोकार नहीं हो सकता। माने-मतलब निकालें तो चिराग एनडीए छोड़ दें तो दोनों का सरोकार बन सकता है, गठबंधन हो सकता है।
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चिराग भी प्रशांत को मित्र बताते हैं और उनकी तारीफ करते हैं। चिराग कहते हैं कि प्रशांत के पास विजन है, वो नई राजनीति कर रहे हैं, जाति की राजनीति नहीं कर रहे हैं। चिराग ने कहा है कि वो प्रशांत को लेकर अच्छी सोच, अच्छी भावना रखते हैं। लेकिन दोनों के भाषण और उनके मुद्दों को देखें तो प्रशांत और चिराग एक जैसी बातें कर रहे हैं। जाति और धर्म की राजनीति को राज्य के पिछड़ेपन का कारण बताते हैं। प्रशांत सलाह दे रहे हैं कि चिराग इस्तीफा देकर चुनाव लड़ें तो जनता ज्यादा गंभीरता से लेगी। दो नाव पर पांव नहीं रखना चाहिए।
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चिराग की महत्वाकांक्षा खुलकर सामने आने से नीतीश कुमार असहज हैं और जीतनराम मांझी लगातार उन पर गोले दाग रहे हैं। चिराग और मांझी के बीच चल रही लड़ाई से एनडीए के लोग परेशान हैं कि ये झगड़ा कहां जाकर रुकेगा। जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) में चिराग को लेकर जो बेचैनी है, वो पीएम मोदी की सीवान रैली में सामने आ चुकी है। चिराग के बहनोई व सांसद अरुण भारती ने बताया था कि सीवान में नीतीश ने चिराग से पूछा था कि क्या वो बिहार लड़ना चाहते हैं, कहां से लड़ना चाहते हैं। नीतीश ने कहा था कि चिराग केंद्रीय मंत्री हैं, उन्हें बिहार में लड़ने की क्या जरूरत है।
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चिराग ने नीतीश को जवाब में पार्टी के अंदर चल रही चर्चा का हवाला देकर कहा था कि अगर उनके लड़ने का फैसला होता है तो वो नीतीश का आशीर्वाद लेने जरूर आएंगे। चिराग ने कुछ समय पहले कहा था कि बिहार में सीएम पद की वैकेंसी नहीं है और चुनाव के बाद पीएम मोदी के विजन के तहत नीतीश के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनेगी। उस बयान के बाद लोजपा-आर या चिराग की रफ्तार में कोई कमी नहीं आई है, बल्कि दोनों की स्पीड बढ़ रही है।
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चुनावी गठबंधन की राजनीति के दौर में लगभग 6 परसेंट दलित वोट के मूवमेंट की गारंटी रहे रामविलास पासवान के बेटे चिराग के बिहार प्लान को धीरे-धीरे सांसद अरुण भारती बढ़ा रहे हैं। अरुण ने एक सर्वे के हवाले से इशारा किया है कि वो शाहाबाद इलाके की किसी सामान्य सीट से लड़ सकते हैं। सामान्य सीट इसलिए कि साबित किया जा सके कि चिराग दलित नेता नहीं, सर्वमान्य नेता हैं।
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बिहार एनडीए में भाजपा के साथ नीतीश की जेडीयू, चिराग की लोजपा-आर, जीतनराम मांझी की हम और उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक मोर्चा शामिल है। सीट बंटवारे की बात करें तो ये चर्चा है कि बीजेपी और जेडीयू 100-100 सीट से नीचे जाने को तैयार नहीं हैं। जेडीयू बीजेपी से कम से कम एक सीट ज्यादा ही लड़ना चाहती है। चिराग, मांझी और कुशवाहा को 42-43 सीट में संतुष्ट करना मुश्किल है। 2020 की तरह मुकेश सहनी आखिरी मौके पर पलटे तो वो भी हैं। चिराग जिस जोश से बिहार में घूम रहे हैं, 243 सीट की बात कर रहे हैं, लोजपा जिस आक्रामक भाषा में बातें रख रही है, उसके हिसाब से सम्मानजनक समझौता नहीं होने पर चिराग एनडीए से बाहर ना आएं या ‘मित्र’ से गठबंधन ना करें, इसकी गारंटी कौन देगा?




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