शहर की साहित्यिक संस्कृति को चाहिए सहयोग व समर्पण का साथ
मुजफ्फरपुर में महिला साहित्यकारों ने साहित्य के क्षेत्र में संघर्ष करने की आवश्यकता पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि उन्हें उचित मंच और सहयोग की आवश्यकता है ताकि वे अपनी रचनाओं को ऊंचाइयों तक पहुंचा सकें।

मुजफ्फरपुर। आप चाहें तो अपने पुस्तकालयों में ताले जड़ दें, लेकिन मेरे मस्तिष्क की स्वतंत्रता पर पाबंदी लगाने के लिए न कोई दरवाजा है, न ताला और न ही कोई कुंडी। लेखिका वर्जीनिया वुल्फ का यह विचार महिला साहित्यकारों पर आज भी सटीक बैठती है। सत्य है कि महिलाओं की भागीदारी सरकारी, गैर सरकारी नौकरियों और व्यवसायों में निश्चित रूप से बढ़ी है, लेकिन साहित्य के क्षेत्र में अभी भी महिलाओं को लंबी और कठिन लड़ाई लड़नी है। रचनाओं के प्रकाशन में महिलाएं अब भी काफी पीछे हैं। महिला लेखिकाओं के संघर्ष कई स्तर पर हैं। मंच मिलने से लेकर प्रकाशन की समस्या तक से जूझती महिला साहित्यकारों ने जिला प्रशासन व सरकार से सहयोग की अपील की है। कहा कि जिला प्रशासन के आयोजनों में उन्हें साझा मंच और मौका मिले तो वे अपनी रचनाओं को ऊंचाइयों तक पहुंचा सकती हैं।
महिला साहित्यकारों की पहचान
जिले की कई महिला साहित्यकार आज देश ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना चुकी हैं। अनामिका, गीताश्री जैसे बड़े नाम अपने अनूठे लेखन की वजह से महिला साहित्यकारों की पथ प्रदर्शक हैं। इसके बावजूद अपनी रचनाशीलता के बल पर आगे बढ़ने में जिले की महिला साहित्यकारों को अनेक बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है।
लेखन की चुनौतियां
समाज ने महिलाओं को लेखन की न्यूनतम सुविधा प्रदान की है। ऐसी संरचनाएं एवं परिस्थितियां निर्मित की गई हैं, जिनमें महिलाओं के लिए लेखन एक चुनौतीपूर्ण कार्य बन जाता है। वर्जीनिया वुल्फ अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘रूम ऑफ वनस ओन’ में दलील पेश करती हैं कि महिला द्वारा कुछ भी लिखने के लिए अति आवश्यक है ‘पैसा और अपना कमरा’ होना। यह शहर की महिला साहित्यकार भी मानती हैं। महिला लेखिकाओं ने कहा कि जब हमसे पूछा जाता है कि आप क्या करती हैं और हमारा जवाब होता है ‘लेखन’। इस पर कहा जाता है कि लिखती हो, यह तो ठीक है, लेकिन काम क्या करती हो। महिलाएं कहती हैं कि जब आपके पास पैसा होगा तो आप बिना आजीविका की चिंता किए निश्चिंत होकर लंबे समय तक लिख सकती हैं। वहीं, दूसरी तरफ अपना कमरा होना इसलिए आवश्यक है, ताकि महिलाएं चिंतन कर नए विचारों को संग्रहित कर रचनात्मक लेखन को रूप दें सके।
गोष्ठी व लेखन के लिए जगह की कमी
महिला साहित्यकारों ने कहा कि घर तो छोड़िए इस सांस्कतिक नगरी में ऐसा कोई कोना नहीं है जहां वे एक जगह इकठ्ठा होकर गोष्ठी और लेखन कर सकें। एक-दो जगह है जहां कवि व साहित्यकारों की गोष्ठी होती है, लेकिन उसमें महिलाओं को कम जगह ही मिल पाती है। महिला साहित्यकारों ने कहा कि साहित्य को पुरुष और महिला में नहीं बांटा जा सकता, लेकिन जब एक महिला लेखन के लिए निकलती है तो उसका संघर्ष और बढ़ जाता है। ऐसे में उनकी मांग है कि उन्हें एक उचित स्थान उपलब्ध कराया जाए, जहां वे एक-दूसरे की रचनाओं को सुन और गुन सकें।
चुनौतियों का सामना
डॉ. भावना, डॉ. पूनम सिन्हा कहती हैं कि हिंदी साहित्य में शुरुआत से ही महिलाओं को चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। इस्मत चुगताई का उदाहरण लें तो उनकी लिखी ‘लिहाफ’ कहानी को अश्लीलता के आरोपों का सामना करना पड़ा और उन्हें अदालतों में अपने लेखन का बचाव करना पड़ा। हिंदी लेखिका महादेवी वर्मा को भी अपनी लेखनी के शुरुआती दौर में इसी संघर्ष का सामना किया। जब महिला कुछ बेहद सृजनात्मक विषयों पर लिखती है तो उसे उनके व्यक्तिगत अनुभवों से जोड़ दिया जाता है और मान लिया जाता है कि ये उनकी आपबीती है। जब हम मंच पर कविता सुनाती हैं तो उसे भी आपबीती से जोड़ दिया जाता है।
प्रकाशन की समस्याएं
चांदनी समर, सविता राज ने कहा कि महिला साहित्य में महिलाओं को हाशिए पर रखने का एक और तरीका है, उनकी रचनाओं को प्रकाशन में जगह न देना। जब भी साहित्य लेखन पर चर्चा होती है तो कुछेक पुरुष लेखकों के नाम सामने आते हैं और उन्हीं के लेखन को प्रकाशन में अधिक वरीयता तथा बिक्री में लोकप्रियता मिलती है। साल 2021 में न्यूजलॉन्ड्री ने यूएन वुमन और हयात (अमेरिकी बहुराष्ट्रीय हॉस्पिटैलिटी कम्पनी) के साथ मिल कर ‘जेंडर रिप्रेजेंटेशन इन इंडियन न्यूजरूम’ नामक रिपोर्ट प्रकाशित की। इस रिपोर्ट में प्रिंट मीडिया में छपे 21988 लेखों के विश्लेषण में पाया गया कि इनमें 75 फीसदी लेख पुरुषों द्वारा लिखे गए थे। आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2023 में यूके की टॉप 10 बेस्ट सेलिंग महिला लेखकों के कुल बिकने वाले साहित्य का केवल 19 फीसदी हिस्सा ही पुरुषों द्वारा खरीदा गया है। वहीं, टॉप 10 बेस्ट सेलिंग पुरुष लेखकों की किताबों को खरीदने में महिलाओं की भागीदारी 45 फीसदी है।
गोष्ठियों में महिलाओं की भागीदारी
डॉ. मीनाक्षी मीनल व डॉ. सुमन मेहरोत्रा कहती हैं कि मुजफ्फरपुर जैसी ऐतिहासिक साहित्यिक भूमि पर आज महिला साहित्यकारों को सृजन के क्षेत्र में अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। स्थानीय स्तर पर प्रकाशकों और साहित्यिक पत्रिकाओं के अभाव ने नई लेखिकाओं के लिए अवसर सीमित कर दिए हैं। महिलाओं के लिए स्वतंत्र और नियमित साहित्यिक मंचों की कमी भी उनकी रचनात्मक अभिव्यक्ति में बाधा बन रही है। यही नहीं पारिवारिक जिम्मेदारी, जिक रूढ़िवादिता के कारण कई प्रतिभाएं खुलकर सामने नहीं आ पातीं। आर्थिक निर्भरता के चलते स्वयं पुस्तक प्रकाशित कराना हर महिला के लिए संभव नहीं हो पाता है। हालांकि, बिहार सरकार की ओर से राजभाषा पाण्डुलिपि पुरस्कार योजनाएं मौजूद हैं, लेकिन उनका दायरा अभी सीमित है। सुरक्षा और सामाजिक संकोच के कारण साहित्यिक गोष्ठियों में महिलाओं की भागीदारी भी कम ही रहती है। इसके बावजूद शहर की महिला साहित्यकार निरंतर लेखन के माध्यम से राष्ट्रीय स्तर अपनी पहचान बना चुकी हैं और कुछ बनाने के लिए प्रयासरत हैं। जरूरत इस बात की है कि समाज, प्रशासन और साहित्यिक संस्थाएं मिलकर उन्हें बेहतर मंच और सहयोग उपलब्ध कराएं। यदि अनुकूल वातावरण मिले तो जिले की साहित्यिक परंपरा में महिला रचनाकार नई ऊर्जा भर सकती हैं।
मंच की स्थापना का सुझाव
डॉ. उषा किरण खान ने जिस तरह आयाम संस्था का गठन कर पटना में महिलाओं के लिए एक ऐसा मंच तैयार किया जहां उन्हें पूर्ण अभिव्यक्ति का अधिकार है, जिले में भी एक ऐसे ही मंच का गठन होना चाहिए। ऐसे मंच पर वैसी महिलाओं को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए जो कुछ भी लिखना चाहती हों। यही नहीं, ऐसी गोष्ठियां विभिन्न मंचों पर आयोजित की जाएं, जिसमें उनकी भागीदारी सुनिश्चित की जाए और उनके अंदर की कुंठा को बाहर निकाला जाए। सबसे अधिक आवश्यक है स्थानीय स्तर पर एक पत्रिका निकाली जाए, जिसमें महिला रचनाकारों को विशेष रूप से आगे की पंक्ति में रखा जाए।
जिम्मेदार की प्रतिक्रिया
कला संस्कृति विभाग की ओर से होने वाले आयोजनों में महिला साहित्यकारों को बुलाया जाएगा। अधिक से अधिक महिला साहित्यकारों की सहभागिता हो, इसके लिए एक सूची बनाई जाएगी। साथ ही पहल की जाएगी कि इनके लिए कार्यशाला हो। महिला साहित्यकारों के सुझाव को प्रस्ताव बनाकर विभाग को भी भेजा जाएगा।
-सुष्मिता झा, जिला कला संस्कृति अधिकारी
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