आठ दशक से अनदेखी का दंश झेल रहे गोसदन को उद्घाटन का इंतजार
मधुबनी जिले के नंद नगर नारी गोसदन की स्थापना 85 वर्ष पूर्व हुई थी, जो दिव्यांग और बेसहारा गायों के लिए आश्रय स्थल था। लेकिन प्रशासनिक लापरवाही के कारण यह गोसदन अब मदद का मोहताज है। यहां केवल 85 गायें बची हैं और विकास के लिए कोई ठोस योजना नहीं बन पा रही है।

मधुबनी । मधुबनी जिले के लौकही प्रखंड मुख्यालय से महज तीन किलोमीटर की दूरी पर स्थित नंद नगर नारी गोसदन उपेक्षा का शिकार है। भारत-नेपाल सीमा पर अवस्थित यह गोसदन कभी पूरे क्षेत्र की समृद्धि और सेवा भावना का केंद्र हुआ करता था। लेकिन स्थापना के 85 वर्ष बीत जाने के बाद भी इसका विकास नहीं हो सका है। दिव्यांग और बेसहारा गायों के लिए बना यह जिले का एकमात्र आश्रय स्थल आज स्वयं ही मदद का मोहताज हो गया है। इस गोसदन की स्थापना लगभग 85 वर्ष पूर्व एक महान संत के द्वारा की गई थी। उस समय इसका उद्देश्य उन बेसहारा, कमजोर और विकलांग गायों को संरक्षण देना था।
जिन्हें समाज अक्सर त्याग देता है। सीमावर्ती क्षेत्र होने के कारण न केवल स्थानीय, बल्कि पड़ोसी राष्ट्र नेपाल के लोग भी अपनी गौवंश की सेवा के लिए यहां गायों को समर्पित कर देते थे। स्थापना के समय इसके पास 231 एकड़ का विशाल भू-भाग था। कर्मचारियों की फौज और गायों की भारी संख्या से यह परिसर हमेशा गुलजार रहता था। यहां गोबर से बायोगैस बनाकर बिजली पैदा की जाती थी, जो उस समय के हिसाब से क्रांतिकारी कदम था। वक्त के थपेड़ों और प्रशासनिक उदासीनता ने इस समृद्ध संस्थान को हाशिये पर धकेल दिया है। वर्तमान में यहां केवल 85 गायें हैं। पूर्व में स्थापित बायोगैस प्लांट अब कबाड़ बन चुका है। भूमि के मोर्चे पर भी संस्थान को बड़ा नुकसान हुआ है। इसकी 111 एकड़ जमीन सीलिंग में चली गई, जबकि कुछ हिस्सा एसएसबी कैंप के लिए आवंटित कर दिया गया। फिलहाल गोसदन के पास 120 एकड़ भूमि बची है। इसमें से मात्र 10-11 एकड़ ही कृषि योग्य है। शेष भूमि बंजर और अनुपयोगी पड़ी है। करीब दो दशक पूर्व इस बंजर भूमि पर डेयरी सह प्रशिक्षण केंद्र खोलने की महत्वाकांक्षी योजना बनी थी। जिला प्रशासन के अधिकारियों ने ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों के साथ लंबी बैठकें की थीं। लोगों को उम्मीद थी कि इससे क्षेत्र का कायाकल्प होगा लेकिन यह योजना आज भी फाइलों में कैद है। यही हाल झंझारपुर के सांसद रामप्रीत मंडल की पहल पर शुरू हुई आधुनिकीकरण योजना का भी है। स्पाइडर इन्फोसिस्टम नामक संस्था को गायों के लिए आधुनिक शेड और मौसम अनुकूल कमरे बनाने का जिम्मा दिया गया था, लेकिन वह कार्य भी आज तक अधूरा ही है। महोत्सव की चमक और उसके बाद का सन्नाटाहर साल गोपाष्टमी के अवसर पर यहां दो दिवसीय भव्य महोत्सव और दंगल प्रतियोगिता का आयोजन होता है। दिल्ली, पंजाब, हरियाणा और नेपाल तक के पहलवान यहां अपनी कला का प्रदर्शन करने आते हैं। इस दौरान बड़े-बड़े जनप्रतिनिधि मंच से गोसदन के विकास के संकल्प दोहराते हैं, लेकिन उत्सव समाप्त होते ही ये वादे भी हवा हो जाते हैं।भविष्य की संभावनाएं और आवश्यकतानंद नगर नारी गोसदन केवल एक धार्मिक या सेवा संस्थान नहीं, बल्कि इस इलाके की ऐतिहासिक धरोहर है। यदि यहाँ की अनुपयोगी भूमि पर कोई उद्योग या डेयरी प्रोजेक्ट शुरू किया जाए, तो यह न केवल गोसदन को आत्मनिर्भर बनाएगा, बल्कि स्थानीय युवाओं को रोजगार देकर पलायन रोकने में भी मददगार साबित होगा। आज यह संस्थान अपने किसी ऐसे उद्धारक की प्रतीक्षा कर रहा है जो घोषणाओं से आगे बढ़कर धरातल पर काम कर सके। अतीत के आइने में समृद्ध गोसदन के विकास के लिए इलाके के लोग लालायित है। सभी यह सपना देख रहे है कि यह इस इलाके का धरोहर है। इसे संरक्षित करने की आवश्यकता है। लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा है। यहां जितनी जमीनें है,यदि इसे उपयोगी बनाकर कोई उधोग धंधे लगा दी जाएगी, तो न केवल गोसदन का विकास होगा, बल्कि बड़ी संख्या में रोजगार उपलब्ध होगा। मजदूरों का पलायन रुकेगा और बेरोजगारी दूर होगा। लेकिन अब तक इसके विकास के लिए कोई ठोस योजना नहीं बन पा रही है। गोसदन के आधुनिकरण हेतु एक योजना स्वीकृत की गई थी। इसे बनाने का जिम्मा स्पाइडर इन्फोसिस्टम नामक संस्था ने ली थी, लेकिन वह भी अब तक अधूरा पड़ा है। इसमें गायों को सुरक्षित रखने, उसे उसकी आवश्यकता के अनुरूप भोजन पानी देने तथा मौसम के अनुरूप कमरों को बनाने की योजना थी। लेकिन वह भी अब तक अधूरा पड़ा है।
बोले जिम्मेदार- नारी गोसदन अनुमंडल के लौकही प्रखंड में है। यह मेरे संज्ञान में है। इसके लिए कार्य योजना तैयार कराई जाएगी। इसके पास जो भूमि उपलब्ध है। उसकी मापी के लिए अंचलाधिकारी को आदेश दिए गए हैं। इस दिशा में सार्थक पहल की जा रही है। इसे सम्बंधित विभाग के पास सभी रिपोर्ट शीघ्र भेज दिए जाएंगे। आगे से आदेश मिलने पर आवश्यक कार्रवाई की जाएगी। - अनिश कुमार, एसडीओ, फुलपरास।
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