बृज बिहारी शनिवार; छोटन शुक्ला, देवेंद्र दुबे रविवार; वीकेंड पर खून की होली खेलते थे बिहार के डॉन
- बिहार में 90 के दशक में बृज बिहारी प्रसाद और छोटन शुक्ला गैंग के बीच वर्चस्व की लड़ाई में कई बार वीकेंड पर मर्डर से अंडरवर्ल्ड अंदर से हिला।

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने 90 के जिस दशक को बिहार में जंगलराज का नाम दिया, उस दौरान माफियाओं ने खून के बदले खून की रवायत बना दी थी। राजनीति और अंडरवर्ल्ड, दोनों ही जगह एक-एक पांव जमाए बृज बिहारी प्रसाद समेत चार नेताओं की हत्या वीकेंड पर ही हुई और सारे दबंग थे या माफिया थे। पहली हत्या दिग्गज कांग्रेसी नेता एलपी शाही के विधायक बेटे हेमंत शाही की हुई, जिन पर हमला शनिवार को हुआ था। 28 मार्च 1992 को टेंडर के झगड़े में हेमंत पर दूसरे गैंग ने गोलियां बरसा दी थी। मौत दो दिन बाद 30 मार्च को हुई। भूमिहार जाति के हेमंत शाही की दोस्ती उस समय बिहार के सबसे बड़े क्रिमिनल अशोक सम्राट से थी। बिहार में पहला एके 47 लाने वाला अशोक सम्राट बेगूसराय का भूमिहार था। बाकी तीन वीकेंड मर्डर की कहानी पढ़ने से पहले उसके किरदारों को समझ लेते हैं।
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अशोक राय उर्फ सम्राट का तिरहुत और मिथिलांचल इलाके में सरकारी ठेकों पर एकछत्र राज चल रहा था। सम्राट को हेमंत शाही का साथ मिला तो चंदेश्वर सिंह को रघुनाथ पांडे का। ठेकों को लेकर सम्राट का तिरहुत के कौशलेंद्र शुक्ला उर्फ छोटन शुक्ला और चंपारण के चंदेश्वर सिंह से झगड़ा बढ़ रहा था। छोटन शुक्ला भी भूमिहार। मुजफ्फरपुर यूनिवर्सिटी के कैंपस में सम्राट के मित्र मिनी नरेश का दबदबा था। नरेश भी बेगूसराय का भूमिहार था और अशोक सम्राट गैंग का चमकता सितारा था। 1986 में सम्राट ने चंदेश्वर पर हमला किया, लेकिन वो बच गया। मारा गया चंदेश्वर का बेटा, जिसकी शादी का उस दिन तिलक कार्यक्रम था। इसमें मिनी नरेश का भी नाम आया।
तीन साल बाद 1989 में सरस्वती पूजा के दिन यूनिवर्सिटी कैंपस में ही मिनी नरेश की हत्या कर दी गई। इसमें चंदेश्वर और छोटन शुक्ला का भी नाम आया। सम्राट ने चंदेश्वर सिंह को 1990 में सरस्वती पूजा के ही दिन एके 47 से भूनकर बदला लिया। इसके बाद अशोक सम्राट और छोटन शुक्ला गैंग ने एक-दूसरे के लोगों को जहां मौका मिला, मार दिया।
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छोटन शुक्ला का रंगदारी और ठेकों को लेकर बृज बिहारी से भी समानांतर पंगा चल रहा था। मुजफ्फरपुर में ही पढ़ रहे बृज बिहारी और पढ़ाई छोड़ चुके छोटन शुक्ला के झगड़े में शहर इसके और उसके इलाका में बंट गया। एक तरफ बृज बिहारी का गढ़ और दूसरी तरफ छोटन शुक्ला का। दुश्मन का दुश्मन दोस्त की तर्ज पर अशोक सम्राट और बृज बिहारी प्रसाद दोस्त बन गए। दोनों का दुश्मन एक- छोटन शुक्ला।
भूमिहार और राजपूत माफियाओं के बीच एक बनिया डॉन बनकर उभरे बृज बिहारी प्रसाद का कारनामा पटना तक पहुंच चुका था। 1990 के विधानसभा चुनाव में बृज बिहारी जनता दल के टिकट पर आदापुर विधानसभा सीट से पहली बार विधायक बने। बृज बिहारी के विधायक और पार्टी की सरकार बनने के बाद उनके गुर्गों ने तांडव बढ़ा दिया। इसकी राजनीतिक काट के लिए छोटन शुक्ला के मन में भी राजनीति में दिलचस्पी पैदा हुई। लालू यादव के राजनीतिक उभार के दौर में छोटन शुक्ला बिहार पीपुल्स पार्टी से जुड़े, जिसे लालू से अलग होने के बाद आनंद मोहन ने ही शुरू किया था।
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1994 में वैशाली लोकसभा सीट के उपचुनाव में आनंद मोहन की पत्नी लवली आनंद लालू यादव के कैंडिडेट को हराकर जीत गईं। लालू की कैंडिटेट बिहार के पूर्व सीएम सत्येंद्र नारायण सिन्हा की पत्नी किशोरी सिन्हा थीं। लवली की जीत की वजह बनी भूमिहार-राजपूत एकता और चेहरा बने छोटन शुक्ला और आनंद मोहन। इस एकता ने लालू यादव की नींद उड़ा दी। आनंद मोहन खुद कोसी के बड़े माफिया थे, जिनका झगड़ा पप्पू यादव से चल रहा था। आनंद मोहन उस दौर में चर्चित डॉन थे और अगड़ों के बीच लालू से लड़कर जगह बना रहे थे। इसी फैनडम पर आनंद मोहन बिहार पीपुल्स पार्टी बनाकर 1995 का चुनाव लड़े और लड़ाए।
वैशाली में लवली आनंद की जीत में छोटन शुक्ला की मदद से गदगद आनंद मोहन ने छोटन को मोतिहारी जिले की केसरिया विधानसभा सीट से लड़ाने का ऐलान कर दिया, जो भूमिहार जाति के कैंडिडेट के लिए मुफीद सीट मानी जाती थी। छोटन शुक्ला चुनाव प्रचार के लिए केसरिया के चक्कर लगाने लगे। उनके आने-जाने का रूटीन और पैटर्न बन गया, जो अंडरवर्ल्ड में किसी भी डॉन के लिए जानलेवा साबित होता रहा है। छोटन भी अपवाद नहीं बन सके।
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4 दिसंबर 1994 को केसिरया से प्रचार के बाद घर लौट रहे छोटन शुक्ला की मुजफ्फरपुर में हत्या हो गई। दिन था रविवार। वीकेंड पर छोटन शुक्ला की हत्या शहर के उस इलाके में हुई जो बृज बिहारी का एरिया कहा जाता था और उनके घर के पास था। पुलिस ने इस केस को ब्लाइंड बताकर कोर्ट में क्लोजर रिपोर्ट लगा दी। लेकिन छोटन शुक्ला के परिवार को पता था कि इसके पीछे बृज बिहारी प्रसाद हैं।
छोटन शुक्ला की शवयात्रा के दौरान 5 दिसंबर 1994 को मुजफ्फरपुर में गोपालगंज के डीएम जी कृष्णैया की हत्या कर दी गई। इस केस में उम्रकैद काट रहे आनंद मोहन की रिहाई हो गई है। नीतीश कुमार की सरकार द्वारा जेल मैनुअल में बदलाव का फायदा आनंद मोहन समेत 27 कैदियों को मिला। डीएम मर्डर केस में आनंद मोहन के साथ छोटन के भाई अवधेश शुक्ला उर्फ भुटकुन शुक्ला भी आरोपी बनाए गए थे।
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छोटन शुक्ला की हत्या के बाद भुटकुन शुक्ला ने गैंग की कमान संभाल ली। भुटकुन शुक्ला ने छोटन शुक्ला की हत्या में शामिल रहे ओंकार सिंह को 1996 में उसी तरह घेरकर मुजफ्फरपुर में एके 47 से भून दिया। अब उसकी लिस्ट में बृज बिहारी का नाम था। यहां भुटकुन शुक्ला बृज बिहारी को मारने के मौके खोज रहा था और वहां बृज बिहारी ने उसके ही गैंग में अपना आदमी फिट कर दिया। भुटकुन के ही बॉडीगार्ड दीपक सिंह ने 16 जुलाई 1997 को घर में ही पिस्टल साफ कर रहे भुटकुन शुक्ला को भून डाला। कुछ लोगों का कहना है कि दीपक बृज बिहारी का आदमी नहीं था, लेकिन उसने दीपक को पैसे से खरीद लिया।
अशोक सम्राट की शुक्ला गैंग से लड़ाई थी ही। अशोक सम्राट के जिले बेगूसराय में उसके गुरु रतन सिंह का मोकामा के डॉन सूरजभान सिंह के गुरु रामलखन सिंह से झगड़ा था। सूरजभान पर अशोक सम्राट ने एक बार जबर्दस्त हमला किया, जिसमें वो तो बच गए लेकिन उनका दोस्त मनोज सिंह मारा गया, जो बेगूसराय का ही रहने वाला था। सूरजभान और सम्राट की लड़ाई में काफी लोग मारे गए। 1995 में अशोक सम्राट भी मारा गया। पुलिस से भागते हुए वो जिस घर में छिपा था, उसे भीड़ ने जला दिया। दुश्मन का दुश्मन दोस्त के फॉर्मूले से छोटन के बाद भुटकुन और उसके बाद मुन्ना शुक्ला भी सूरजभान के साथ हो लिए।
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भुटकुन शुक्ला के बाद बाद गैंग की कमान आई विजय शुक्ला उर्फ मुन्ना शुक्ला के पास। छोटन शुक्ला की मोतिहारी के चर्चित डॉन देवेंद्र दुबे से दोस्ती थी और देवेंद्र का भी बृज बिहारी प्रसाद से झगड़ा था। बृज बिहारी 1995 में दूसरा चुनाव जीतकर लालू यादव के और करीब पहुंचे और कैबिनेट मंत्री बन गए। देवेंद्र दुबे असम से गिरफ्तार होकर मोतिहारी जेल आ चुका था और जेल में रहते गोविंदगंज सीट से विधायक बन गया। दुबे को नीतीश की समता पार्टी ने टिकट दिया था लेकिन क्रिमिनल को टिकट देने पर विवाद के बाद समर्थन वापस ले लिया था। सिंबल रह गया क्योंकि वापसी का समय निकल चुका था। दुबे ने जीत हासिल कर ली।
बृज बिहारी मंत्री थे तो आयोजनों में आना-जाना पड़ता था, इसलिए वो दुबे और शुक्ला के खौफ से कमांडो के बीच रहने लगे। दुबे और शुक्ला मौके की तलाश में थे, लेकिन सुरक्षा घेरा मजबूत रहने के कारण बृज बिहारी प्रसाद पर हमला नहीं कर पा रहे थे। फिर आया 1998 का लोकसभा चुनाव। लालू यादव ने बृज बिहारी प्रसाद की दबंगई को भुनाने के लिए उनकी पत्नी रमा देवी को आरजेडी से मोतिहारी लड़ा दिया। बीजेपी ने राधा मोहन सिंह टिकट दिया। देवेंद्र दुबे ये सोचकर मोतिहारी से लोकसभा चुनाव में कूद पड़ा कि बृज बिहारी का दबदबा कम करने के लिए सांसद बनना जरूरी है।
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बृज बिहारी समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा और राधा मोहन सिंह से कुछ हजार कम वोट के साथ तीसरे नंबर पर रहा। लेकिन मतदान के ही दिन 22 फरवरी 1998 को देवेंद्र दुबे की हत्या हो गई। दिन था वीकेंड का- रविवार। देवेंद्र दुबे की हत्या बृज बिहारी प्रसाद के संरक्षण में मोतिहारी का दादा बन चुके विनोद सिंह ने की। हमले में राजन तिवारी की जान बच गई, जिसे देवेंद्र दुबे ने एक आदमी को बुलाने उसके घर भेजा और खुद गाड़ी में बैठकर इंतजार कर रहा था। 1998 में गोविंदगंज से देवेंद्र के भाई भूपेंद्र दुबे उप-चुनाव जीते, लेकिन 2000 के चुनाव में राजन तिवारी इसी सीट से निर्दलीय लड़ गए और भूपेंद्र दुबे को हरा दिया।
ओंकार सिंह की हत्या को छोड़ दें तो बृज बिहारी प्रसाद का गैंग सूरजभान और उनके शागिर्द मुन्ना शुक्ला पर भारी चल रहा था। बिहार में तकनीकी शिक्षण संस्थानों में एडमिशन घोटाला का जिन्न सामने आया और उसमें बृज बिहारी की गिरफ्तारी हो गई। बीमारी का बहाना बनाकर बृज बिहारी इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (आईजीआईएमएस) में भर्ती हो गए। सरकार राजद की थी तो कमांडो और निजी सेना के सुरक्षा घेरे में अस्पताल से ही बृज बिहारी दरबार चलाने लगे। बृज बिहारी की लिस्ट में अगला नाम मुन्ना शुक्ला और सूरजभान सिंह का था।
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सूरजभान तब बेऊर जेल में बंद थे। उनको पता चला कि बृज बिहारी ने जेल में ही उनकी हत्या की योजना बनाई है। सूरजभान सिंह के लिए ये जीवन-मरन का प्रश्न हो गया। उन्होंने अपने शूटर श्रीप्रकाश शुक्ला को उत्तर प्रदेश से बुलाया। श्रीप्रकाश ने बृज बिहारी को मारने के लिए रेकी की और एक बार वो पास तक पहुंच गया, लेकिन यह देखकर लौट आया कि मारने के बाद निकलने का उपाय नहीं है। मारना है तो वहीं मरना होगा।
लेकिन श्रीप्रकाश फिदायीन की मौत नहीं मरना चाहता था। श्रीप्रकाश में नाम, ताकत और रुपये की अपार भूख थी। फिर आया 13 जून 1998। दिन शनिवार, एक और वीकेंड। इस दिन बिहार में अंडरवर्ल्ड को हिला देने वाली वो हत्या हुई, जिसने श्रीप्रकाश के नाम का सिक्का जमा दिया। कमांडो और प्राइवेट गार्ड से घिरे बृज बिहारी को श्रीप्रकाश और उसके साथ गए लोगों ने छलनी कर दिया। सुरक्षा में लगे गार्ड कुछ समझ पाते या कर पाते, इसका मौका ही नहीं मिला।
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बृज बिहारी प्रसाद की मौत के कुछ साल बाद रमा देवी भाजपा में आ गईं और तीन बार शिवहर से सांसद बनीं। इस बार बीजेपी ने शिवहर सीट जेडीयू को दे दी। जेडीयू ने शिवहर से छोटन के मित्र रहे आनंद मोहन की पत्नी लवली आनंद को लड़ाया और वो जीत गईं। राजनीति का खेल ये है कि कभी लालू के साथ बृज बिहारी थे और आज तेजस्वी के साथ मुन्ना शुक्ला हैं। रमा देवी और सूरजभान एक साथ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का हिस्सा रहे। सूरजभान सिंह 2000 में जेल से ही मोकामा से निर्दलीय विधानसभा और 2004 में रामविलास पासवान की लोजपा से बलिया से लोकसभा पहुंचे। बाद में मुंगेर से पत्नी वीणा देवी और नवादा से भाई चंदन सिंह को भी लोजपा से सांसद बनाया।
बृज बिहारी की हत्या में सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल मुन्ना शुक्ला को दोषी मानकर जेल भेज दिया था, वहीं सूरजभान सिंह, राजन तिवारी समेत छह को बरी करने के पटना हाईकोर्ट के फैसले पर मुहर लगा दिया था। हाईकोर्ट ने 2014 में सारे आरोपियों को बरी कर दिया था। सीबीआई कोर्ट ने इन सबको 2009 में आजीवन कारावास की सजा दी थी। बृज बिहारी की पत्नी रमा देवी ने तब कहा था कि जो बच गए हैं, अब उनको मां भगवती ही सजा देंगी।




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