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RJD को भाजपा और जदयू से ज्यादा वोट, सीटें कम कैसे हो गईं? समझिए बिहार का चुनावी गणित

चिराग पासवान की एलजेपी (राम विलास) इस बार एनडीए कैंप के साथ रही। 2020 में लोजपा ने NDA को नुकसान पहुंचाया था क्योंकि यह उसके वोटों में कटौती कर रही थी। मगर, इस बार इसके समर्थन ने गठबंधन को मजबूत किया।

Mon, 17 Nov 2025 07:10 AMNiteesh Kumar लाइव हिन्दुस्तान
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RJD को भाजपा और जदयू से ज्यादा वोट, सीटें कम कैसे हो गईं? समझिए बिहार का चुनावी गणित

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजे कई मायने में हैरान करने वाले रहे। तेजस्वी यादव की आरजेडी राज्य में सबसे अधिक वोट शेयर वाली पार्टी निकली, फिर भी इसे 25 सीटों से संतोष करना पड़ा। दूसरी ओर, एनडीए ने सत्ता बनाए रखी और 243 सदस्यीय विधानसभा में 202 सीटें जीत लीं। राजद ने लगभग 23 प्रतिशत वोट शेयर दर्ज किया, जो 2020 के चुनाव से कुछ दशमलव कम है। पिछली बार यह 23.11 प्रतिशत के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी थी और 75 सीटें जीती थीं। मगर, इस बार तकरीबन वही लोकप्रियता केवल 25 सीटों में बदल पाई। सवाल उठता है कि कैसे एक पार्टी सबसे अधिक वोट पाती है, फिर भी इतनी कम सीटों पर समाप्त हो जाती है? चलिए इसका जवाब समझने की कोशिश करते हैं...

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आरजेडी ने इस बार 143 सीटों पर मुकाबला किया, जो सभी दलों में एनडीए और महागठबंधन दोनों में सबसे अधिक है। 2020 के विधानसभा चुनाव में लालू-नेतृत्व वाली पार्टी ने 144 उम्मीदवार उतारे थे। इस बार दूसरों से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने के चलते RJD ने काफी वोट जमा किए, जिससे सबसे अधिक वोट शेयर रहा। हारने वाले उम्मीदवार भी वोट शेयर में जोड़े जाते हैं। भाजपा और जदयू ने 101-101 सीटों पर मुकाबला किया। उन्होंने कम सीटों पर चुनाव लड़ा लेकिन अपने वोटों को जीत में बदल दिया। यही कारण है कि उनकी सीटों की संख्या बढ़ी, भले ही आरजेडी से कम वोट शेयर हो।

NDA को पासवान और कुशवाहा का साथ

चिराग पासवान की एलजेपी (राम विलास) इस बार एनडीए कैंप के साथ रही। 2020 में लोजपा ने NDA को नुकसान पहुंचाया था क्योंकि यह उसके वोटों में कटौती कर रही थी। मगर, इस बार इसके समर्थन ने गठबंधन को मजबूत किया। पिछले चुनाव में LJP एनडीए की सीट-शेयरिंग फॉर्मूला से असंतुष्ट थी। केंद्र में गठबंधन का हिस्सा होने के बावजूद चिराग पासवान ने राज्य में अकेले मुकाबला किया। इसने 134 सीटों पर उम्मीदवार उतारे जिसने एनडीए के आंकड़ों को नुकसान पहुंचाया, खासकर नीतीश कुमार की जदयू को। इसी तरह, उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी ने 2020 में 104 सीटों पर स्वतंत्र रूप से मुकाबला किया, जो एनडीए को फायदा पहुंचाने वाले वोटों में कटौती करती रही। इस बार, एलजेपी और आरएलएम तो एनडीए के साथ रहे। इनके आने से गठबंधन अधिक एकजुट और तैयार दिखा। एकसाथ मतदाताओं को लुभा पाए।

पीके और ओवैसी ने बिगाड़ा समीकरण

आरजेडी और जदयू के उम्मीदवार जिन सीटों पर सीधे मुकाबले में थे, वहां एकतरफा लड़ाई नजर आई। 2020 में राजद इन मुकाबलों पर हावी रही। लेकिन 2025 में नीतीश कुमार की पार्टी ने खेल पलट दिया और 59 में से 50 सीटें जीतीं। JDU का वोट शेयर 2020 के 15.39 प्रतिशत से इस बार 19.25 प्रतिशत तक बढ़ा, जिससे इसने 43 से 85 सीटें जीतीं। भाजपा ने 89 सीटें हासिल की, जो बिहार में उसकी अब तक की सबसे बड़ी सफलता है। प्रशांत किशोर की जनसुराज ने अपना खाता नहीं खोला, लेकिन इसने कम से कम 35 सीटों पर खेला किया। जहां उसका वोट शेयर जीतने वाले मार्जिन से अधिक था, दोनों गठबंधनों पर इसका असर पड़ा। वहीं, AIMIM ने अपनी मजबूत सीमांचल परफॉर्मेंस दोहराई और 1.85 प्रतिशत वोटों के साथ पांच सीटें जीतीं। यह मुस्लिम मतदाताओं की पॉलिटिकल थिंकिंग में शिफ्ट का संकेत है और इसका सबसे ज्यादा नुकसान राजद को हुआ। साफ है कि आरजेडी ने लोकप्रियता भले नहीं खोई, लेकिन पोजिशनल एडवांटेज खो दिया। यह कई वोटर्स के लिए पहली पसंद बनी रही लेकिन फिनिशिंग लाइन को अक्सर क्रॉस नहीं कर पाई।

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