सालासर के बाला जी धाम में हनुमान जी की मूर्ति दाढ़ी-मूंछों वाली क्यों है? जानिए इसके पीछे की कहानी
सालासर बालाजी धाम भारत का एक अनोखा हनुमान मंदिर है। यहां विराजमान हनुमान जी की मूर्ति दाढ़ी-मूंछों वाली है, जो पूरे देश में एकमात्र है। आइए जानते हैं इस अनोखे मंदिर की विशेषता और दाढ़ी-मूंछ वाली मूर्ति के पीछे की रोचक कहानी।

राजस्थान के चुरू जिले में स्थित सालासर बालाजी धाम हनुमान जी का एक अत्यंत प्रसिद्ध और शक्तिशाली तीर्थ स्थल है। यह मंदिर पूरे भारत में अपनी अनोखी मूर्ति के लिए जाना जाता है। यहां विराजमान हनुमान जी की मूर्ति दाढ़ी-मूंछों वाली है, जो अन्य किसी भी हनुमान मंदिर में नहीं देखी जाती। लाखों भक्त हर साल यहां दर्शन करने आते हैं क्योंकि मान्यता है कि सालासर बालाजी अपनी भक्तों की मनोकामनाएं बहुत जल्दी पूरी करते हैं। आइए जानते हैं इस अनोखे धाम और दाढ़ी-मूंछों वाली मूर्ति के पीछे की रोचक कहानी।
सालासर बालाजी धाम
सालासर बालाजी मंदिर जयपुर-बीकानेर राजमार्ग पर आसोटा गांव के पास स्थित है। यह मंदिर 19वीं शताब्दी में स्थापित हुआ था और आज पूरे देश में प्रसिद्ध है। यहां रोजाना हजारों श्रद्धालु आते हैं। खास बात यह है कि सालासर बालाजी को संकट मोचन और मनोकामना पूर्ति के देवता के रूप में जाना जाता है। मंदिर में भक्तों की भीड़ हमेशा बनी रहती है, खासकर हनुमान जयंती और शरद पूर्णिमा के मेले में।
मूर्ति की खोज और प्रकट होने की कहानी
सालासर बालाजी की मूर्ति की खोज की कहानी बहुत रोचक है। कहा जाता है कि साल 1811 में आसोटा गांव के किसान मोहनदास खेत में हल जोत रहे थे। अचानक हल किसी नुकीली चीज से टकराया। जब उन्होंने खुदाई की तो एक हनुमान जी की मूर्ति निकली। मोहनदास उस समय दोपहर का भोजन चूरमा लेकर आए थे। उन्होंने उसी चूरमा का भोग लगाकर मूर्ति की पूजा की। इसके बाद रात को उन्हें हनुमान जी का सपना आया।
दाढ़ी-मूंछों वाली मूर्ति का राज
सपने में हनुमान जी मोहनदास को दाढ़ी-मूंछों वाले रूप में दिखाई दिए। बालाजी ने मोहनदास को निर्देश दिया कि मूर्ति को बैलगाड़ी में रखकर ले जाएं और जहां बैल खुद रुक जाएं, वहीं मूर्ति को स्थापित कर दें। मोहनदास ने वैसा ही किया। बैलगाड़ी ठीक उसी जगह रुकी, जहां आज सालासर बालाजी मंदिर स्थित है। चूंकि सपने में हनुमान जी दाढ़ी-मूंछों में दिखे थे, इसलिए मोहनदास ने मूर्ति का शृंगार दाढ़ी-मूंछों वाला करके स्थापित किया। यही कारण है कि सालासर बालाजी की मूर्ति दाढ़ी-मूंछों वाली है।
दाढ़ी-मूंछों वाले बालाजी की अनोखी पहचान
भारत में लगभग सभी हनुमान मंदिरों में बालाजी की मूर्ति युवा और बिना दाढ़ी-मूंछ वाली होती है। सालासर बालाजी इस नियम का अपवाद हैं। उनकी दाढ़ी-मूंछ उन्हें और भी प्रौढ़, गरिमामय और संकट मोचन स्वरूप में दिखाती है। भक्त मानते हैं कि दाढ़ी-मूंछ वाला रूप उन्हें अधिक गंभीर और शक्तिशाली बनाता है। यही वजह है कि सालासर बालाजी पूरे देश में अपनी अनोखी छवि के लिए प्रसिद्ध हैं।
सालासर बालाजी में दो प्रमुख मेले
सालासर धाम में हर वर्ष दो बड़े मेले लगते हैं। पहला मेला हनुमान जयंती पर और दूसरा मेला शरद पूर्णिमा पर लगता है। इन मेलों में दूर-दूर से भक्त आते हैं। यहां धार्मिक किताबें, हनुमान जी के चित्र, चूरमा प्रसाद और अन्य पूजा सामग्री मिलती है। मेले के दौरान मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ लगती है।
नारियल चढ़ाने की अनोखी परंपरा
सालासर बालाजी में नारियल चढ़ाने की पुरानी परंपरा है। भक्त अपनी मनोकामना पूरी होने पर लाल कपड़े में नारियल बांधकर मंदिर परिसर में लगे खेजड़ी के पेड़ पर चढ़ाते हैं। ये नारियल ना तो फेंके जाते हैं और ना जलाए जाते हैं। इन्हें मंदिर से करीब 11 किलोमीटर दूर मुरड़ाकिया गांव के पास एक खेत में गड्ढा खोदकर दबा दिया जाता है। यह परंपरा भक्तों की अटूट श्रद्धा का प्रतीक है।
सालासर बालाजी धाम भक्ति और विश्वास का केंद्र है। दाढ़ी-मूंछों वाले इस अनोखे स्वरूप वाले हनुमान जी भक्तों के हर संकट को दूर करते हैं। यदि आप भी किसी समस्या से गुजर रहे हैं तो एक बार सालासर बालाजी के दर्शन अवश्य करें। यहां की दिव्य शक्ति और चूरमा प्रसाद हर भक्त के मन को शांति प्रदान करता है।




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