Shukra Pradosh Vrat Katha Pradosh Vrat ki Katha in hindi Magh Shukra Pradosh Vrat 2026 shiv ji ki aarti 16 जनवरी को माघ शुक्र प्रदोष व्रत, पढ़ें शुक्र प्रदोष व्रत की कथा व शिव जी की आरती, एस्ट्रोलॉजी न्यूज़ - Hindustan
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16 जनवरी को माघ शुक्र प्रदोष व्रत, पढ़ें शुक्र प्रदोष व्रत की कथा व शिव जी की आरती

Shukra Pradosh Vrat Katha Pradosh Vrat ki Katha in hindi: शुक्रवार त्रयोदशी प्रदोष व्रत की पूजा में श्वेत रंग तथा खीर आदि पदार्थों का सेवन किया जाता है। शुक्र प्रदोष का व्रत बिना कथा का पाठ किए अधूरा माना जाता है। 

Thu, 15 Jan 2026 06:12 PMShrishti Chaubey लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली
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16 जनवरी को माघ शुक्र प्रदोष व्रत, पढ़ें शुक्र प्रदोष व्रत की कथा व शिव जी की आरती

Shukra Pradosh Vrat Katha Pradosh Vrat ki Katha in hindi: कल शुक्रवार के दिन माघ कृष्ण प्रदोष व्रत पड़ रहा है, जो बेहद ही महत्वपूर्ण माना जा रहा है। शुक्रवार त्रयोदशी प्रदोष व्रत की पूजा में श्वेत रंग तथा खीर आदि पदार्थों का सेवन किया जाता है। शुक्र प्रदोष का व्रत रखने से भोलेनाथ की कृपा पाने के साथ जीवन की कई उलझनों को दूर किया जा सकता है। शुक्र प्रदोष का व्रत बिना कथा का पाठ किए अधूरा माना जाता है। इसलिए शुक्र प्रदोष व्रत के दिन जरूर पढ़ें शुक्र प्रदोष की कथा। आगे पढें शुक्र प्रदोष व्रत की कथा-

16 जनवरी को माघ शुक्र प्रदोष व्रत, पढ़ें शुक्र प्रदोष व्रत की कथा

सूत जी बोले - प्राचीन समय की बात है। एक नगर में तीन मित्र निवास करते थे। तीनों मित्रों के बीच अच्छी दोस्ती थी। उन मित्रों में एक राजकुमार, दूसरा ब्राह्मण पुत्र तथा तीसरा एक धनिक का पुत्र था। राजकुमार एवं ब्राह्मण पुत्र का विवाह हो चुका था तथा धनिक पुत्र का विवाह तो हो गया था लेकिन गौना नहीं हुआ था।

एक दिन तीनों मित्रों के मध्य स्त्रियों के विषय में चर्चा हो रही थी। ब्राह्मण पुत्र स्त्रियों की प्रशंसा करते हुये बोला - 'स्त्री ही भवन को घर बनाती है तथा स्त्रीहीन घर तो भूतों का निवास होता है।' धनिक पुत्र को ब्राह्मण पुत्र के वचन उचित लगे तथा उसने तत्काल ही अपनी पत्नी को विदा कराकर लाने का निश्चय किया। उसने घर पहुँचकर माता-पिता को भी अपना निर्णय बताया। उसके माता-पिता ने कहा - 'वर्तमान में शुक्र देवता अस्त चल रहे हैं, इस समयावधि में बहु-बेटियों को विदा कराकर लाना शुभ नहीं होता है, अतः शुक्र उदय होने के उपरान्त तुम अपनी पत्नी को विदा करा लाना।'

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माता-पिता द्वारा बहुत समझाने पर भी धनिक पुत्र ने अपना हठ नहीं छोड़ा तथा अपनी पत्नी को लेने ससुराल पहुँच गया। ससुराल में उसके सास-ससुर ने भी शुक्रोदय होने के पश्चात् पुत्री की विदाई करने का निवेदन किया किन्तु उसने किसी की भी बात नहीं मानी और अपने निर्णय पर अडिग रहा। अन्ततः अपने दामाद के हठ से विवश होकर उन्होंने अपनी कन्या को उसके साथ विदा कर दिया।

ससुराल से विदा होकर वे दोनों पति-पत्नी नगर की सीमा से कुछ दूर ही निकले थे कि अकस्मात् ही उनकी बैलगाड़ी का पहिया टूट गया तथा एक बैल की टाँग टूट गयी। इस दुर्घटना के कारण वे दोनों नीचे गिर गये तथा उसकी पत्नी भी गम्भीर रूप से घायल हो गयी। इस दुर्घटना के पश्चात् भी वह धनिक पुत्र अपनी पत्नी सहित यात्रा करता रहा। वह अभी कुछ ओर आगे बढ़ा ही था कि मार्ग में डाकुओं के एक दल ने उन्हें घेरकर उनका समस्त धन-धान्य आदि लूट लिया। लूटपाट हो जाने के उपरान्त धनिक का पुत्र पत्नी सहित विलाप करता हुआ अपने घर पहुँचा। ज्यों ही वह घर पहुँचा, वहाँ उसे एक सर्प ने डस लिया। उसके पिता ने अपने पुत्र के उपचार हेतु श्रेष्ठ वैद्यों को बुलाया। वैद्यों ने उसके पुत्र की स्थिति का अवलोकन किया तथा बोले - 'आगामी तीन दिवस में उसकी मृत्यु हो जायेगी।'

उसी समय इस घटना की सूचना ब्राह्मण पुत्र को प्राप्त हुयी। उसने धनिक से कहा - 'आप अपने लड़के को पत्नी सहित बहु के घर वापस भेज दीजिये तथा शुक्र प्रदोष के व्रत का संकल्प लीजिये। यह सारी बाधायें इसीलिये उत्पन्न हुयी हैं क्योंकि आपका पुत्र शुक्रास्त में अपनी पत्नी को विदा कराकर लाया है, यदि यह वहाँ पहुँच गया तो इसके प्राण बच जायेंगे।'

धनिक को ब्राह्मण पुत्र का परामर्श उचित लगा तथा उसने अपने पुत्र एवं पुत्रवधू को वापस लौटा दिया। ससुराल पहुँचते ही धनिक के पुत्र की स्थिति में सुधार होने लगा। तदुपरान्त भगवान शिव की कृपा से दोनों पति-पत्नी ने शेष जीवन सुख एवं आनन्दपूर्वक व्यतीत किया तथा अन्त में उत्तम लोक को प्राप्त हुए।

॥इति श्री शुक्र प्रदोष व्रत कथा सम्पूर्णः॥

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शिव जी की आरती

जय शिव ओंकारा ॐ जय शिव ओंकारा।

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव अर्द्धांगी धारा॥ ॐ जय शिव…॥

एकानन चतुरानन पंचानन राजे।

हंसानन गरुड़ासन वृषवाहन साजे॥ ॐ जय शिव…॥

दो भुज चार चतुर्भुज दस भुज अति सोहे।

त्रिगुण रूप निरखता त्रिभुवन जन मोहे॥ ॐ जय शिव…॥

अक्षमाला बनमाला मुण्डमाला धारी।

चंदन मृगमद सोहै भाले शशिधारी॥ ॐ जय शिव…॥

श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे।

सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे॥ ॐ जय शिव…॥

कर के मध्य कमंडलु चक्र त्रिशूल धर्ता।

जगकर्ता जगभर्ता जगसंहारकर्ता॥ ॐ जय शिव…॥

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।

प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका॥ ॐ जय शिव…॥

काशी में विश्वनाथ विराजत नन्दी ब्रह्मचारी।

नित उठि भोग लगावत महिमा अति भारी॥ ॐ जय शिव…॥

त्रिगुण शिवजी की आरती जो कोई नर गावे।

कहत शिवानंद स्वामी मनवांछित फल पावे॥ ॐ जय शिव…॥

जय शिव ओंकारा हर ॐ शिव ओंकारा|

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव अर्धांगी धारा॥ ॐ जय शिव ओंकारा…॥

डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम यह दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य एवं सटीक हैं। विस्तृत और अधिक जानकारी के लिए संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।

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