Ram Navami 2026 : what qualities has Lord Rama Ram Navami : भगवान राम में क्या गुण थे? उन्होंने जीवन में क्या आदर्श प्रस्तुत किए?, एस्ट्रोलॉजी न्यूज़ - Hindustan
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Ram Navami : भगवान राम में क्या गुण थे? उन्होंने जीवन में क्या आदर्श प्रस्तुत किए?

मर्यादा पुरुषोत्तम राम युगों-युगों से हमारी चेतना के आधार रहे हैं। ऐसे राम के आदर्श चरित्र को सबसे पहले आदि कवि महर्षि वाल्मीकि ने ही रामायण के रूप सबके सामने प्रस्तुत किया। राम में ऐसे क्या गुण थे? उन्होंने अपने जीवन में क्या आदर्श प्रस्तुत किए? यह विवेचना युगों से जारी है...

Tue, 24 March 2026 04:13 PMAnuradha Pandey लाइव हिन्दुस्तान, उमेश नेपाल
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Ram Navami : भगवान राम में क्या गुण थे? उन्होंने जीवन में क्या आदर्श प्रस्तुत किए?

मर्यादा पुरुषोत्तम राम युगों-युगों से हमारी चेतना के आधार रहे हैं। ऐसे राम के आदर्श चरित्र को सबसे पहले आदि कवि महर्षि वाल्मीकि ने ही रामायण के रूप सबके सामने प्रस्तुत किया। राम कथा का मूल वाल्मीकि रामायण को ही माना जाता है। राम में ऐसे क्या गुण थे? उन्होंने अपने जीवन में क्या आदर्श प्रस्तुत किए? यह विवेचना युगों से जारी है…

जन-जन के मन भाते राम

राम अपने जन्म से ही जन-जन में लोकप्रिय हो गए। उनके पिता दशरथ के राज्य में सच्चरित्रता और समृद्धि ऐसी रही कि उस राज्य का राजा मनुष्य नहीं, देवता लगता है। महाराज द‌शरथ स्वयं जनप्रिय हैं। उन्होंने जिस धर्मबल से राम को प्राप्त किया है, उस धर्म के अनुष्ठान में लगभग प्रजा का हर वर्ग सम्मिलित हुआ। अतः राम केवल दशरथ के नहीं, बल्कि सबके सुकृत के फल हैं।

सबके रक्षक

प्रजा अपने राजा को शासक कम और रक्षक रूप में अधिक देखना चाहती है। यह विशेषता राम में है। वे शासक कम, रक्षक अधिक दिखते हैं। राम महोन्नत, आजानुबाहु हैं। वे निर्बल के बल हैं। उनके व्यक्तित्व और चाल में ही उनका असाधारण रक्षण सामर्थ्य झलकता है। उनके व्यवहार में अपनापन है, इसलिए सबके लिए सहज हैं। कोई भी प्रश्न उठने से पहले ही राम उसे समझ लेते हैं और समस्या को सहजता से दूर कर देते हैं-‘पूर्वभाषी च राघवः।’ जनता के विषयों को वे स्वयं उठाते हैं और जब तक अंतिम निर्णय न हो जाए, तब तक पीछे नहीं हटते हैं।

तपस्वी राजा

महर्षि वाल्मीकि ने लिखा है कि राम जन-जन के हितों और भावनाओं की रक्षा तो करते ही हैं, लोक के आदर्श की रक्षा करने में भी तत्पर रहते हैं। जनता में विश्वास जगे, इसलिए रक्षक बने रहते हैं। उनका विश्वास न टूटे, इसलिए व्यक्तिगत पीड़ा सहकर भी लोक हित, लोक‌भावना और लोक आदर्श की रक्षा में समझौता नहीं करते। दशरथ ने जब राम के उत्तराधिकार की घोषणा की और जन प्रमुखों से सहमति चाही, तब एक भी मत राम के विरुद्ध नहीं था। सबने राम को राजा के रूप में देखने की इच्छा जताई। इस प्रकार राजतंत्र और लोकतंत्र, दोनों प्रणाली से राम राज्य करने के योग्य हुए, परंतु राम ने न राजा के मत को माना, न जनता के बहुमत को। उन्होंने वनवास स्वीकारा। उन्होंने धर्म और सत्य के आदर्श की रक्षा के लिए राज सुख और परिवार सुख का त्याग किया। यही गुण सीता और लक्ष्मण के त्याग में भी दिखता है। भ्रातृ धर्म, पति धर्म जैसे व्यक्तिगत धर्म और राज धर्म के बीच द्वंद्व होने पर राम ने राज धर्म का पालन एक तपस्वी की भांति किया।

मर्यादा की स्थापना

राम शासन नहीं करते, वे लोक आराधना करते हैं। राम के व्यवहार में सर्वत्र जाति निरपेक्षता, व्यक्ति निरपेक्षता, देश-काल-अवस्था-निरपेक्षता दिखाई देती है। अगर किसी के सापेक्ष हैं, तो धर्म के सापेक्ष हैं, न्याय के सापेक्ष हैं। शबरी और निषाद राज के साथ राम जाति निरपेक्ष होकर व्यवहार करते हैं। भगोड़े वानर के रूप में राज्यविहीन हुए सुग्रीव के साथ व्यक्ति निरपेक्ष होकर व्यवहार करते हैं। सत्य के लिए लक्ष्मण और सीता को भी त्यागने की बात करते हैं। राम ने देशकाल निरपेक्ष होकर विभीषण को अपनाया।

राम में एक बात यह है कि वे किसी भी व्यक्ति को अपने से अलग नहीं समझते हैं। उनमें अलगाव की भावना नहीं है। राम ने परशुराम का गर्व भंग किया, तो उन्हीं के चरणों में प्रणाम भी किया। कैकेयी के कारण वन गए, तो भी लक्ष्मण को - न तात मध्यमाम्बा ते गर्हितव्या कदाचन - मंझली मां कैकेयी की निंदा करने से रोका। बालि वध किया, तो मरते हुए बालि को अपना कहा। जटायु अपवित्र पक्षी योनि में हैं, तो भी उनका यथोचित अंतिम संस्कार किया।

निर्बल के बल

रावण-वध के समय विभीषण से बोले, ‘रावण जैसे तुम्हारा भाई है, वैसे ही मेरा भी भाई है।’ सीता का त्याग करने के बावजूद अश्वमेध यज्ञ में उनकी ही प्रतिमा रखी। राम की लीला का प्रारंभ राक्षसों के विनाश के साथ होता है। वे इसमें पूर्णरूप में सफल भी होते हैं, परंतु राम के राज सिंहासन पर विराजमान होते ही राक्षसों के खलनायक होने का नैरेटिव बदल जाता है। वानरों के असभ्य होने का भी नैरेटिव बदल जाता है। उनके दरबार में विभीषण और सुग्रीव उन‌के समान स्तर के मित्र के रूप में दिखाई देते हैं। ‘राक्षस बुरे होते हैं’- जनमानस की इस सोच का परिवर्तन राम की सभा में दि‌खता है।

राम अत्यंत तार्किक एवं विवेकशील हैं।
तर्क देने में देवगुरु के समान हैं। अपने वन गमन के राज आदेश का बड़े विवेक और अकाट्‌य तर्कों से समर्थन करते हैं। न्याय और विवेक से ही बालि तथा सुग्रीव के बीच सुग्रीव का चयन करते हैं।

लोक स्वभाव का ज्ञान इतना है कि किए हुए अपकार को सामान्य रूप में लेते हैं, इसलिए उसे भूल जाते हैं। मंथरा के अपराध को भूल जाते हैं। सीता पर मिथ्या आरोप लगाने वाले के अपराध को भूल जाते हैं। इतना होते हुए भी मनुष्यों के व्यक्तिगत चाल-चरित्र को भली-भांति याद रखते हैं।

राम का व्यक्तित्व ऐसा गरिमामय है कि आज भी लोगों की आस्था आदर्श राजा के रूप में राम को ही जानती और मानती है। आदर्श राज्य के रूप में ‘राम राज्य’ को ही देखती है। आश्चर्य तो यह है कि जब राम इस लोक में अपनी लीला पूर्ण करके अपने धाम जाने लगे, तो कीट-पतंग तक को अपने साथ ले गए। ऐसे हैं तपस्वी राजा राम, जो कभी किसी का साथ नहीं छोड़ते हैं।

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