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Premanand Maharaj Pravachan: मोक्ष और मुक्ति के लिए नाम जप करना स्वार्थ नहीं? प्रेमानंद महाराज ने दिया ये जवाब

Premanand Maharaj Pravachan: वृंदावन के जाने-माने संत प्रेमानंद महाराज ने अपने हालिया प्रवचन के दौरान एक बार फिर से नाम जप की बात की है। उन्होंने बताया है कि मोक्ष और मुक्ति के लिए किया गया जाने वाला नाम जप स्वार्थ है या नहीं?

Fri, 12 Dec 2025 01:30 PMGarima Singh लाइव हिन्दुस्तान
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Premanand Maharaj Pravachan: मोक्ष और मुक्ति के लिए नाम जप करना स्वार्थ नहीं? प्रेमानंद महाराज ने दिया ये जवाब

premanand Mahraj Latest Pravachan: वृंदावन के जाने-माने संत प्रेमानंद महाराज की हर एक बात से लोग कनेक्ट फील करते हैं। उनके प्रवचन से ही लोगों को अपने ढेर सारे सवालों के जवाब मिल जाते हैं। एकांतित वार्तालाप के दौरान प्रेमानंद महाराज सभी के प्रश्नों का जवाब देते हैं। इस दौरान वो ऐसी बातें बताते हैं जिसे अमल में लाने से जिंदगी की कई बाधाएं दूर हो सकती हैं। हाल ही में एकांतित वार्तालाप के दौरान एक महिला श्रद्धालु ने प्रेमानंद महाराज से पूछा कि क्या नाम जाप करना स्वार्थ नहीं है? मुक्ति और मोक्ष के लिए ये करना स्वार्थ ही तो है। इस पर प्रेमानंद महाराज ने बड़ा ही प्यारा जवाब दिया है। उनके जवाब को नीचे विस्तार से पढ़ें।

करें भगवान के नाम का जाप

प्रेमानंद महाराज का कहना है कि ये विचार गलत है। हम स्वार्थ के लिए ही करें। अमृत अगर स्वार्थ के लिए पिएंगे तो अमर हो जाएंगे ना। नाम अमृत है। हम स्वार्थ के लिए ही नाम का जप करें। स्वार्थ से ही जप करें। हमारा मंगल हो। हम सुखी हो जाएं। इसी भाव से करो लेकिन करो तो। वो अमृत है। तुम्हारा मंगल कर देगा। भायं कुभायं अनख आलस हूं, नाम जपत मंगल दिसि दसहूं। किसी भी भावना से यदि हम भगवान का नाम जप करें तो भगवान का नाम हमारा परम मंगल कर देता है। सबकी भक्ति स्वार्थ से शुरू होती है। पूर्णतया निस्वार्थ में आती है। सबकी स्वार्थ से ही शुरू होती है कि हमारे काम कुरुध नष्ट हो जाएं। हमारी भावनाएं शुद्ध हो जाएं।

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नहीं रहती है कोई इच्छा

प्रेमानंद महाराज ने आगे कहा कि हम माया पर विजय प्राप्त करें। ये कामना तो हमारे अंदर भी थी ना। उसी कामना के बल से हम परमार्थ पर चल पाएं। कामना के बल पर ही चला जाता है। अपनी इच्छी की पूर्ति के लिए। हमारी इच्छा क्या है कि भगवान मिलें। अगर ये इच्छा ना हो तो हम चले क्यों? तो इच्छा से ही चला जाता है। बाद में जाकर पूर्ण हो जाती है। तब कोई भी इच्छा नहीं रहती है। एकमात्र भगवान की प्राप्ति के बाद फिर कोई इच्छा नहीं रहती है।

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