Premanand Maharaj: विपत्ति आने पर मन हो जाए विचलित तो क्या करें? प्रेमानंद महाराज ने दिया सटीक उपाय
Premanand Maharaj Discourse: जाने-माने संत प्रेमानंद महाराज ने अपने लेटेस्ट एकांतिक वार्तालाप में कई जरूरी बातें बताई हैं। एक भक्त के पूछने पर उन्होंने बताया कि विपत्ति आने पर क्या किया जाए?

Premanand Maharaj Pravachan: Premanand Maharaj Latest Pravachan: वृंदावन के जाने-माने संत प्रेमानंद महाराज अपने प्रवचन के दौरान कुछ ऐसी बातें कह जाते हैं जिससे हर कोई रिलेट कर जाता है। एकांतित वार्तालाप के दौरान प्रेमानंद महाराज भक्तों के हर एक सवाल का बहुत ही आसान सा जवाब देते हैं। उनके एक जवाब के अंदर ही कइयों को अपने सवाल के जवाब मिल जाते हैं। आज के एकांतिक वार्तालाप के दौरान उन्होंने लोगों के सवाल के जवाब दिए। ऐसे ही एक भक्त ने सवाल किया कि जब विपत्ति ऊपर आए तो हमें क्या करना चाहिए? इस सवाल का प्रेमानंद महाराज ने बहुत ही प्यारा जवाब दिया। उनके जवाब को विस्तृत रूप से नीचे पढें-
लें गुरु के चरणों का आशीर्वाद
प्रेमानंद महाराज ने कहा कि जब तक हम संतों का संग नहीं करते हैं। उनकी बताई हुई साधना पद्धति से नहीं चलते हैं तब तक हमारा मन निर्मल नहीं होता है। निर्मल मन के बिना हम वाणी से कुछ भी कहते रहें वो चेष्टाएं गंदी ही कराता रहेगा मलीन ही कराता रहेगा। भगवत विमुख ही चेष्टाएं कराता रहेगा। सारी साधना मन को पवित्र करने के लिए है। मन तभी पवित्र होता है जब हम किसी संत सद्गुरू के चरणों का आशीर्वाद और आश्रय लेकर उनकी बताई हुई साधना से चलते हैं और उनके अधीन रहते हैं तो चाहे गृहस्थ हो चाहे विरक्त हो। जो अपने गुरु के अधीन नहीं है मन उसके अधीन कभी हो ही नहीं सकता है। मन अधीन होगा तभी हम हर विपत्ति का सामना कर पाएंगे।
करोड़ों जन्मों के पाप होते हैं भस्म
जो लोग गुरु के अधीन हैं, उसी के अधीन मन है। जिसके अधीन मन है वही भगवान की सन्मुखता प्राप्त करता है। जो भी भगवान के सन्मुख हुआ तो सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं। करोड़ों जन्मों के पाप भस्म हो जाते हैं और निर्मल महात्मा मन-वचन और कर्म से भगवान के शरणागत हो जाता है। चाहे वो पैंट शर्ट में हो चाहे वो वैरागी भेष में हो वो महात्मा ही कहलाने के योग है।
गुरुदेव करेंगे उद्धार
जो मन-वचन और कर्म से भगवान की शरण में होकर भगवान की उपासना के हेतु भले लोक व्यवहार के कार्यकर्ता है लेकिन वो परमात्मा को प्रसन्न करने के लिए शरणागति पुष्टि तभी होते हैं जब भगवत प्रेमी महात्माओं की पहली शरण ली जाए। पहले गुरुदेव की शरण ली जाए। तब वहां से जाकर हमारी शरणागति प्राप्ति होगी।
मन-वचन और कर्म से हो जाएं एक
हमारी सामर्थ्य तो शरणागति होने की भी नहीं है। हम वाणी से कुछ बोलते हैं और मन से कुछ और सोचते हैं और क्रियाओं से कुछ करते हैं। जब मन-वचन और कर्म से यदि एक होना है तो किसी सद्गुरू की शरण लो और उसके अनुसार ही चलो। इस तरह से हमारा मन धीरे-धीरे अपने अधीन होने लगेगा और विपत्ति बड़ी नहीं लगेगी।




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