Papmochani Ekadashi Vrat Katha in hindi: पापमोचिनी एकादशी व्रत की पौराणिक कथा, मुनि मेधावी,अप्सरा इस व्रत से पाप हुए कम
papamochini ekadashi vrat ki katha kahani:चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को पापमोचिनी एकादशी कहते हैं। इस एकादशी का व्रत जो रखता है, उसके सभी पाप दूर हो जाते हैं। यहां पढ़ें पापमोचिनी एकादशी व्रत की पौराणिक कथा

चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को पापमोचिनी एकादशी कहते हैं। इस साल पापमोचिनी एकादशी का व्रत 15 मार्च को रखा जाएगा। इस एकादशी का व्रत जो रखता है, उसके सभी पाप दूर हो जाते हैं। मार्च में दो एकादशी आती हैं, एक कृष्ण पक्ष की पापमोचिनी एकादशी और शुक्ल पक्ष की कामदा एकादशी। यहां हम पापमोचिनी एकादशी के बारे में बता रहे हैं। यहां आप संपूर्ण कथा पढ़ सकते हैं। कहते हैं इस एकादशी का व्रत कर लिया तो बड़े से बड़ा पाप दूर हो जाता है। यहां पढ़ें संपूर्ण कथा
युधिष्ठिर ने भगवान कृष्ण से चैत्र कष्णपक्ष की एकादशी के बारे में पूछा इस पर भगवान श्रीकृष्ण बोले-राजेन्द्र, मैं आज आपको उस पापनाशक एकादशी का महत्व बताऊंगा, जिसे राजा मान्धाता के पूछने पर महर्षि लोमश ने बताया था। बहुत समय पहले की बात है। अप्सराएं चैत्ररथ नामक वन में गंधर्वों की कन्याओं के साथ गाते बजाते हुए घूम रही थीं। तभी मझुघोषा नाम की एक अप्सरा मुनिवर मेधावी को मोहित करने के लिए गई। वे महर्षि उसी वन में रहकर तपस्या और ब्रह्मचर्य का पालन कर रहे थे। मझुघोषा मुनि के डर से आश्रम से थोड़ी दूर रुक गई और मुनि को मोहित करने की कोशिश करने लगी। इस तरह वो सुन्दर ढंग से वीणा बजाती हुई मधुर गीत गाने लगी। मुनिश्रेष्ठ मेधावी घूमते हुए उधर जा निकले और उस सुन्दरी अप्सरा को इस प्रकार गान करते देख मोह के वशीभूत हो गए । मुनि की ऐसी अवस्था देख मझुघोषा उनके पास आई और उनका आंलिग्न करने लगी। मेधावी भी उसके साथ घूमने करने लगे। कामवश रमण करते हुए उन्हें रात और दिन का भी ध्यान नहीं रहा। इस प्रकार मुनि को अप्सरा के साथ रमण करते उन्हें बहुत दिन बीत गए। एक दिन मझुघोषा ने वापस अपने देवलोक जाने की बात कही। जाते समय उसने मुनिश्रेष्ठ मेधावी से कहा, अब मुझे अपने देश जाने की इजाजत दें।
मेधावी बोले-जब तक सुबह न हो जाए तब तक मेरे ही पास ठहरो। अप्सरा ने कहा, अब तक न जाने कितनी शाम और सुबह चली गईं, मुनिदेव और कितना मैं यहां ठहरूं । मुझ पर कृपा करके बीते हुए समय के बारे में तो सोचें । एकदम से अप्सरा की बात सुनकर मेधावी को बहुत आश्चर्य हुआ। उस समय उन्होंने बीते हुए समय का हिसाब लगाया तो मालूम हुआ कि उसके साथ रहते सत्तावन वर्ष हो गए। उसे अपनी तपस्या का विनाश करने वाली जानकर मुनि को उस पर बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने उसे श्राप देते हुए कहा-पापिनी, तू पिशाचिनी हो जा । मुनि के श्राप से दग्ध होकर वह विनय से उनके पैरों में गिरकर बोली, मेरा उद्धार कीजिए, मैंने तो आपके साथ अनेक साल व्यतीत किए हैं, इसलिए मुझपर कृपा करें। मुनि बोले, श्राप से उद्धार करने के लिए एक उपाय बताता हूं, तुमने मेरी बहुत बड़ी तपस्या नष्ट कर डाली है। चेत्र कृष्णपक्ष में जो शुभ एकादशी आती है उसका नाम है पापमोचनी। वह सब पापों का नाश करने वाली है। उसी का व्रत करने पर तुम्हारी पिशाचता दूर होगी । ऐसा कहकर मेधावी अपने पिता मुनिवर च्यवन के आश्रम पर गए। उन्हें आया देख च्यवन ने पूछा-बेटा, यह क्या किया, तुमने तो अपने पुण्य का नाश कर डाला । मेधावी बोले, पिताजी, मैंने अप्सराके साथ रमण करने का पातक किया है। कोई ऐसा प्रायश्चित्त बताइये, जिससे पापका नाश हो जाए । च्यवन ने कहा, चेत्र कृष्णपक्ष में जो पापमोचनी एकादशी होती है, उसका ब्रत करने पर पापराशि का विनाश हो जाएगा।
पिता की यह बात सुनकर मेधावी ने उस ब्रत को श्रद्धा से किया और तो उनके सभी इस एकादशी के व्रत से नष्ट हो गए और वे दोबारा तपस्या करने लगे। वहीं मझुघोषा ने भी इस व्रत को किया । पापमोचनी'का व्रत करनेके कारण वह भी पिशाच-योनिसे मुक्त हुई और फिर अप्सरा होकर स्वर्गलोक में चली गयी। जो मनुष्य पापमोचनी एकादशी का ब्रत करते हैं, उनका सारा पाप नष्ट हो जाता है । इसको पढ़ने ओर सुनने से सहस्र गोदानका फल मिलता है। ब्रह्महत्या, सुवर्णकी चोरी, सुरापान करने वाले महापात की भी इस बव्रत के करने से पापमुक्त हो जाते हैं। यह व्रत बहुत पुण्यमय है।




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