काशी-मथुरा नहीं, इस शहर से हुई थी होली की शुरुआत, भक्त प्रहलाद से है माना जाता है संबंध
आम धारणा है कि होली मथुरा-वृंदावन या काशी से शुरू हुई, लेकिन पौराणिक कथाओं और प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, होली की शुरुआत उत्तर प्रदेश के झांसी जिले में स्थित प्राचीन नगर एरच से हुई थी।

होली का त्योहार भारत में रंगों, उल्लास और प्रेम का प्रतीक है, लेकिन इसकी जड़ें बहुत गहरी हैं। आम धारणा है कि होली मथुरा-वृंदावन या काशी से शुरू हुई, लेकिन पौराणिक कथाओं और प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, होली की शुरुआत उत्तर प्रदेश के झांसी जिले में स्थित प्राचीन नगर एरच से हुई थी। यह नगर भक्त प्रहलाद के जन्मस्थान के रूप में प्रसिद्ध है और होली की मूल कथा इसी से जुड़ी हुई है।
एरच नगर - होली का मूल स्थान
एरच झांसी जिले में बेतवा नदी के किनारे स्थित एक प्राचीन नगर है। धर्म पुराणों में इसे असुर राजा हिरण्यकश्यप की राजधानी बताया गया है। यहीं भक्त प्रहलाद का जन्म हुआ था। एरच को विश्व की पहली राजधानी माना जाता है और यहां होली की प्रथा की शुरुआत हुई। आज भी एरच में होलिका दहन का स्थान और प्रहलाद से जुड़े अवशेष मौजूद हैं, जो इस कथा की सत्यता को प्रमाणित करते हैं।
भक्त प्रहलाद का जन्म और होली की कथा
हिरण्यकश्यप असुर राजा था और वह स्वयं को भगवान मानता था। उसका पुत्र प्रहलाद विष्णु भक्त था। पिता की आज्ञा के विरुद्ध प्रहलाद ने विष्णु भक्ति नहीं छोड़ी। क्रोधित होकर हिरण्यकश्यप ने प्रहलाद को मारने के कई प्रयास किए। अंत में उसने अपनी बहन होलिका को प्रहलाद को गोद में लेकर आग में बैठने को कहा। होलिका के पास वरदान था कि आग उसे नहीं जलेगी। लेकिन भगवान विष्णु की कृपा से होलिका जल गई और प्रहलाद सुरक्षित बच गए। यही घटना होलिका दहन की मूल कथा है, जो एरच में हुई थी।
होलिका दहन और होली की शुरुआत एरच से
एरच में वह स्थान आज भी मौजूद है, जहां होलिका प्रहलाद को लेकर आग में बैठी थी। इस घटना के बाद होलिका दहन की प्रथा शुरू हुई। अगले दिन रंगों से होली खेलने की शुरुआत भी यहीं से हुई। धार्मिक ग्रंथों में कहा गया है कि होलिका दहन के बाद देवताओं और असुरों ने संधि की और एक-दूसरे को गुलाल लगाया। यही गुलाल लगाने की परंपरा आज होली के रूप में मनाई जाती है। एरच में आज भी होली के समय विशेष पूजा और होलिका दहन होता है।
मथुरा-वृंदावन में होली की लोकप्रियता का कारण
मथुरा-वृंदावन में होली की धूम इसलिए ज्यादा दिखती है, क्योंकि यहां श्रीकृष्ण और राधा की लीलाएं जुड़ी हैं। लेकिन मूल कथा एरच से है। कृष्ण जन्म के बहुत बाद की घटनाएं हैं। एरच की होली प्रहलाद और होलिका की कथा से जुड़ी है, जबकि वृंदावन में फूलों और लड्डू मार होली कृष्ण-राधा की लीला से प्रेरित है। दोनों परंपराएं अलग-अलग हैं, लेकिन मूल होलिका दहन एरच से जुड़ा है।
आज भी एरच में जीवंत है होली की परंपरा
एरच में आज भी होलिका दहन का स्थान और प्रहलाद से जुड़े मंदिर मौजूद हैं। यहां होली के समय विशेष पूजा होती है और भक्त प्रहलाद की भक्ति की याद में होलिका दहन करते हैं। एरच की होली धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। झांसी जिले का यह प्राचीन नगर होली की सच्ची जड़ों को संजोए हुए है।
होली का त्योहार प्रेम, भक्ति और बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। एरच से शुरू हुई यह परंपरा आज भी जीवित है और हमें याद दिलाती है कि होली केवल रंगों का खेल नहीं, बल्कि भक्ति और सत्य की विजय का उत्सव है।




साइन इन