चैत्र शुक्ल षष्ठी को प्रकट हुईं यमुना
पौराणिक मान्यता है कि मनुष्य को ‘यमुना के पान और गंगा में स्नान’ से पुण्य मिलता है। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को देवी यमुना पृथ्वी पर प्रकट हुई थीं, इसलिए इस दिन को यमुना जयंती के रूप में मनाया जाता है। इस दिन लोग यमुना में स्नान करके दीपदान करते हैं।

पौराणिक मान्यता है कि मनुष्य को ‘यमुना के पान और गंगा में स्नान’ से पुण्य मिलता है। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को देवी यमुना पृथ्वी पर प्रकट हुई थीं, इसलिए इस दिन को यमुना जयंती के रूप में मनाया जाता है। इस दिन लोग यमुना में स्नान करके दीपदान करते हैं।
सूर्य पुत्री और यमराज की बहन यमुना का उद्गम स्थल कालिंद पर्वत है, इसलिए इन्हें कालिंदी भी कहते हैं। भागवत पुराण में वर्णन है कि भगवान कृष्ण की आठ पटरानियों में से एक यमुना भी हैं। यमुना का वैदिक नाम यमी है। ऋग्वेद के संवाद सूक्त में यम-यमी संवाद का उल्लेख मिलता है।
प्राचीन मान्यता के अनुसार यमुना ने भगवान विष्णु को पति रूप में पाने के लिए कठोर तप किया था। उनके कठोर तप से प्रसन्न हाेकर श्रीहरि ने उन्हें वरदान देते हुए कहा कि वे जब द्वापर युग में पृथ्वी पर कृष्ण के रूप में अवतार लेंगे, तब उनका वरण करेंगे। द्वापर युग में एक बार कृष्ण अर्जुन के साथ खांडव वन में घूम रहे थे, तो उन्होंने वहां एक युवती को तपस्या करते हुए देखा। उन्होंने अर्जुन से उस युवती के बारे पता करने के लिए कहा। अर्जुन ने उस युवती के पास जाकर उससे उसका परिचय पूछा, तो उसने बताया कि उसका नाम यमुना है। वह कृष्ण को पति रूप में पाने के लिए तपस्या कर रही है। अर्जुन ने जब यह बात कृष्ण को बताई, तो उन्होंने खांडव वन में यमुना के घाट पर यमुना का वरण किया। जिस जगह कृष्ण ने यमुना का वरण किया, वह जगह ‘वर मुरारी’ के नाम से प्रसिद्ध हुई, जिसे आज दिल्ली में बुराड़ी गांव के नाम से जाना जाता है।
इसी स्थान पर पांडवों ने इंद्रप्रस्थ के निर्माण के लिए खांडव वन के दहन के लिए अग्नि देव की स्तुति की थी। अग्नि देव ने पांडवों की प्रार्थना पर खांडव वन का दहन यहीं से आरंभ किया था। ऐसा माना जाता है कि जहां अग्नि देव प्रकट हुए थे, वहां कृष्ण ने शिवलिंग की स्थापना की, जो खंडेश्वर शिवलिंग के रूप में प्रसिद्ध है।
एक अन्य मान्यता है कि पुष्टि मार्ग के आचार्य वल्लभाचार्य को यमुना ने अपने तट पर श्रीमद्भागवत सुनाने के लिए कहा था। वल्लभाचार्य ने यमुना की स्तुति में ‘यमुनाष्टकम’ की रचना की थी। पुष्टि मार्ग में यमुना की पूजा किए बिना, कोई भी पूजा अधूरी मानी जाती है।
यमुना के उद्गम स्थल यमुनोत्री धाम के कपाट अक्षय तृतीया के दिन खुलते हैं और भाई दूज के दिन बंद होते हैं। कपाट के बंद होने पर शीतकाल में यमुना की पूजा खरसाली के खुशी मठ में पूरे रीति-रिवाज से की जाती है।
ऐसा विश्वास है कि भैया दूज के दिन मथुरा के विश्राम घाट पर भाई-बहन द्वारा स्नान करने के बाद, बहन द्वारा भाई के तिलक करने पर और साथ भोजन करने पर भाई की अकाल मृत्यु से रक्षा होती है।




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