भक्त, उतने ही भक्ति के रूप
मानस में भक्त के चार प्रकार बताए गए हैं- ज्ञानी, जिज्ञासु, अर्थार्थी एवं आर्त। चार प्रकार के भक्तों की बात कह देना बहुत सरल है। भक्ति में वास्तविकता-अवास्तविकता का प्रश्न पहले नहीं उठाया जाता। जब तैरना सीख जाएंगे,

मानस में भक्त के चार प्रकार बताए गए हैं- ज्ञानी, जिज्ञासु, अर्थार्थी एवं आर्त। चार प्रकार के भक्तों की बात कह देना बहुत सरल है। भक्ति में वास्तविकता-अवास्तविकता का प्रश्न पहले नहीं उठाया जाता। जब तैरना सीख जाएंगे, तभी नदी में उतरेंगे, ऐसा नहीं कहा जा सकता।इसका तो श्रीगणेश ही व्यक्ति की अपनी मान्यता से होता है। संसार सत्य है या असत्य? विषय को चाहना उचित है या अनुचित? प्रारंभिक स्थिति में इन विवादों की कोई आवश्यकता नहीं। यहां तो सीधा आमंत्रण है।
गवान का सुख पाना, उसमें एक हो जाना
तुम संकट से त्राण पाना चाहते हो! ये सब प्रभु से ही संभव है। ब्रह्म-सुख पाना चाहते हो, तो आओ, प्रारंभ कर दो प्रभु के चरणों में भक्ति। अर्थ और अभिलाषाओं की पूर्ति चाहते हो! रहस्य जानना चाहते हो! सब सर्वदा प्रभु द्वारा साध्य होगा।भय और लोभ की सहज वृत्ति से भक्ति का श्रीगणेश होता है। भगवान की जिज्ञासा भक्ति का मध्यभाग है। भगवान का सुख पाना, उसमें एक हो जाना, भक्ति की चरम परिणति है। भय से संत्रस्त आर्त हैं। लोभ से प्रेरित अर्थार्थी हैं। जानने की इच्छा वाला जिज्ञासु है। जान पाने वाला ज्ञानी है। मानस में-‘ग्यानी प्रभुहि बिसेषि पिआरा’ कहकर गोस्वामीजी ने पुष्ट कर दिया है।
एकता का एक केंद्र है-‘राम से संबंध।’
मानस में भक्तों की ओर देखें, तो साधारण से लेकर असाधारण चरित्र वाले अनेक पात्र हमारे सामने आते हैं। दशरथ, गीध, वाल्मीकि, शबरी, कोल, भील, वानर, निशाचर आदि सब वहां (भक्ति में) एक पंक्ति में खड़े हुए दिखाई देंगे। ऐसी उदारता, जो कि अन्यत्र असंभव है। पात्रों में स्वभाव, आचार, विचार, आकांक्षा आदि किसी में भी साम्य नहीं है। बस, एकता का एक केंद्र है-‘राम से संबंध।’
मानस में भक्ति की भी अनेक प्रसंगों में व्याख्या है
उसका विभाजन भी अनेक रूपों में किया गया है। भक्ति के नव भेद हैं। इस नवधा भक्ति का विभाजन भी दो भिन्न-भिन्न प्रसंगों में पृथक-पृथक रूपों में किया गया है। शबरी से कथित नवधा भक्ति और लक्ष्मण को दिए गए उपदेश में भक्ति का वर्णन भिन्न रूपों में किया गया है। वाल्मीकि द्वारा राम-आवास के लिए बनाए गए स्थानों में भक्ति का विभाजन चौदह रूपों में किया गया। इस प्रकार बाह्य दृष्टि से देखें, तो बड़ी उलझन प्रतीत होती है, पर इसका निष्कर्ष एक ही है। वस्तुतः संसार में जितनी भांति की मनोवृत्ति वाले भक्त हैं, भक्ति के उतने ही भेद हो सकते हैं। अब वर्णन की सुविधा के लिए उसका विभाजन कुछ स्थिर रूपों में किया जा सकता है। उसे चार, नव, चौदह की सीमा में बांधकर जान लीजिए! एक भक्त है, जो भगवान की आराधना करता है, इस आराधना में उसका पूरा परिवार ‘साथी’ है।
भगवान मात्र को’ स्वीकार कर लिया जाए
भक्ति शास्त्र में यदि आर्त या अर्थार्थी को भक्त मान लिया गया, तो इसका तात्पर्य इन वस्तुओं को साध्य बना लेना नहीं है। भक्ति में मानसिक वृत्तियों के संकोचन की प्रणाली बड़ी अनोखी है। साधारण व्यक्ति के जीवन में विविध आकांक्षाएं हैं और उनकी पूर्ति के लिए अनेक आलंबन। अतएव वह अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए यत्र-तत्र भटकता रहता है। फिर भी जरूरी नहीं कि उसकी सभी इच्छाएं पूरी हों। भक्ति का प्रथम पग यही है कि इच्छाएं भले ही अनेक हों, पर उनके अनेक आलंबनाें के स्थान पर एक आलंबन ‘भगवान मात्र को’ स्वीकार कर लिया जाए। स्वार्थ-पूर्ति की दृष्टि से भी भक्ति मत में यही मार्ग श्रेष्ठ है।




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