Akshaya Tritiya : अक्षय तृतीया पर अच्छे काम करें और अक्षय हो जाएं
Akshaya Tritiya 2026 date:वर्तमान में कुछ लोग व्रत का मतलब अन्न-जल का त्याग या फलाहार करना ही मानने लगे हैं। व्रत का वास्तविक अर्थ है, व्यक्ति अपने दुर्गणों को दूर करने का संकल्प ले और अच्छे कर्म करे। इस बारे में बता रहे हैं बीएचयू के पूर्व प्रोफेसर, गिरिजा शंकर शास्त्री

वर्तमान में कुछ लोग व्रत का मतलब अन्न-जल का त्याग या फलाहार करना ही मानने लगे हैं। व्रत का वास्तविक अर्थ है, व्यक्ति अपने दुर्गणों को दूर करने का संकल्प ले और अच्छे कर्म करे। इस दिन दान करने का भी विशेष महत्व है। यह दान किसी जरूरतमंद को देना ज्यादा अच्छा है। ज्योतिष शास्त्र में कुछ तिथियों को विशेष संज्ञाएं देते हुए उन्हें अखंड, अचल, अनंत तथा अक्षय माना गया है। जब कभी कोई विशिष्ट घटना किसी तिथि विशेष को घटित हुई, तब उस तिथि को विशेष महत्वदायिनी कहा गया। बैसाख शुक्ल पक्ष तृतीया को त्रेता युग की आदि तिथि होने के कारण अक्षय तृतीया कहा गया है। इस बारे में बता रहे हैं बीएचयू के पूर्व प्रोफेसर, गिरिजा शंकर शास्त्री
कौन थे परशुराम
अक्षय तृतीया के दिन भगवान विष्णु के छठे अवतार परशुराम का जन्म महर्षि जमदग्नि की पत्नी रेणुका के गर्भ से हुआ था। विष्णु का यह आवेशावतार था। गणेश से युद्ध में उन्होंने अपने फरसे से उनका एक दांत तोड़ दिया था। अपने पराक्रम से भगवान शंकर को संतुष्ट कर उनसे पिनाक धनुष प्राप्त किया, जिसे बाद में उन्होंने राजा जनक को दे दिया। विष्णु ने अपना शारंग धनुष परशुराम को यह कहकर दिया था कि जब कोई इस पर प्रत्यंचा चढ़ा देगा, तब जान लेना मेरा पूर्णावतार हो गया है।
धर्म की स्थापना
भगवान के अन्य अवतार तो धर्म स्थापना करके विष्णु लोक चले गए, पर परशुराम चिरंजीवी अवतार के रूप में पृथ्वी लोक में ही रह गए। अत्याचारी सहस्रार्जुन की भुजाएं काटने के पश्चात भी जब परशुराम के आवेश का शमन नहीं हुआ, तब भगवान विष्णु ने राम के रूप में अवतार लेकर धर्म एवं मर्यादा की स्थापना की। अवतारवाद का अर्थ है, प्रकृति के प्रत्येक पदार्थ में ईश्वर तत्व की भावना को देखना, इसलिए ईश्वरीय शक्तियां समय-समय पर अवतरित होती हैं। ऐसी उदात्त दृष्टि सनातन संस्कृति में ही देखने को मिलती है, जहां मानव ही नहीं पशु-पक्षी, जलचर विशेष को भी भगवद् दृष्टि से देखा जाता है।
पुण्यफलदायी तृतीया
युगादि तिथि होने से अक्षय तृतीया अत्यंत पुण्यदायिनी मानी गई है। यही कारण है कि इस तिथि की भी मन्वादि एवं युगादि तिथियों की भांति स्वयं सिद्ध मुहूर्त में गणना होती है। पुराणों के अनुसार इस दिन परशुराम का जन्म हुआ था। इसी दिन भगवान विष्णु ने हयग्रीव अवतार लेकर मधु-कैटभ द्वारा चुराए गए वेद पुन: ब्रह्मा को प्रदान किए थे, इसलिए इस दिन हयग्रीव जयंती भी मनाई जाती है। इस तिथि को नर-नारायण का भी अवतार हुआ था। इसी दिन जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव ने लंबी तपश्चर्या को पूर्ण किया था। अक्षय तृतीया तिथि के दिन बद्रीनाथ के कपाट खुलते हैं और विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है।
दान की महिमा
मत्स्य पुराण, विष्णुधर्मोत्तर एवं नारद पुराण के अनुसार इस दिन किया गया कोई भी अशुभ या शुभ कार्य अक्षय हो जाता और जन्म-जन्मांतर तक दुख या सुख प्रदान करता है। इस दिन गंगा स्नान या समुद्र स्नान के साथ-साथ भगवान की पूजा, पितृ तर्पण, श्राद्ध और दान आदि करना चाहिए। अक्षय तृतीया को लक्ष्मी सहित विष्णु का चंदन एवं श्वेत वस्त्र तथा श्वेत पुष्पों से शृंगार करना चाहिए। धर्म ग्रंथों में इस तिथि के दिन व्रत का विधान भी बताया गया है। व्रत का अभिप्राय केवल उपवास नहीं, अपितु उपासना, तप, अनुष्ठान, यज्ञ, आचार, आज्ञापालन, संकल्प, देवताओं के दर्शन तथा किसी नए उपक्रम या विधान को संपन्न करने से है। वर्तमान में कुछ लोग व्रत का मतलब अन्न-जल का त्याग या फलाहार करना ही मानने लगे हैं। व्रत का वास्तविक अर्थ है, व्यक्ति अपने दुर्गणों को दूर करने का संकल्प ले। इस दिन व्रती को चाहिए कि वह प्रातः स्नानादि से निवृत्त होकर संकल्प करके भगवान का यथाविधि षोडशोपचार से पूजन करे।
इच्छित कामनाओं की पूर्ति
अक्षय तृतीया के दान में ग्रीष्म ऋतु के अनुकूल जल पात्र, छाता, जूता या चप्पल, पंखा, सत्तू, घी, खीरा, ककड़ी, खरबूजा, तरबूज, अन्न वस्त्र आदि का दान करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। दान की महिमा बताते हुए वेदव्यास ने कहा है कि जल पात्र के दान से अक्षय कीर्ति, स्वर्ण दान से सभी इच्छित कामनाओं की पूर्ति, घी या औषधि के दान से रोग मुक्ति, छाता दान से विपत्ति से रक्षा, गोदान से अमृतत्व की प्राप्ति, भूमिदान से स्वर्ग की प्राप्ति तथा अन्नदान करने से समस्त पापों से मुक्ति मिलती है।
स्नान, दान आदि कर्मों से अनंत फलों की प्राप्ति होती है
पद्म पुराण के पाताल खंड में अक्षय तृतीया के व्रत का फल बताते हुए कहा गया है कि एक बार देवगुरु बृहस्पति के परामर्श से देवराज इंद्र ने समुद्र स्नान करके अक्षय तृतीया व्रत का विधि-विधानपूर्वक पालन किया, फलस्वरूप वह सभी पापों से मुक्त हुए। भविष्य पुराण में भी कहा गया है कि बैसाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि अत्यंत पवित्र है। इसमें स्नान, दान आदि कर्मों से अनंत फलों की प्राप्ति होती है। जो कुछ भी इस दिन दिया जाता है, वह चाहे थोड़ा हो या अधिक, वह सभी अक्षय हो जाता है, इसीलिए इसे अक्षय तृतीया कहा जाता है।




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