कैलाश से निकली थी गंगा, कुबेर बने कोषाध्यक्ष... अक्षय तृतीया मनाने की 10 वजहें जानते हैं आप?
हिंदू धर्म में अक्षय तृतीया को अत्यंत महत्वपूर्ण तिथि माना जाता है। वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को अक्षय तृतीया कहा जाता है। इस दिन सूर्य और चंद्रमा दोनों की अपनी उच्च राशि में होते हैं। दोनों की सम्मिलित कृपा का फल अक्षय हो जाता है।

हिंदू धर्म में अक्षय तृतीया को अत्यंत महत्वपूर्ण तिथि माना जाता है। वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को अक्षय तृतीया कहा जाता है। इस दिन सूर्य और चंद्रमा दोनों की अपनी उच्च राशि में होते हैं। दोनों की सम्मिलित कृपा का फल अक्षय हो जाता है। मान्यता है कि इस दिन किए गए कार्य कभी व्यर्थ नहीं होते और उनका फल हमेशा बना रहता है। इसे अबूझ मुहूर्त भी कहा जाता है, यानी इस दिन किसी भी कार्य को ग्रह स्थिति या विशेष शुभ समय देखे बिना किया जा सकता है। पूरा दिन ही शुभ माना जाता है। इसे “अक्षय” कहा जाता है, जिसका अर्थ है वह जो कभी नष्ट न हो, हमेशा स्थायी रहे। इसके पीछे कई पौराणिक कथाएं जुड़ी हुई हैं। यह तिथि भगवान परशुराम के जन्म, गंगा के पृथ्वी पर अवतरण और कृष्ण-सुदामा के मिलन जैसी घटनाओं से भी संबंधित है। ऐसी ही आज हम अक्षय तृतीया मानने की 10 वजह जानते हैं।
गंगा अवतरण
धार्मिक ग्रंथ नारद पुराण के अनुसार, इस पावन दिन स्वर्ग से प्रचंड वेग के साथ अवतरित हुई गंगा नदी को भगवान शिव ने अपनी जटाओं में धारण कर उनके वेग को नियंत्रित किया था। इसके बाद अक्षय तृतीया के शुभ अवसर पर गंगा पृथ्वी पर अवतरित होकर कैलाश से प्रवाहित हुईं।
परशुराम अवतार
अक्षय तृतीया को सबसे ज्यादा भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। परशुराम उन आठ पौराणिक पात्रों में से एक हैं जिन्हें अमरता का वरदान मिला हुआ है। इसी अमरता के कारण इस तिथि को अक्षय कहते हैं, क्योंकि परशुराम अक्षय हैं। भगवान परशुराम के जन्म के अलावा भी कुछ और पौराणिक घटनाएं हैं, जिनका अक्षय तृतीया पर घटित होना माना जाता है।
त्रेतायुग की शुरुआत
पुराण के मुताबिक अक्षय तृतीया को युगादि तिथि कहा जाता है। यानी इसी तिथि से ही त्रेतायुग की शुरुआत हुई थी।
महाभारत लिखने की शुरुआत
धार्मिक कथाओं के अनुसार, वेद व्यास ने इसी दिन महाभारत की कथा सुनाना आरंभ किया था, और भगवान गणेश ने उसे लिखने का कार्य संभाला। इसी कारण महाभारत की कथा अक्षय मानी जाती है, क्योंकि यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी आज तक सुनाई जा रही है।
कुबेर बने कोषाध्यक्ष
पुराणों के अनुसार, अक्षय तृतीया के दिन कुबेर ने भगवान शिव की पूजा की थी। इसी वजह से उन्हें देवताओं के खजांची यानी कोषाध्यक्ष का दायित्व सौंपा गया।
सीता माता की अग्नि परीक्षा
पद्मपुराण में बताया गया है कि अक्षय तृतीया के दिन सीता माता ने अग्नि परीक्षा दी थी। इसके अलावा, स्कंदपुराण में उल्लेख है कि जब भगवान राम ने सीता का त्याग किया और अग्नि परीक्षा के बाद वापस अपनाया तो वो अक्षय तृतीया का दिन था।
पांडवों को मिला अक्षय पात्र
धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक महाभारत के अनुसार, इस दिन श्रीकृष्ण ने पांडवों को अज्ञातवास के दौरान अक्षय पात्र दिया था। वो ऐसा बर्तन था जिसमें अन्न कभी खत्म नहीं हुआ और पांडव कभी भूखे नहीं रहे।
अन्य वजहें
- इसी दिन सुदामा भगवान कृष्ण से मिलने गए थे। तब सुदामान ने भगवान कृष्ण को चावल यानी अक्षय का दान किया था।
- साथ ही, प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ ऋषभदेवजी ने भगवान के 13 महीने के कठिन उपवास का पारणा इक्षु (गन्ने) के रस से किया था।
- आदि शंकराचार्य ने कनकधारा स्तोत्र की रचना की थी।
- मान्यताओं के मुताबिक इसी दिन महाभारत की लड़ाई खत्म हुई थी।
- इसी दिन ब्रह्माजी के पुत्र अक्षय कुमार का जन्म भी हुआ था।
कब है अक्षय तृतीया 2026
अक्षय तृतीया इस बार 20 अप्रैल को पड़ रही है। पंचांग के अनुसार तृतीया तिथि 19 अप्रैल से आरंभ हो रही है, लेकिन सूर्योदय के समय यह तिथि 20 अप्रैल को होगी। हिंदू मान्यताओं में उदया तिथि यानी सूर्योदय के समय की तिथि को विशेष महत्व दिया जाता है। इसलिए, इस बार अक्षय तृतीया 20 अप्रैल को ही मनाई जाएगी।
डिस्क्लेमरः इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम यह दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य एवं सटीक हैं। विस्तृत और अधिक जानकारी के लिए संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।




साइन इन